मैं कलश . कवि कलश... धर्म प्रिय ,न्याय प्रिय ,रणधीर के साथ ज्ञान के साक्षात अवतार प्रभु संभाजी जी महाराज का मित्र..सुनिए हमारी एक छोटी कहानी..
मैने संभाजी को पहली बार देखा जब शिवाजी महराज औरंगजेब के द्वारा दिए शांति प्रस्ताव के छल मे आगरा के किले में नजरबंद थे....शिवाजी महाराज... साक्षात शंभू .... शरीर ऐसा की जैसे स्वयं अर्जुन ..नरश्रेष्ठ. .और संभाजी जैसे भगवान कार्तिकेय..माँ अंबे के त्रिशूल से रचित महाकाव्य के सर्ग जैसे संभाजी..
शिवाजी कैसे भी क़ैद से आज़ाद होने को व्यग्र थे....उनके मन मे इस बारे मे मंथन जारी था...उन्होंने मुझे और मेरे परिचित परमानंद जी को संभाजी के सुरक्षा का दायित्व दिया..शिवाजी जानते थे की शिवाजी और संभाजी दोनो का साथ मे आगरा से निकलना लगभग नामुमकिन था.. अपने गले में कौड़ियों की माला पर हाथ फेरते .. ..संभाजी महाराज से क्षत्रपति ने कहा था..." जल्द मिलेंगे संभा ... ध्यान रखना "
कुछ दिनों के बाद खबर मिली शिवाजी महाराज शाही सेना को चकमा दे मराठा साम्राज्य सकुशल पंहुच गये ... हम सब ने भी सिंह के शावक को भी छिपतेछिपाते कुछ माह में रायगढ़ लौटा दिया....इस बीच संभाजी के साथ बिताए हर पल मेरे लिए धरोहर थे...
कई साल बीत गये...औरंगजेब इस्लाम का सहारा ले मुगल साम्राज्य का विस्तार कर रहा था. .गैर इस्लामिक प्रजा पर प्रतिदिन अत्याचार बढ़ते जा रहे थे.... ..धर्मगुरुओं का निर्ममतापूर्वक हत्या.. जजिया...तलवार के बल पर धर्म परिवर्तन...मंदिरो , मूर्तियों और गर्भगृह का विनाश..हिंद महिलाओं का यौन उत्पीड़न...
अपनी आँखो से मैने मथुरा के मंदिर का विध्वंस देखा....उत्तर मे चारो तरफ त्राहिमाम मचा हुआ था....औरंगजेब के मुगल सिपहसालार हिंदू जनता तलवार की नोक पर विधर्मी बना रहे थे...इस्लाम को ना कहने वालों के लिए बस मृत्यु ही रास्ता थी..
उधर दख्खिन मे शिवाजी मजबूत होते जा रहे थे.. ..एकमात्र हिंदू राष्ट्र का उदय हो रहा था....औरंगजेब के सारे हथकंडे पैंतरे असफल रहे थे...मराठा सेना ने नाक मे दम कर रहा था...मैं भी एक आशा के साथ दख्खिन की तरफ कूच किया
इधरसंभाजी युवराज हो गये थे..लोकप्रिय युवराज जैसे थे युवराज कौशल नंदन श्रीराम... मैने युवराज संभाजी महाराज को देखा जब वह रायगढ़ के समीप एक शिव मंदिर मे बैठे आस पास के गाँव वालो की विनती सुन रहे थे ...एकदम वीरता की सजीव मूर्ति....बलिष्ठ बाहू ...सुदृढ़ सीना...सुकोमल चेहरा..घनी मूँछे ..युवराज ... .मैने आवाज़ लगाई "शंभूऊऊउउ" . .संभाजी ने उठ कर मुझे गले लगा लिया...हमारा भावुक मिलन था कई वर्षो के बाद..
महाराज शिवाजी माँ अंबे की गोद मे लौट चुके थे...अब युवराज नये छत्रपति थे.... संभाजी महराज के नेतृत्व मे मैसूर प्रदेश ,आदिलाबाद ..और कई किले जीत लिए गये ...हर अभियान पर विजय पताका फहराई जा रही थी...महराज संभाजी का यश बढ़ रहा था
शिवाजी से हर बार मत खाए कुटिल औरंगजेब ने एक विशेष अभियान के तहत विशाल सेना मावल खंड के लिए भेजी....अभियान था संभाजी और मराठा साम्राज्य का पतन
धोखा
महराज सवेश्वर के पास एक मंदिर मे अपने कुछ सेनानायकों संग विश्राम कर रहे थे..........मराठा मीरजाफर गणोजी ने घर का भेद दिया था..
राज्य से गद्दारी की थी....सुबह की लाली ही फूटी थी ..और नीरव शांति को भंग करते हुए जोरो की जंग जारी थी. मुगल फौज महाराज संभाजी को घेरे हुई थी....सेनापति म्हलोजी बाबा तलवार से दीवार बने संभू और इख्लास ख़ान की मुगल फौज के बीच खड़े थे....मराठे हर हर महादेव का जयकारा कर रहे थे... साथ मे मुगलिया अल्लाह हू अकबर से गगन गूँज रहा था...म्हलोजी बाबा रणचंडी को अपनी तलवार से मुग़लिया नरमुंडो की आहुति दे रहे थे
मैं शंभूराजे के दाहिने हाथ पर रक्षा पंक्ति मे था....महाराज संभाजी मुगल फौज को गाजर मूली की तरह काट रहे थे....अपने घोड़े चन्द्रावत पर सवार साक्षात काल का रूप बने हुए थे...पर मुगल सेना जैसे टिड्डो का फ़ौज़..ख़तम होने होने का नाम ही ले रही थी... श्वानो मे सिंह फँस गया हो ऐसे ही महराज मुगलों के बीच फँसे हुए थे... मुगल फ़ौज़ के सैनिकों ने हर तरफ से महाराज को घेर लिया..हज़ारो के मुगल सेना से मुट्ठी भर मावले सैनिक जूझ रहे थे...म्हलोजी बाबा का तेग भी सैकड़ों की मुग़लिया तादाद के सामने फीका होता जा रहा था... अनेको वार से घायल महावीर बुजुर्ग सेनापति ने आखिरकार अंबे के चरणों मे अपना स्थान सुरक्षित किया ... एक बान मेरे दाहिने हाथ पर लगा और मैं घायल अपने घोड़े से "महाराज" चीत्कार करता नीचे जा गिरा......म्हलोजी बाबा का दुख खत्म नही हुआ था उस पर "महाराज" की मेरी एक करुण पुकार ने संभाजी तलवार की तेज़ी थोड़ी कम कर दिया..संभुराजे ने अगले पल अपने आपको टिडिदल मे घिरा पाया....तलवार चलाने की जगह भी नही बची थे.. महराज क़ैद मे थे..साथ मे था मैं ..
आज नराधाम औरंगजेब के जीवन का सबसे खुशी का दिन था.... दक्खिन जीतने का स्वप्न जीवंत हो उठा... सारा हिन्दुस्तान उसे इस्लाम के झंडे के नीचे नज़र आने लगा था जिस राह के रोड़ा रहे थे साक्षात शंभू अवतार छत्रपति शिवाजी महाराज और मराठे थे..और थे शिवाजी सुता संभाजी
इख्लास ख़ान अपने मुगल फ़ौज़िया पिता फ़ौजदार मुकर्रब ख़ान संग कैदी संभाजी को ले जल्दी जल्दी निकल पड़ा था कन्हि सुरक्षित दूरी के लिए ताकि अपनी सफलता का जश्न मना सके..... क्यूंकी मावल प्रदेश के सैनिको का डर था...मराठा सेना का छापा वार युद्ध प्रसिद्ध था..शिवाजी के लड़ाके अचानक प्रकट होते और काम करके ऐसे गायब होते की ढूँढे ना मिलते..मुग़लिया सरदार जानता था की मावले अपने महराज के लिए जी जान लगा देंगे
जैसे तैसे महाराज को ले मुगल सेना पहुंच गई बहादुर गढ़ छावनी मे..जान्हा साक्षात था नरपिशाच औरंगजेब जिसने सत्ता के लिए अपने भाइयों और पिता के कत्ल से भी परहेज नही किया था..और अपने धर्म के नाम पर अनगिनत लोगों की हत्या और अंग भंग...महाराज को उनके सबसे बड़े कर्म.."अपने धर्म की रक्षा" के लिए अपने हाथ से वीभत्स मृत्युदंड देने को उतावला था....
उस नीच आलमगीर ने फरमान जारी किया मावले राजवंशी इन "कैदियों" का जुलूस निकाला जाए और बहादुर गढ़ किले तक लाया जाए..महाराज संभाजी और मेरे हाथ बाँध कर और मसखरे जैसे दिखने वाले कपड़े पहना दिए ...चारो तरफ हजारों की भीड़ थी.. जो जोर जोर चिल्ला रहे थे...बहुत से ऐसे थे जिन्होने ने अभी अभी कलमा पढ़ा था...और अपने आप को ज्यादा धर्म प्रेमी दिखाने मे उत्साहित हो कंकड़ और अपशब्दों की बौछार किए हुए थे..शोर से हमारी कान फटे जा रहे थे...काफ़िर को मारो...काफ़िर को खिचो......कई मर्माहत करती गालियाँ......
पहले तो हमे रस्सी से बाँध के पैदल घसीटा गया ..कई बार गिरने जगह जगह से कपड़े फट गये.....जगह जगह शरीर पर खुरचने से रक्त आने लगा था ...कई मन की दूरी हमे घसीटते हुए गये....सारा शरीर छिल गया था फिर भी शक्ति संचित करके हम दोनो फिर खड़े हो उठे.. इस बार बची खुची शक्ति लगाकर शंभुराजे ने रस्सी खींचने वालो को आगे ना बढ़ने में लगा दिया... जब सैनिको से ना देखा की अब ये ऐसे नही हिलेंगे और उन्हे और ज़ोर लगाना होगा तो ....हमे को उठा के ऊँट पर टांग दिया गया....और चारो तरफ से कोडो की वर्षा हो रही थे..हमारे दर्द की सीमा नहीं थी...शरीर का हर अंग रक्त वमन कर रहा था...
जिन शंभू महराज के सामने जनता शीश नवाती थे.. जो शरीर रेशम के वस्त्र और सोने के आभूषण से सुसज्जित रहते थे उसकी ऐसा दुर्दशा देख के मन रो उठा मेरा..महराज ने मुझे रोता देख धीमे आवाज़ मे पूछा .." क्यूँ रोते हो कलश ...क्यूँ .. अपनी शक्ति बचा के रखो कविराज" और ऐसा कहते हुए स्वयं बेसुध हो बैठे...मेरी भी आँखें बंद होने लगी..मूर्छा सी छा गई....लोगों का हुजूम और काफिरों को मारो के नारे के बीच हम आगे बढ़ रहे थे...
सरेआम हमे मार खाते सहते कई घंटे बीत चुके थे.....और दर्द की परकाष्ठा से महराज संग मैं कलश बेहोश हो गये...
हमारी आँखे खुली वापस आलम गीर के दरबार में...सामने मऩहुश औरंगजेब बैठा नमाज़ पढ़ रहा था.... भद्दा चेहरा बूढ़ा परंतु कुटिल ....सामने थे हमारे महराज ...निडर निर्भीक स्वयं शंभू के पुत्र महाराज संभाजी.....शरीर का पोर पोर दर्द से डूबा था...तथापि महाराज ने दरबार, औरंगजेब और सभी सिपहसालारों को अनदेखा करते हुए कहा... कविराज कहो क्या कहते हो हमे इस दरबार मे देख के.....और मेरा कवि मान फुसफुसा उठा..
"राजन तुम हो साँचे ,खूब लड़े तुम जंग,
तेज तुम्हारा देख के भौचक है औरंग"
दरबार चालू हुआ ...सारे दरबार के सामने ...महराज से उनके शाही दरबार के गुप्तचरों के बारे मे...रायगढ़ के खजाने के बारे मे ..पूछा गया..महराज एकदम दृढ़ शिला के जैसे चुपचाप बैठे रहे.....मुझे भी कभी जागीर का लोभ दिया.. कभी सोने चांदी आभूषण के साथ जान बख्शने का लोभ दिया...पर यह शरीर तो अब संभाजी का था...धर्म का था....
अंत मे हमें इस्लाम कबूल करने को कहा गया... महराज का उत्तर सभा के पटाक्षेप के लिए काफ़ी था..
.
संभा जी ने गरजते हुए औरंगजेब की आँखो मे आँखे डाल के कहा.... " अधम मुगल सम्राट जीवन के किसी भी क्षण पर मुझे ये मंजूर नही..चाहे तन पर शीश रहे ना रहे... तुम पूरे मुगल राज्य के आभूषण स्वर्ण का प्रस्ताव रखो या फिर आलमगीर तुम खुद क्यूँ ना अपनी पुत्री जिन्तुन्निसा का विवाह ही क्यू ना मुझसे करवा दो.. ये शीश केवल माँ अंबे के चरणों मे ही झुकेगा..इस्लाम कतई मंजूर नही"
आलमगिर का बूढ़ा रक्त काफ़ी देर तक उबलता रहा होगा.....और नतीजा था हमे कालकोठरी....
यातना
हमारा दंड़पत्र आ चुका था.....औरंगजेब का आदेश था वाचाल जिव्हा को काटने का और आंखों की तेज को बुझाने का..... हर दंड महाराज को दो बार भोगना था..क्यूंकी आदेश के अनुसार हर पहला दंड पहले मुझे को मिलना था फिर महाराज को...
सिपहसालार रूहल्ला ख़ान ने आदेश का तामील किया...पत्थर दिल जल्लादों को चुना गया....लोहे की संड़सी और अंगीठी आ गई थी...काले कलूटे हबशी जल्लादों ने मेरा जबड़ा पकड़ा.. पर मैं केवल कवि ही तो नही था..एक लड़ाका भी था....२-३ हबशी के बस का नहीं था....कुछ और जल्लाद आगे बढ़े और मेरा मुँह खोल दिया.....जिव्हा से विदा लेने का समय आ गया ये जान के मैने ज़ोर से अंतिम बार अपने स्वामी को प्रणाम कहा....."स्वामी प्रणाम ......स्वामी प्रणाम.... स्वामी प्रणाम जय भवानी जय चंडी माता" और फिर एक ही झटके मे हबशियों ने मेरी जीभ खिच के ऐसा वार किया की जिभा का टुकड़ा दूर जमीन मे जा गिरा...और २-३ दाँत बाहर आ गये...पूरा शरीर अति वेदना से कांप उठा..मुँह से खून का फ़ौवारा फुट पड़ा ..
महाराज ने बँधे हुए ये दृश्य देखा एक धीमी पुकार लगाई.."कविराज" ऐसा लगा जैसे अपने बाल राजा को दुलार पूर्वक बुला रहे हैं....मैं अधमरा सा होता ज़मीन पर गिर पड़ा
मेरे दर्द का अन्त नहीं था...मुझे अपने महराज का वोही हाल देखना था जो अभी मेरा हुआ था..१०-१५ हबशियों ने महराज को पकड़ ऐसा ज़ोर लगाया की मूह अपने आप खुल आया ..एक हबशी ने संड़सी से जिवहा को पकड़ कर खींचा और फिर ला इलाह चिल्लाते हुए एक ज़ोर का वार किया ...मुझे महाराज के मुख से आवाज तक नही सुनाई दी ..केवल एक रक्त धारा मुँह से बह रही थी....वो मुख जो हर वक्त जग्दम्बे जग्दम्बे का जप करता था.... वोही क्षत्रीय कुलावंतास श्रीमान माहराज हिंदुपद गो ब्राह्मण प्रतिपालक संभाजी महराज का मुख रक्त वमन कर रहा था....ये दृश्य देख मेरी आत्मा भी चीत्कार मारती हुई रो पड़ी...
हमारे दर्द का अंत नहीं था....अब दंड का दूसरा भाग चालू हुआ...सामने गर्म सलाखें लिए जल्लाद को देख मैं समझ गया की अब आँखो की बारी है..समय कम था...मैने संभाजी महाराज के लहूलुहान मुख को निहार का अपने चित्त कोष को भरने लगा......ज्यों ज्यों जल्लाद सलाखें लिए आगे बढ़े मैं अपनी आखे और बड़ी कर महाराज का मुख निहारता गया....चर्र चर्र और कुछ ही पलों मे दोनों सलाखें मेरी आँखों की पुतलियों को भेदते हुए निकल गई...मेरे मुँह कटी हुई जिव्हा के कारण केवल आं आं शब्द फुट पड़ा....
इस बार महाराज की स्पष्ट आवाज़ मेरे कानो मे आई.." मृत्यु से ना डरो कविश्रेष्ठ" .. लगा असीम दर्द मे भी जैसे औषधि के छींटे आ पड़े
आगे होने वाली घटना मेरे कानो ने देखी ...महराज हर दंड दो बार झेल रहे थे...एक बार मेरा दुख ..फिरउन पर खुद बीतता हुआ"
चारो तरफ कोलाहल था पागल नृशंश जनता इस दंड के मज़े ले रही थी..."अल्लाह हू अकबर ....काफ़िर काफ़िर "का नारा सर्वत्र था..
तभी मेरे कानो ने फिर से वही चर्र चर्र की आवाज सुनी....मतलब साफ था की सूर्यबिंब समान संभाजी भोसले महाराज नेत्रहीन हो चुके हैं...ग्राम सलाखें से जलते मांस की गंध मेरे नथुनों मे घुस गये...आं आं कहते महराज का स्वर मेरी पीड़ा को और बढ़ा रहा थे..हमारे नाखून बाल तक उखाड़ लिए गये.... कोलाहल धीरे धीरे शांत हो रहा था..जल्लाद भी हमें सताते सताते शायद थक गये थे...दर्द से हम दोनो की आं आं की निकलती ध्वनि धीर धीरे सब शांत होने लगा...
दर्द से बिलखता मेरा शरीर अपने बचपन से होता हुआ महराज के संग अपनी यादों मे जाने लगा था.......मुझे यकीन था की महराज भी अपने बचपन मे आनी जिजाऊ ,अपनी धाराऊ..आबा साहब.. पत्नी यशुदेवी.. भाई राजाराम ..अपने बालराजा और अपनी बिटिया की यादों मे गुम होंगे..
हम दोनो रह रह कर जिव्हा के अवशिष्ट भाग और जलते नेत्रो मे असीम पीड़ा से व्याकुल थे....मूह से निकलती थी केवल आंआं की आवाज़ से..और उसी आं आं की भाषा मे महराज पीड़ा पर मलहम लगाते और मैं उनके...
क़ैद होने के बाद से हमने अन्न का एक भी दाना नही ग्रहण किया था...हमारे भूखे प्यासे शरीर को ये पीड़ा सहते आठ से नौ दिन हो गये थे...छावनी के कारागार में मुर्गे की बांग से हम दिन का पता चलता...बस आं आं की आवाज़ थी जिसे सुन के हमे पता लगता था की अभी हम जिंदा हैं...
नौंवा दिन उदित हुआ..और आलमगीर नया दंड चालू हुआ...इख्लाख़ ख़ान जल्लादों की नई फ़ौज़ लाया और ज़ोर से चिल्लाया ..
खाल छिल दो इन दोनो काफिरों की.....जैसे कद्दूकस के खोपरा रेता जाता है..वैसे ही हमारे शरीर को कद्दूकस किया जाने लगा..
छुरो से छिलते शरीर से दर्द के कारण आं आं निकलना भी बंद हो गया....हम दोनो अपने वेदना को दबाए अपने खाल खिचवा लिए...पर तभी एक नया आदेश आया...नमक पानी छिड़को इन हराम जादो पर..तांबे की चिलमिचिया हिली और नमक पानी के गरम फुवारों से हमरा शरीर दहल गया.....वापस से दोनों के मूह से आं आं आं की ध्वनि फुट पड़ी...भीषण यातना पूर्ण दंड देख तमाशबीन कोलाहल मचाते रहे. धीरे.. धीरे शोर थम गया...हमारी वेदना बस हम ही जान सकते थे...ऐसी वेदना की मृत्यु भी उस वेदना के आगे मृत्यु भी सुखदायी लगे
उपर आकाश नीला था की काला...अभी दिन था की रात ...हम दोनो बंदी इस समय की सीमा से दूर जा चुके थे...
हमरी आँखे निकालने के बाद चलती यातना का आज १२वाँ दिन था....मेरा अंत नज़दीक था..मेरी वेदना चरम सीमा लाँघ चुकी थी ...बस प्राण छूटने को थे..मैने "प्रणाम... स्वामी को मेरा प्रणाम " कहा बदले मे गले से बस आं आं की आवाज़ फूटी ..महराज ने भी आं आं कहके उत्तर दिए...जैसे कह रहे हों ..ना कविराज मेरे से पहले ना जाना...पर महाराज की ये अंतिम आज्ञा पर मेरा अधिकार नही था..महाराज की लगातार आं आं की आवाज़ लगा मुझे राक रहे थे...पर काल पर मेरा अधिकार ना था...आं आं कहते महराज पता नही मुझसे क्या कहना चाहते थे...आं आं की उनकी लोरी
सुनता मैं जगदम्बिका की गोद मे जा बैठा...
ठीक से याद नही पेर शायद ठीक एक दिन बाद ....मैने देख के मुझे गोद मे लिए माँ अंबे अपने अपने हाथों को फैला ..दूर किसी विशिष्ट के आगमन और स्वागत हेतु जल्दी जल्दी चली जा रहीं हैं.. ..... सामने थे मेरे महराज. मेरे प्रभु...श्रीमंत महाराज छत्रपति संभाजी...अपने कौड़ियों की माला फेरते जगदंबे जगदंबे कहते माँ अंबे की गोद मे आ समाए...
उपसंहार
मराठा सूर्य अस्त तो हुआ पर संभाजी की शहादत के एक लौ से.लोग जागने लगे ..शाही सेना से हिंदू किनारा करने लगे.... इस्लाम परस्त बूढ़े औरंगजेब के हाथ से भारत फिसलने लगा.
Saturday, August 17, 2024
छावा : संभाजी जी
Subscribe to:
Comments (Atom)