Saturday, March 10, 2012

नीम का पेड़

सबका बचपन लगभग एक जैसा ही होता है...मैने यान्हा जो लिखा है...या तो आपने इस जिया है,देखा है ...या फिर कन्हि पढ़ा है...
इसे किस्सा कहे..जीवन का एक छोटा भाग कहे..हमेशा जाना पहचाना सा लगता है....शायद इसे पढ़कर आपको अपना बचपन याद आ जाए..


तो लगभग आज से सालो पहले जैसा की बहुत आम होता था....ख़ासकर छोटे शहरों मे ....हर घर मे एक आँगन ज़रूर होता था...
जिसमे लोग फुलो के साथ भाजियाँ..और भाजियों के साथ घरेलू औषधियाँ लगते थे....साथ ही साथ उस आँगन मे कभी अमरूद का ,कभी आम का तो कभी नीम का पेड़ होता था

ठीक वैसे ही मेरे घर मे ..मेरे आँगन मे भी 1 मांझला नीम का पेड़ था..मनझला इसलिए क्योंकि वो ना तो काफ़ी बड़ा और पुराना था...ना ही छोटा .

उसका इतिहास मुझे याद नही वो कैसे बड़ा हुआ..कब लगा ..पर इतना जॅरुर मालूम है की..मेरे कक्षा 7 मे पहुचने पर वो इतना ज़्यादा बड़ा था की मेरा भार उठा लेता,
इतना उँचा की उसके सबसे उपर की टहनी पर मैं बैठ सकता था..वान्हा से मेरे पूरे मोह्हले पेर निगरानी रख सकता था..

मेरा उस नीम के पेड़ से काफ़ी गहरा नाता था...सुबह 6 बजे उठ के मैं सबसे पहले उसी नीम के पेड़ के नीचे जाता..उसकी नीचे की टहनी पर बैठ के आराम से ब्रश करता..
स्कूल से जैसे ही वापस आता..बिना खाना खाए हाथ मुँह धोए ..बस जूते मोजे उतार कर नीम के पेड़ पर चढ़ जाता....वॅन्हा मुझे ऐसी शांति और खुशी मिलती जिसकी कुछ तुलना माँ की गोद से की जा सकती है...माँ खाना लगा के बिना कन्हि मुझे ढूँढे..नीम के पेड़ के नीचे आ कहती होती."मुनु खाना लग गया है बेटा ,नीचे आजा:...
100 बार समझती की गिर जाएगा..पर मैं नही मानता..मुझे अपने उपर कम भरोसा था..पर नीम के पेड़ पर कन्हि ज़्यादा की मुझे गिरने नही देगा...
मान हमेशा डरती की मैं गिर जाउन्गा..पर मैं नीम के पेड़ से कभी नही गिरा..

मुझे कुछ भी खाने को मिलता,,आम केला ,सेव,मिक्स्चर.बिस्कट..ऐसी कोई भी चीज़ मैं लेता और झट से नीम के पेड़ पर चढ़ जाता...नीम के पेड़ पर उनका स्वाद शायद तब बढ़ जाया करता था..मैने वान्हा छोटी छोटी पॉलिथीन लटका रखी थी...जिसमे मैं बचे हुवे फल,बञिसकुत और मिक्स्चर रखता...

मेरी नयी हर कॉमिक्स भी मैं नीम के डाल पर ही पढ़ता..कुछ थोड़ी उँचाइयों पर ..वनहा काफ़ी पत्तिया थी..और 3 से चार डन्गाल आपसे मे इतने पास थे की मैं उस पर लेट सकता था...और पत्तो की झुर्मुट में किसी को दिखाई भी नही देता...

वो कुछ मेरे भाई जैसा था.....सच मे मुझे याद है जब भी  मैं ज़्यादा खुश होता ..उसके तने से लिपट जाया करता...उसे प्यार किया करता
वो मेरे बचपन का एक हिस्सा था...मेरा यार था..मेरा भाई था..

गर्मी के दिनो मे तो वो हमारे दोपहर काटने का स्थान था...जेब मे 1-1 रुपय रखे 2 रईस ..मैं और मेरा बचपन का दोस्त विकी.. कुलफी वाले का इंतज़ार करते..जो 50 पैसे मे 2 आइस्क्रीम दिया करता..और फिर वोन्हि.आइसक्रीम पकड़े नीम के पेड़ पर चढ़ते..जो की काफ़ी ज़्यादा मुस्किल काम था...भले ही कुछ आइस्क्रीम पिघल जाती..पर हम पेड़ पेर चढ़ कर ही उसे खाते....

उन दिनो वीडियो गेम नया नया आया थे और हमरे पड़ोस मे 1 तीसरे दोस्त पीयूष के यान्हा नया वीडियो गेम था..और उससे भी खुशी की बात ये थी की..अंकल और आंटी  ऑफीस जाते थे.....और उन पर नज़र रखने का काम भी उसी नीम के पेड़ से हुआ करता..और अंकल आंटी का जाना होता और मेरा और विक्की का नीम के पेड़ से उतर कर..पीयूष के घर मे आना होता....वो हमसे 2 साल छोटा था..उसे बहला फुसला के ...हम दोनो मारिओ का गेम घंटे भर मन भर के खेलते..और अंकल आंटी के आने से पहले रफ्फुचक्कर हो जाते...

मेरा बचपन के सनडे का तीसरा हिस्सा उसी नीम के पेड़ पर बीतता....


एक समय आया की अचानक से हमारा घर छोटा पडने लगा...और मेरे 100 बार मना करने पर भी वो काट दिया गया..वान्हा नया कमरा बन गया..मुझे याद नही मैने खाना पीना छोड़ा. की नही.या फिर रोया ..पर इतना याद है की मैं कभी कभी उसे याद करके दुखी हुआ करता..बहुत ज़्यादा दुखी..

"तू मेरा भाई..
मेरा दोस्त..
मेरे बचपन का
सबसे अटूट हिस्सा
तुझे मैं खो कर
आज भी रोता हू..
सच मे  दोस्त मेरे..
मैं तुझे आज भी
बहुत मिस करता हूँ...

और आज का जैसा रिवाज है...उसी अंदाज मे ..."आई लव यू..एंड आई मिस यू"

और भगवान से प्राथना करता हूँ की भगवान बचपन मे सबको एक नीम का पेड़ ज़रूवर दें.....आमीन
 

Monday, October 24, 2011

तेरे नाम


एक बात
तेरे साथ
तेरे ख्वाब
मेरे साथ
एक रात
तेरे साथ
मेरी दीपावली


एक गीत
तेरे संग
एक प्रीत
तेरे संग
हर एक रंग
तेरे संग
मेरी होली

एक हँसी
तेरे नाम
एक खुशी
तेरे नाम
एक चाँद
तेरे नाम
मेरी ईद

Thursday, August 18, 2011

जिंदा हूँ मैं


 मेरे जेब मे थे
बस १० रुपय
और तूने चुकाया था
१०० रुपय का वो उधार
जो तूने कभी लिया ही नही
मेरे जेब मे थे
बस १० रुपय
और तूने ज़िद करके
पानी पूरी खाया था
और दोनों
ही बार मैने तुझे
बड़ी वाली गाली दी थी

कई बार पिए हम
साथ में
तेरी कॉलेज वाली
के बर्थ डे पर
तेरी पहली वाली की शादी पर
तेरे कॅंपस प्लेसमेंट पर
साला रात भर पीते
दिन भर औंकते
उनसे बढ़ कर आज भी
कोई पल नही
आज भी कोई पार्टी नही
सच मे भाई......

जिंदगी के बहुत सारे
पल अमर कर दिए
विल्स गोल्डफ्लेक
के धुओं मे...
तेरे साथ...
गुमटीयों मे

मेरी उससे भी ज़्यादा
तू ही याद आता है मुझे

साला जब पी के बोलता है तू
आई लव यू ब्रो
जब टल्ली मे बोलता है
आई मिस यू ब्रो
लगता है की
जिंदा हूँ मैं

Saturday, August 13, 2011

चाहिए एक और जे. पी.

देश के विकास का
विधान हमको चाहिए
भ्रष्टाचार के लिए मौत
का प्रावधान
हमको चाहिए
देश का लूटा
हर एक समान
हमको चाहिए

काले धन की पाई पाई
का हिसाब हमको चाहिए
फाँसी पर लटकते
अफ़ज़ल कसाब हमको चाहिए
हाँ चाहिए कश्मीर एकछत्र
सिंध पंजाब पूरा चाहिए

देश मे राष्ट्रीयता की
एक आँधी
हमको चाहिए
हाँ चाहिए एक और जे. पी.
मोहन वाला गाँधी
हमको चाहिये.....

Sunday, July 31, 2011

बिटिया

बहुत दिनों बाद
भीगी थी ये आँखे
तेरे आने की खुशी में
तुझे देख कर
तू मेरी नन्ही परी

मेरा दिल गाता  था
जब तू किलकती
मुस्कुराती
मेरी आँखे भर जाती थी
जब अपने नन्हे हान्थो से
मेरी मूँछे नाक छूती
गाल सहलाती

जब घुटनो के बल
चलती,
मेरे पास आती
मेरी गोद में खेलती
सोती समाती
मुझे बातें करती
तुतलाती

तू लता सी
बढ़ती
फ्राक से
सलवार कमीज़ तक
पल में पहुचती

बदलते रिश्ते
तू बनती माँ मेरी

ना जाने कैसे
मेरे ज़ज्बात समझ जाती
ना जाने कैसे
मेरी  हर बात समझ जाती

मेरे हर पल का
हिसाब रखती
शायद अपनी एक आँख
मेरे पास रखती
हर गम दर्द मिट जाता
जब मेरे माथे पर हाथ धरती

मुझे थपकीयाँ देती
सांत्वना देती
राह सुझाती
जीना सिखाती
गाड़ी धीरे चलाने को कहती
वक़्त पर घर आने को कहती

माँ  तेरे जाने के बाद
सब कहते थे
इस जनम में
वापस लौट के ना आएगी तू
पर देख आख़िर तुझे मैने
पा लिया इसी जिंदगी मे दुबारा
मेरी बिटिया
मेरी माँ


Wednesday, July 27, 2011

वो दिन भी कितने अच्छे थे

वो दिन भी कितने अच्छे थे
जब हम छोटे बच्चे थे
छोटी सी निकर में
हम सब गलियों घुमा करते थे...

हम अपने दोस्तो से
जब कत्ति मीठी करते थे,
उनसे दुश्मन जैसे लड़ते थे.
.जिन के बिन हम 2 पल भी
नही रह सकते थे....

जब उँचे उँचे झाड़ो पर
हम झट से चढ़ जाया करते थे..
डर लगने पर..
मौत से क्या डरना
गाया करते थे...

जब हाथ में गन लेकर
हम हेलो अल्फ़ा बीटा करते थे..
और ना दिखने वाले दुश्मन को
तिस्कियाओं तिस्कियाओं कर
मारा करते थे....

वो चित्रहार के दिन थे..
वो मोगली सबको प्यारा था..
वो कंचे तारे जैसे थे
गोविंदा सारे जान्हा से न्यारा था...

जब नानी के यान्हा का
का हलवा बहुत ही खास था..
जब फलो का राजा जाम था..
और पीपल मे चुड़ाइलो का वास था

जब पापा के बाजार से आते ही
हमारे चेहरे खिल जाया करते थे
वो मुच्हर अंकल टॉफ़ी देते थे
जिनसे हम सबे जीयादा डरते थे.

वो स्कूलओ के दिन थे
वो भूतो के कहानी वाली राते थी.
दोस्तों की शामे थी..
और 100 झूठ वाली बाते थी..

वो दिन भी कितने अच्छे थे
जब हम छोटे बच्चे थे
जब बड़े भिया के साथ
हम मैच खेलने जाया करते थे..
20-20 के उस मैच  वे बस
हमसे फीलडिंग करवाया करते थे..

Continue...............

Thursday, June 9, 2011

प्रश्न

धरती पर होने वाली सबसे घृणितअपराध के लिए मृत्य दंड के प्रावधान
 का आव्हान करते हुए एक प्रश्न के रूप मे रची व्यथा.....


http://kavita.hindyugm.com/2007/10/blog-post_08.html


चार-पाँच कुत्ते
दरिंदे

एक मासूम सी बिल्ली को
घेरकर झपटते
नोचते-खसोटते
रात के सन्नाटे को चीरती
करूण चीखें

हिचकी लेती आवाज
आँसू से भरी आँखें
टूटती हर साँस
जैसे कहती -मुझे छोड़ दो!



पर शायद वह नहीं जानती
कि रात के अंधकार में
इन वहशियो के लिए वह
है केवल शिकार, माँस
भूख मिटाने का साधन, एक तन
वह नहीं है किसी की माँ, बेटी, बहन



मासूम से छौनी
निष्प्राण

एक नहीं दो नहीं
हैवान को शर्मिंदा कर
देने वाले ये पाँच
शव को भोगते
खसोटते

सिसकती भूमि
रोता आसमान
लाचार,

पूछते प्रश्न ,



हे कन्हैया

क्यों नहीं आए रक्षा को
मैं द्रोपदी नहीं इसीलिए
पर तुम तो जगत रक्षक हो
फिर क्यों नहीं आए
प्रिय भाई! क्यों नहीं



हे धरती माँ !
सीता को जगह दे दिया,
तो आज फिर क्यों नहीं आज
आप का सीना फटा,
क्या मैं आपकी पुत्री नहीं
माँ! क्या मैं आपकी पुत्री नहीं



हे भोले, हे परम पिता
जानती हूँ आप हो,
पर शायद न देख पाए
मेरे साथ होता दुष्कर्म!
शायद मेरी चीखें ही
न पहुँच पायी होंगी तुम तक
नहीं है आपका मेरे साथ
हुए पाप में कोई दोष
पर एक गलती तो किया तुमने
मुझे भोग्या बनाकर- नारी बनाकर।