Monday, October 24, 2011

तेरे नाम


एक बात
तेरे साथ
तेरे ख्वाब
मेरे साथ
एक रात
तेरे साथ
मेरी दीपावली


एक गीत
तेरे संग
एक प्रीत
तेरे संग
हर एक रंग
तेरे संग
मेरी होली

एक हँसी
तेरे नाम
एक खुशी
तेरे नाम
एक चाँद
तेरे नाम
मेरी ईद

Thursday, August 18, 2011

जिंदा हूँ मैं


 मेरे जेब मे थे
बस १० रुपय
और तूने चुकाया था
१०० रुपय का वो उधार
जो तूने कभी लिया ही नही
मेरे जेब मे थे
बस १० रुपय
और तूने ज़िद करके
पानी पूरी खाया था
और दोनों
ही बार मैने तुझे
बड़ी वाली गाली दी थी

कई बार पिए हम
साथ में
तेरी कॉलेज वाली
के बर्थ डे पर
तेरी पहली वाली की शादी पर
तेरे कॅंपस प्लेसमेंट पर
साला रात भर पीते
दिन भर औंकते
उनसे बढ़ कर आज भी
कोई पल नही
आज भी कोई पार्टी नही
सच मे भाई......

जिंदगी के बहुत सारे
पल अमर कर दिए
विल्स गोल्डफ्लेक
के धुओं मे...
तेरे साथ...
गुमटीयों मे

मेरी उससे भी ज़्यादा
तू ही याद आता है मुझे

साला जब पी के बोलता है तू
आई लव यू ब्रो
जब टल्ली मे बोलता है
आई मिस यू ब्रो
लगता है की
जिंदा हूँ मैं

Saturday, August 13, 2011

चाहिए एक और जे. पी.

देश के विकास का
विधान हमको चाहिए
भ्रष्टाचार के लिए मौत
का प्रावधान
हमको चाहिए
देश का लूटा
हर एक समान
हमको चाहिए

काले धन की पाई पाई
का हिसाब हमको चाहिए
फाँसी पर लटकते
अफ़ज़ल कसाब हमको चाहिए
हाँ चाहिए कश्मीर एकछत्र
सिंध पंजाब पूरा चाहिए

देश मे राष्ट्रीयता की
एक आँधी
हमको चाहिए
हाँ चाहिए एक और जे. पी.
मोहन वाला गाँधी
हमको चाहिये.....

Sunday, July 31, 2011

बिटिया

बहुत दिनों बाद
भीगी थी ये आँखे
तेरे आने की खुशी में
तुझे देख कर
तू मेरी नन्ही परी

मेरा दिल गाता  था
जब तू किलकती
मुस्कुराती
मेरी आँखे भर जाती थी
जब अपने नन्हे हान्थो से
मेरी मूँछे नाक छूती
गाल सहलाती

जब घुटनो के बल
चलती,
मेरे पास आती
मेरी गोद में खेलती
सोती समाती
मुझे बातें करती
तुतलाती

तू लता सी
बढ़ती
फ्राक से
सलवार कमीज़ तक
पल में पहुचती

बदलते रिश्ते
तू बनती माँ मेरी

ना जाने कैसे
मेरे ज़ज्बात समझ जाती
ना जाने कैसे
मेरी  हर बात समझ जाती

मेरे हर पल का
हिसाब रखती
शायद अपनी एक आँख
मेरे पास रखती
हर गम दर्द मिट जाता
जब मेरे माथे पर हाथ धरती

मुझे थपकीयाँ देती
सांत्वना देती
राह सुझाती
जीना सिखाती
गाड़ी धीरे चलाने को कहती
वक़्त पर घर आने को कहती

माँ  तेरे जाने के बाद
सब कहते थे
इस जनम में
वापस लौट के ना आएगी तू
पर देख आख़िर तुझे मैने
पा लिया इसी जिंदगी मे दुबारा
मेरी बिटिया
मेरी माँ


Wednesday, July 27, 2011

वो दिन भी कितने अच्छे थे

वो दिन भी कितने अच्छे थे
जब हम छोटे बच्चे थे
छोटी सी निकर में
हम सब गलियों घुमा करते थे...

हम अपने दोस्तो से
जब कत्ति मीठी करते थे,
उनसे दुश्मन जैसे लड़ते थे.
.जिन के बिन हम 2 पल भी
नही रह सकते थे....

जब उँचे उँचे झाड़ो पर
हम झट से चढ़ जाया करते थे..
डर लगने पर..
मौत से क्या डरना
गाया करते थे...

जब हाथ में गन लेकर
हम हेलो अल्फ़ा बीटा करते थे..
और ना दिखने वाले दुश्मन को
तिस्कियाओं तिस्कियाओं कर
मारा करते थे....

वो चित्रहार के दिन थे..
वो मोगली सबको प्यारा था..
वो कंचे तारे जैसे थे
गोविंदा सारे जान्हा से न्यारा था...

जब नानी के यान्हा का
का हलवा बहुत ही खास था..
जब फलो का राजा जाम था..
और पीपल मे चुड़ाइलो का वास था

जब पापा के बाजार से आते ही
हमारे चेहरे खिल जाया करते थे
वो मुच्हर अंकल टॉफ़ी देते थे
जिनसे हम सबे जीयादा डरते थे.

वो स्कूलओ के दिन थे
वो भूतो के कहानी वाली राते थी.
दोस्तों की शामे थी..
और 100 झूठ वाली बाते थी..

वो दिन भी कितने अच्छे थे
जब हम छोटे बच्चे थे
जब बड़े भिया के साथ
हम मैच खेलने जाया करते थे..
20-20 के उस मैच  वे बस
हमसे फीलडिंग करवाया करते थे..

Continue...............

Thursday, June 9, 2011

प्रश्न

धरती पर होने वाली सबसे घृणितअपराध के लिए मृत्य दंड के प्रावधान
 का आव्हान करते हुए एक प्रश्न के रूप मे रची व्यथा.....


http://kavita.hindyugm.com/2007/10/blog-post_08.html


चार-पाँच कुत्ते
दरिंदे

एक मासूम सी बिल्ली को
घेरकर झपटते
नोचते-खसोटते
रात के सन्नाटे को चीरती
करूण चीखें

हिचकी लेती आवाज
आँसू से भरी आँखें
टूटती हर साँस
जैसे कहती -मुझे छोड़ दो!



पर शायद वह नहीं जानती
कि रात के अंधकार में
इन वहशियो के लिए वह
है केवल शिकार, माँस
भूख मिटाने का साधन, एक तन
वह नहीं है किसी की माँ, बेटी, बहन



मासूम से छौनी
निष्प्राण

एक नहीं दो नहीं
हैवान को शर्मिंदा कर
देने वाले ये पाँच
शव को भोगते
खसोटते

सिसकती भूमि
रोता आसमान
लाचार,

पूछते प्रश्न ,



हे कन्हैया

क्यों नहीं आए रक्षा को
मैं द्रोपदी नहीं इसीलिए
पर तुम तो जगत रक्षक हो
फिर क्यों नहीं आए
प्रिय भाई! क्यों नहीं



हे धरती माँ !
सीता को जगह दे दिया,
तो आज फिर क्यों नहीं आज
आप का सीना फटा,
क्या मैं आपकी पुत्री नहीं
माँ! क्या मैं आपकी पुत्री नहीं



हे भोले, हे परम पिता
जानती हूँ आप हो,
पर शायद न देख पाए
मेरे साथ होता दुष्कर्म!
शायद मेरी चीखें ही
न पहुँच पायी होंगी तुम तक
नहीं है आपका मेरे साथ
हुए पाप में कोई दोष
पर एक गलती तो किया तुमने
मुझे भोग्या बनाकर- नारी बनाकर। 

Friday, June 3, 2011

अपने शहर


15 साल हो गये ...घर गये......अपने शहर गये भिलाई के पास 1 छोटा सा शहर वरदा ..
मेरी नज़र मे दुनिया का सबसे खूबसूरत शहर...जॅन्हा जन्मा..जॅन्हा खेल कर बड़ा हुआ...
जिसकी गंध मेरे तन मे बसी हुई है....स्टेशन पर उतरते हुए...करीब 20 साल पीछे चला जाता हूँ....

ना जाने क्यों कुछ अजीब सा लग रहा है...1 खुशी भी है.अपने शहर मे आने की...और दर्द भी..
मैं घर जा रहा हू..ऐसे घर जॅन्हा कोई ना होगा.......वॅन्हा पहुच कर खुश होना है या रोना है...
समझ नही पा रहा

यादो के साथ बहता मैं अपने घर की ओर जाता जा रहा हूँ की टेक्सी वाले की आवाज़ से ...वर्तमान मे आता हूँ
साब किधर जाना है...यान्हा से..ये है एंपी नगर.

मैं उसे रास्ता बताने लगता हू....दिल मे कुछ धुकधुकी सी हो रही...
आखिकार आ ही जाता है......मेरा घर...ताला लगा हुआ घर... कोई नही रहता..

पिछली बार करीब 15 साल पहले जब आया था....तो पापा लेने स्टेशन आए थे..
गाड़ी के घर के  रुकते ही देखा माँ बाहर थी...
और जैसे ही मैं पैर पर झुका...आपने गले से लगा लिया था...

आँखो मे नमी आ जाती है...माँ कॅन्हा हो...वापस आ जाओ ना..देखो मैं लौटा हू...मिलना है..
माँ .....तेरे गले लगना है....

तभी हवा का 1 ठंडा झोंका....आता है...और मेरी रुलाई सी छूट पड़ती है....

ताला खोल के अंदर देखते हुए कैसा लग रहा है शब्दो मे बता पाना मुस्किल है...
बिल्कुल खाली .....जैसे निर्वात....कोई समान नही..बस 1 दरी बिछी है सामने..जान्हा शायद हमारी पुरानी बाई
का बेटा सोता है.....मेरे दिमाग़ मे 15 साल पुराना घर घूमने लगता है...वो पलंग..कॅलंडर..शोकेस..टीवी..
सोफा..सब के सब जैसे वैसे के वैसे है..लगता है जैसे...
अभी ही दीदी आके कहेगी.."ले भाई चाय पी..जब तक नहाने का पानी गरम कर रही हू..."

छुटकी आ के पैर छुएगी और कहेगी...भाई मेरे लिए क्या लाया...और मैं जैसे ही
उसके लिए लाया ---- कुर्ता,जीन्स दूँगा मेरे गले लग जाएगी......

पर नही.....सब आपने-2 घर है...यान्हा तो बस एक ख़ालीपन है........

पल भर को तो ऐसा लगता है...जैसे घर की दीवारे मेरी तरफ बढ़ रही है.....
जैसे मुझे दबा देना चाहती है.
समेट लेना चाहती हो अपने इतिहास मे....मैं डर सा जाता हू.....पर तभी ध्यान आता है...
इस गहर की 1-2 ईएंट...मेरे पापा की मेहनत का पसीना है...उनकी यादे है इसमे..कुछ नही है...
पापा ही बसे है जैसे...

सीडियो चढ़ता छत  पर जाता हू..जान्हा बचपन मे स्केटिंग किया करता था.....
लग रहा था की ज़मीन पर लोट जाउ..सिने लग जाउ अपने घर के...
समा लूँ सब कुछ पुराना अपने रूह मे......
....कैसे भी पुराने दिन आ जाए.....

माँ मुझे खाना खाने को पुकारे..."बेटा नीचे आजा, खाना बन गया है"
और फिर दीदी को बोले "जा पकड़ के ला तेरे भाई को....."   

पर उपर के कमरे की चाभी नही......

नीचे आता हूँ...और नये कमरे(इसका ना हम तीनो भाई बहन ने रखा था जो बाद मे नया बना था)..
जान्हा हम 3नो भाई बहन सोया करते थे......रतजगा करते थे....बदमाशयिओ की प्लानिंग प्लॉटिंग करते थे..
जान्हा छोटे से जोक पर हम इतना हंसा करते थे......की माँ की नींद उचट जाती और हम सब पर चिल्लाति..
सोते हो तुम तीनो की आउँ मैं...ये शब्द कानो मे गूँज रहे हैं.....

हल्का अंधेरा है यान्हा..सीलन की गंध है और....कुछ बॉटले फीकी है...शायद कच्चे शराब की है....
मितलि सी आती है....ऐसा  नही की मैं पीता नही..1-2 बार देसी भी पी है..
ना जाने क्यों फिर भी....इस घर मे ऐसी बोतल आएगी कभी ना सोनचा था.....

पूरा खाली घर...कोई समान नही....कानो मे सन्न्न...कुछ आवाज़ आ रही है......

लंबी दूरी से थकान सी है......सोने को जी कर रहा है.....
नहाने के लिए टॉवेल निकलता हूँ. बाथरूम का फर्श टूटा हुआ है.....
शावर मे जंग लग गया है......पर पानी आ रहा है....नहा के..पूजा कमरे की बदता हू तो कदम
ठिठक से जाए है...माँ-पापा के जाने के बाद...भगवान ने भी अपने कमरा छोड़ दिया है....
पर कुछ निशान है अब भी..दीवार पर सिंदूर लगा है...उसी सिंदूर को भगवान मान के पूजा करता हू....

फिर सामने कमरे की दरी पर चादर बिछाकर....धोती....जो  पापा ने मुझे 15 साल पहले आते हुए दी थी..
ओढ़ कर सो जाता हू.....

करीब शाम के 5 बजे आँख खुली.....ठंड का दिन है..सूरज डूब सा गया है...
इन 15 सालो मे पहली बार सुकून की नींद....सोया तो ऐसा महशुस हो रहा था...
की जैसे माँ की लोरिया कानो मे गूँज रही है....
आख़िर अपना घर अपना ही होता है...

जारी............