Thursday, November 29, 2012

पत्नी

बिनू बात दृग वर्षा करे
काँपत है हिय मोय
जियरा धक धक धूप धूप करे
देख सजन को रोय,
देख सजन  को रोय
पाठक मन घबराए
किए लाख जतन
की पत्निजी दे मुस्काय

काफ़ी करके जोड़ तोड़
और करके गहन अनुसंधान
कुछ सुत्र हम पा गये.
नित कीजिए प्रयोग श्रीमान

तारीफ साले की कीजिए
और ससुर को कहिए महान
सासू को अम्मा कहिए
ससुराल सा नही जहान
इतने पर जो ना हुआ काम
तो लीजिए ये ब्रम्‍ह ज्ञान
"पत्नी सहेली निंदा
और पड़ोसन बुराई
है रामबन"

अंत में २ दोहे .....

रहत रहत पत्नी संग,होशियार होय मूर्खवान
चौबीस घंटा सर सवार,बदन पर करत निशान

( नोट :बदन पर बेलन,चिमटे का निशान)

जो पति उत्तम परकृति,का करी सकट कुसंग,
तिल तिल कर के है जिए,बिनू मित्र बिनू रम

Friday, September 7, 2012

मैं फिर से जिंदा होना चाहता हूँ


माँ तेरी याद बहुत सताती है..

इस दूर बड़े
महानगर के सन्नाटो में
जब डर सा कभी मैं जाता हूँ..
अंजाने अजनबी शहर के
रुखेपन से घबरा जाता हूँ
जब बिन मतलब के
यूँ ही रोने का जी करता है..
जब थॅकी हुई किसी शाम
को सोने का जी करता है..
जब किसी झपकी के झोके
संग बचपन की यादे आती हैं
सच कहता माँ मैं
तेरी याद बहुत सताती है..


अनमने उलझे मन से
भूखे पेट जब सोता हूँ
तो लगता है तू उठ के
खाने को मनुहार करे..
लल्ला राजा बेटा कहकर
माँ तू मुझे प्यार करे..

काली काली रातो के
काले सपनो से
जब भी डर सा जाता हूँ..
रोने वाली चोट पर
जब आँसू नही बहा पता हूँ.
जब सर्दी वाली रातों में
घंटो नींद नही आ पाती है
सच कहता हूँ माँ
तेरी गोदी की गर्माहट वाली
नींद लोरी थपकीयाँ
बहुत याद आती है..

माँ मैं लौट के वापस आना चाहता हूँ
तेरे साए में जीना चाहता हूँ
मैं छोटा होना चाहता हूँ
ज़िद करके रोना चाहता हूँ
मैं रेत मे खेलना चाहता हूँ
मैं गंदा होना चाहता हूँ
माँ  मैं फिर से जिंदा होना चाहता हूँ

Monday, August 6, 2012

अगर मैं कहूँ

अगर मैं कहूँ की प्यार है तुमसे
तो मानोगी नही
है ना....
पर जो सच है सो सच है
है ना....
कहो ना..

तुम आई कुछ बहार सी
सावन की पहली फुहार सी
प्यारी गुड़िया सी..
मेरी प्रिया सी...
शरमाती इठलाती....
मुस्कुराती...
मेरी सपनो की राजकुमारी सी

जीवन की बगिया मे
खिलती तुम
कुमुदनी के फूल सी
सांसो मे घुलती
धरती पर पड़ते
वर्षा के बूँदो से
उठती सौंधी सी
सुगंध सी

अगर मैं फिर कहूँ की
प्यार है तुमसे
तो मानोगी
 है ना....
क्योंकि जो सच है सो सच है
है ना....
कहो ना..

Thursday, August 2, 2012

मुझे नरक ही देना भगवान

मैं दुखी हूँ अपने देश के हालत पर

मैं जलता हूँ दिल मे दिल मे
देश के हालत देखकर..
और चीखते और गालियाँ देते हुए
दूसरो को
सोना चाहता हूँ चादर मे दुब्बकर

मैं रोता हूँ
उदास होता हू
हाथ पर हाथ धरकर
मैं दुखी हूँ अपने देश के  हालत पर

हर पल करना
चाहता हूँ आराम
और अच्छी नींद
चाहे पड़ोस मे हो
दंगे हत्याएँ
जघन्य अपराध
मुझे पिज़्ज़ा और पकोडे वाली भूख है
जबरन बंद करता हूँ कान
और आँख
मुझे सब माफ़ है
अपने आसपास होते हुए पाप
को करते हुए अनदेखा
मैं ओढ़ता हूँ मखमली चादर
खाते हुए चाय पराठे
सब मरे
मेरी बला से

वो 7 दिन से भूखा है
देश के लिए
मर जाए मेरे ठेंगे से
मैं हँसता हूँ सबके साथ उस पर
जान कर भी की कैसे छटपटाता हूँ
1 दिन उपवास रहकर

मैं महस्वार्थी
कायर
दूसरो की दुख पर
चुटकले गढ़नेवाला
मैं 2 दिनों वाला
पाखंडी देशभक्त हूँ
मक्कार हूँ
गुलाम हूँ
मैं नकारा इंसान हूँ

जलते हुए देश
और खुद के अंदर उबलते
लहू पर
रोज डालता हूँ हंसकर पानी
और आज से 100 साल बाद मर का जाना
चाहता हूँ स्वर्ग..

मुझे नरक ही देना भगवान



"हर तरफ फैला अंधेरा है..
जितना पाप सबका है..
उससे दुगना मेरा है.."

Saturday, March 10, 2012

नीम का पेड़

सबका बचपन लगभग एक जैसा ही होता है...मैने यान्हा जो लिखा है...या तो आपने इस जिया है,देखा है ...या फिर कन्हि पढ़ा है...
इसे किस्सा कहे..जीवन का एक छोटा भाग कहे..हमेशा जाना पहचाना सा लगता है....शायद इसे पढ़कर आपको अपना बचपन याद आ जाए..


तो लगभग आज से सालो पहले जैसा की बहुत आम होता था....ख़ासकर छोटे शहरों मे ....हर घर मे एक आँगन ज़रूर होता था...
जिसमे लोग फुलो के साथ भाजियाँ..और भाजियों के साथ घरेलू औषधियाँ लगते थे....साथ ही साथ उस आँगन मे कभी अमरूद का ,कभी आम का तो कभी नीम का पेड़ होता था

ठीक वैसे ही मेरे घर मे ..मेरे आँगन मे भी 1 मांझला नीम का पेड़ था..मनझला इसलिए क्योंकि वो ना तो काफ़ी बड़ा और पुराना था...ना ही छोटा .

उसका इतिहास मुझे याद नही वो कैसे बड़ा हुआ..कब लगा ..पर इतना जॅरुर मालूम है की..मेरे कक्षा 7 मे पहुचने पर वो इतना ज़्यादा बड़ा था की मेरा भार उठा लेता,
इतना उँचा की उसके सबसे उपर की टहनी पर मैं बैठ सकता था..वान्हा से मेरे पूरे मोह्हले पेर निगरानी रख सकता था..

मेरा उस नीम के पेड़ से काफ़ी गहरा नाता था...सुबह 6 बजे उठ के मैं सबसे पहले उसी नीम के पेड़ के नीचे जाता..उसकी नीचे की टहनी पर बैठ के आराम से ब्रश करता..
स्कूल से जैसे ही वापस आता..बिना खाना खाए हाथ मुँह धोए ..बस जूते मोजे उतार कर नीम के पेड़ पर चढ़ जाता....वॅन्हा मुझे ऐसी शांति और खुशी मिलती जिसकी कुछ तुलना माँ की गोद से की जा सकती है...माँ खाना लगा के बिना कन्हि मुझे ढूँढे..नीम के पेड़ के नीचे आ कहती होती."मुनु खाना लग गया है बेटा ,नीचे आजा:...
100 बार समझती की गिर जाएगा..पर मैं नही मानता..मुझे अपने उपर कम भरोसा था..पर नीम के पेड़ पर कन्हि ज़्यादा की मुझे गिरने नही देगा...
मान हमेशा डरती की मैं गिर जाउन्गा..पर मैं नीम के पेड़ से कभी नही गिरा..

मुझे कुछ भी खाने को मिलता,,आम केला ,सेव,मिक्स्चर.बिस्कट..ऐसी कोई भी चीज़ मैं लेता और झट से नीम के पेड़ पर चढ़ जाता...नीम के पेड़ पर उनका स्वाद शायद तब बढ़ जाया करता था..मैने वान्हा छोटी छोटी पॉलिथीन लटका रखी थी...जिसमे मैं बचे हुवे फल,बञिसकुत और मिक्स्चर रखता...

मेरी नयी हर कॉमिक्स भी मैं नीम के डाल पर ही पढ़ता..कुछ थोड़ी उँचाइयों पर ..वनहा काफ़ी पत्तिया थी..और 3 से चार डन्गाल आपसे मे इतने पास थे की मैं उस पर लेट सकता था...और पत्तो की झुर्मुट में किसी को दिखाई भी नही देता...

वो कुछ मेरे भाई जैसा था.....सच मे मुझे याद है जब भी  मैं ज़्यादा खुश होता ..उसके तने से लिपट जाया करता...उसे प्यार किया करता
वो मेरे बचपन का एक हिस्सा था...मेरा यार था..मेरा भाई था..

गर्मी के दिनो मे तो वो हमारे दोपहर काटने का स्थान था...जेब मे 1-1 रुपय रखे 2 रईस ..मैं और मेरा बचपन का दोस्त विकी.. कुलफी वाले का इंतज़ार करते..जो 50 पैसे मे 2 आइस्क्रीम दिया करता..और फिर वोन्हि.आइसक्रीम पकड़े नीम के पेड़ पर चढ़ते..जो की काफ़ी ज़्यादा मुस्किल काम था...भले ही कुछ आइस्क्रीम पिघल जाती..पर हम पेड़ पेर चढ़ कर ही उसे खाते....

उन दिनो वीडियो गेम नया नया आया थे और हमरे पड़ोस मे 1 तीसरे दोस्त पीयूष के यान्हा नया वीडियो गेम था..और उससे भी खुशी की बात ये थी की..अंकल और आंटी  ऑफीस जाते थे.....और उन पर नज़र रखने का काम भी उसी नीम के पेड़ से हुआ करता..और अंकल आंटी का जाना होता और मेरा और विक्की का नीम के पेड़ से उतर कर..पीयूष के घर मे आना होता....वो हमसे 2 साल छोटा था..उसे बहला फुसला के ...हम दोनो मारिओ का गेम घंटे भर मन भर के खेलते..और अंकल आंटी के आने से पहले रफ्फुचक्कर हो जाते...

मेरा बचपन के सनडे का तीसरा हिस्सा उसी नीम के पेड़ पर बीतता....


एक समय आया की अचानक से हमारा घर छोटा पडने लगा...और मेरे 100 बार मना करने पर भी वो काट दिया गया..वान्हा नया कमरा बन गया..मुझे याद नही मैने खाना पीना छोड़ा. की नही.या फिर रोया ..पर इतना याद है की मैं कभी कभी उसे याद करके दुखी हुआ करता..बहुत ज़्यादा दुखी..

"तू मेरा भाई..
मेरा दोस्त..
मेरे बचपन का
सबसे अटूट हिस्सा
तुझे मैं खो कर
आज भी रोता हू..
सच मे  दोस्त मेरे..
मैं तुझे आज भी
बहुत मिस करता हूँ...

और आज का जैसा रिवाज है...उसी अंदाज मे ..."आई लव यू..एंड आई मिस यू"

और भगवान से प्राथना करता हूँ की भगवान बचपन मे सबको एक नीम का पेड़ ज़रूवर दें.....आमीन