धरती पर होने वाली सबसे घृणितअपराध के लिए मृत्य दंड के प्रावधान
का आव्हान करते हुए एक प्रश्न के रूप मे रची व्यथा.....
http://kavita.hindyugm.com/2007/10/blog-post_08.html
का आव्हान करते हुए एक प्रश्न के रूप मे रची व्यथा.....
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| चार-पाँच कुत्ते | ||
| दरिंदे | ||
| एक मासूम सी बिल्ली को | ||
| घेरकर झपटते | ||
| नोचते-खसोटते | ||
| रात के सन्नाटे को चीरती | ||
| करूण चीखें | ||
| हिचकी लेती आवाज | ||
| आँसू से भरी आँखें | ||
| टूटती हर साँस | ||
| जैसे कहती -मुझे छोड़ दो! | ||
| पर शायद वह नहीं जानती | ||
| कि रात के अंधकार में | ||
| इन वहशियो के लिए वह | ||
| है केवल शिकार, माँस | ||
| भूख मिटाने का साधन, एक तन | ||
| वह नहीं है किसी की माँ, बेटी, बहन | ||
| मासूम से छौनी | ||
| निष्प्राण | ||
| एक नहीं दो नहीं | ||
| हैवान को शर्मिंदा कर | ||
| देने वाले ये पाँच | ||
| शव को भोगते | ||
| खसोटते | ||
| सिसकती भूमि | ||
| रोता आसमान | ||
| लाचार, | ||
| पूछते प्रश्न , | ||
| हे कन्हैया | ||
| क्यों नहीं आए रक्षा को | ||
| मैं द्रोपदी नहीं इसीलिए | ||
| पर तुम तो जगत रक्षक हो | ||
| फिर क्यों नहीं आए | ||
| प्रिय भाई! क्यों नहीं | ||
| हे धरती माँ ! | ||
| सीता को जगह दे दिया, | ||
| तो आज फिर क्यों नहीं आज | ||
| आप का सीना फटा, | ||
| क्या मैं आपकी पुत्री नहीं | ||
| माँ! क्या मैं आपकी पुत्री नहीं | ||
| हे भोले, हे परम पिता | ||
| जानती हूँ आप हो, | ||
| पर शायद न देख पाए | ||
| मेरे साथ होता दुष्कर्म! | ||
| शायद मेरी चीखें ही | ||
| न पहुँच पायी होंगी तुम तक | ||
| नहीं है आपका मेरे साथ | ||
| हुए पाप में कोई दोष | ||
| पर एक गलती तो किया तुमने | ||
| मुझे भोग्या बनाकर- नारी बनाकर। | ||
Bahut hi Unda Pradarshan.
ReplyDelete1 No. 143
Drapadi aur Seeta k udaharan ke madhyam se kavita purush pradhaan bhartiya samaj ki mansikta par kathor prahaar kar rahi hai...bahut umda veechaar aur usse bhi behatareen Shaili...The time has come to subvert the popular paradigm that women is no more than a lust toy...
ReplyDeleteThank for such a nice comment anurag...:)
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