माँ तेरी याद बहुत सताती है..
इस दूर बड़े
महानगर के सन्नाटो में
जब डर सा कभी मैं जाता हूँ..
अंजाने अजनबी शहर के
रुखेपन से घबरा जाता हूँ
जब बिन मतलब के
यूँ ही रोने का जी करता है..
जब थॅकी हुई किसी शाम
को सोने का जी करता है..
जब किसी झपकी के झोके
संग बचपन की यादे आती हैं
सच कहता माँ मैं
तेरी याद बहुत सताती है..
अनमने उलझे मन से
भूखे पेट जब सोता हूँ
तो लगता है तू उठ के
खाने को मनुहार करे..
लल्ला राजा बेटा कहकर
माँ तू मुझे प्यार करे..
काली काली रातो के
काले सपनो से
जब भी डर सा जाता हूँ..
रोने वाली चोट पर
जब आँसू नही बहा पता हूँ.
जब सर्दी वाली रातों में
घंटो नींद नही आ पाती है
सच कहता हूँ माँ
तेरी गोदी की गर्माहट वाली
नींद लोरी थपकीयाँ
बहुत याद आती है..
माँ मैं लौट के वापस आना चाहता हूँ
तेरे साए में जीना चाहता हूँ
मैं छोटा होना चाहता हूँ
ज़िद करके रोना चाहता हूँ
मैं रेत मे खेलना चाहता हूँ
मैं गंदा होना चाहता हूँ
माँ मैं फिर से जिंदा होना चाहता हूँ
Beautiful! Yahan videsh mein baithe is kavita k har shabadh ko jeeta hu..
ReplyDeleteThanks Karan bhai.....aur teri bhi yaad mujhe bahoot satati hai ;)..
ReplyDeleteबहुत प्यारी कविता है भईया। सीधे दिल को छू रही है।������ मै पूर्वा
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