सबका बचपन लगभग एक जैसा ही होता है...मैने यान्हा जो लिखा है...या तो आपने इस जिया है,देखा है ...या फिर कन्हि पढ़ा है...
इसे किस्सा कहे..जीवन का एक छोटा भाग कहे..हमेशा जाना पहचाना सा लगता है....शायद इसे पढ़कर आपको अपना बचपन याद आ जाए..
तो लगभग आज से सालो पहले जैसा की बहुत आम होता था....ख़ासकर छोटे शहरों मे ....हर घर मे एक आँगन ज़रूर होता था...
जिसमे लोग फुलो के साथ भाजियाँ..और भाजियों के साथ घरेलू औषधियाँ लगते थे....साथ ही साथ उस आँगन मे कभी अमरूद का ,कभी आम का तो कभी नीम का पेड़ होता था
ठीक वैसे ही मेरे घर मे ..मेरे आँगन मे भी 1 मांझला नीम का पेड़ था..मनझला इसलिए क्योंकि वो ना तो काफ़ी बड़ा और पुराना था...ना ही छोटा .
उसका इतिहास मुझे याद नही वो कैसे बड़ा हुआ..कब लगा ..पर इतना जॅरुर मालूम है की..मेरे कक्षा 7 मे पहुचने पर वो इतना ज़्यादा बड़ा था की मेरा भार उठा लेता,
इतना उँचा की उसके सबसे उपर की टहनी पर मैं बैठ सकता था..वान्हा से मेरे पूरे मोह्हले पेर निगरानी रख सकता था..
मेरा उस नीम के पेड़ से काफ़ी गहरा नाता था...सुबह 6 बजे उठ के मैं सबसे पहले उसी नीम के पेड़ के नीचे जाता..उसकी नीचे की टहनी पर बैठ के आराम से ब्रश करता..
स्कूल से जैसे ही वापस आता..बिना खाना खाए हाथ मुँह धोए ..बस जूते मोजे उतार कर नीम के पेड़ पर चढ़ जाता....वॅन्हा मुझे ऐसी शांति और खुशी मिलती जिसकी कुछ तुलना माँ की गोद से की जा सकती है...माँ खाना लगा के बिना कन्हि मुझे ढूँढे..नीम के पेड़ के नीचे आ कहती होती."मुनु खाना लग गया है बेटा ,नीचे आजा:...
100 बार समझती की गिर जाएगा..पर मैं नही मानता..मुझे अपने उपर कम भरोसा था..पर नीम के पेड़ पर कन्हि ज़्यादा की मुझे गिरने नही देगा...
मान हमेशा डरती की मैं गिर जाउन्गा..पर मैं नीम के पेड़ से कभी नही गिरा..
मुझे कुछ भी खाने को मिलता,,आम केला ,सेव,मिक्स्चर.बिस्कट..ऐसी कोई भी चीज़ मैं लेता और झट से नीम के पेड़ पर चढ़ जाता...नीम के पेड़ पर उनका स्वाद शायद तब बढ़ जाया करता था..मैने वान्हा छोटी छोटी पॉलिथीन लटका रखी थी...जिसमे मैं बचे हुवे फल,बञिसकुत और मिक्स्चर रखता...
मेरी नयी हर कॉमिक्स भी मैं नीम के डाल पर ही पढ़ता..कुछ थोड़ी उँचाइयों पर ..वनहा काफ़ी पत्तिया थी..और 3 से चार डन्गाल आपसे मे इतने पास थे की मैं उस पर लेट सकता था...और पत्तो की झुर्मुट में किसी को दिखाई भी नही देता...
वो कुछ मेरे भाई जैसा था.....सच मे मुझे याद है जब भी मैं ज़्यादा खुश होता ..उसके तने से लिपट जाया करता...उसे प्यार किया करता
वो मेरे बचपन का एक हिस्सा था...मेरा यार था..मेरा भाई था..
गर्मी के दिनो मे तो वो हमारे दोपहर काटने का स्थान था...जेब मे 1-1 रुपय रखे 2 रईस ..मैं और मेरा बचपन का दोस्त विकी.. कुलफी वाले का इंतज़ार करते..जो 50 पैसे मे 2 आइस्क्रीम दिया करता..और फिर वोन्हि.आइसक्रीम पकड़े नीम के पेड़ पर चढ़ते..जो की काफ़ी ज़्यादा मुस्किल काम था...भले ही कुछ आइस्क्रीम पिघल जाती..पर हम पेड़ पेर चढ़ कर ही उसे खाते....
उन दिनो वीडियो गेम नया नया आया थे और हमरे पड़ोस मे 1 तीसरे दोस्त पीयूष के यान्हा नया वीडियो गेम था..और उससे भी खुशी की बात ये थी की..अंकल और आंटी ऑफीस जाते थे.....और उन पर नज़र रखने का काम भी उसी नीम के पेड़ से हुआ करता..और अंकल आंटी का जाना होता और मेरा और विक्की का नीम के पेड़ से उतर कर..पीयूष के घर मे आना होता....वो हमसे 2 साल छोटा था..उसे बहला फुसला के ...हम दोनो मारिओ का गेम घंटे भर मन भर के खेलते..और अंकल आंटी के आने से पहले रफ्फुचक्कर हो जाते...
मेरा बचपन के सनडे का तीसरा हिस्सा उसी नीम के पेड़ पर बीतता....
एक समय आया की अचानक से हमारा घर छोटा पडने लगा...और मेरे 100 बार मना करने पर भी वो काट दिया गया..वान्हा नया कमरा बन गया..मुझे याद नही मैने खाना पीना छोड़ा. की नही.या फिर रोया ..पर इतना याद है की मैं कभी कभी उसे याद करके दुखी हुआ करता..बहुत ज़्यादा दुखी..
"तू मेरा भाई..
मेरा दोस्त..
मेरे बचपन का
सबसे अटूट हिस्सा
तुझे मैं खो कर
आज भी रोता हू..
सच मे दोस्त मेरे..
मैं तुझे आज भी
बहुत मिस करता हूँ...
और आज का जैसा रिवाज है...उसी अंदाज मे ..."आई लव यू..एंड आई मिस यू"
और भगवान से प्राथना करता हूँ की भगवान बचपन मे सबको एक नीम का पेड़ ज़रूवर दें.....आमीन
इसे किस्सा कहे..जीवन का एक छोटा भाग कहे..हमेशा जाना पहचाना सा लगता है....शायद इसे पढ़कर आपको अपना बचपन याद आ जाए..
तो लगभग आज से सालो पहले जैसा की बहुत आम होता था....ख़ासकर छोटे शहरों मे ....हर घर मे एक आँगन ज़रूर होता था...
जिसमे लोग फुलो के साथ भाजियाँ..और भाजियों के साथ घरेलू औषधियाँ लगते थे....साथ ही साथ उस आँगन मे कभी अमरूद का ,कभी आम का तो कभी नीम का पेड़ होता था
ठीक वैसे ही मेरे घर मे ..मेरे आँगन मे भी 1 मांझला नीम का पेड़ था..मनझला इसलिए क्योंकि वो ना तो काफ़ी बड़ा और पुराना था...ना ही छोटा .
उसका इतिहास मुझे याद नही वो कैसे बड़ा हुआ..कब लगा ..पर इतना जॅरुर मालूम है की..मेरे कक्षा 7 मे पहुचने पर वो इतना ज़्यादा बड़ा था की मेरा भार उठा लेता,
इतना उँचा की उसके सबसे उपर की टहनी पर मैं बैठ सकता था..वान्हा से मेरे पूरे मोह्हले पेर निगरानी रख सकता था..
मेरा उस नीम के पेड़ से काफ़ी गहरा नाता था...सुबह 6 बजे उठ के मैं सबसे पहले उसी नीम के पेड़ के नीचे जाता..उसकी नीचे की टहनी पर बैठ के आराम से ब्रश करता..
स्कूल से जैसे ही वापस आता..बिना खाना खाए हाथ मुँह धोए ..बस जूते मोजे उतार कर नीम के पेड़ पर चढ़ जाता....वॅन्हा मुझे ऐसी शांति और खुशी मिलती जिसकी कुछ तुलना माँ की गोद से की जा सकती है...माँ खाना लगा के बिना कन्हि मुझे ढूँढे..नीम के पेड़ के नीचे आ कहती होती."मुनु खाना लग गया है बेटा ,नीचे आजा:...
100 बार समझती की गिर जाएगा..पर मैं नही मानता..मुझे अपने उपर कम भरोसा था..पर नीम के पेड़ पर कन्हि ज़्यादा की मुझे गिरने नही देगा...
मान हमेशा डरती की मैं गिर जाउन्गा..पर मैं नीम के पेड़ से कभी नही गिरा..
मुझे कुछ भी खाने को मिलता,,आम केला ,सेव,मिक्स्चर.बिस्कट..ऐसी कोई भी चीज़ मैं लेता और झट से नीम के पेड़ पर चढ़ जाता...नीम के पेड़ पर उनका स्वाद शायद तब बढ़ जाया करता था..मैने वान्हा छोटी छोटी पॉलिथीन लटका रखी थी...जिसमे मैं बचे हुवे फल,बञिसकुत और मिक्स्चर रखता...
मेरी नयी हर कॉमिक्स भी मैं नीम के डाल पर ही पढ़ता..कुछ थोड़ी उँचाइयों पर ..वनहा काफ़ी पत्तिया थी..और 3 से चार डन्गाल आपसे मे इतने पास थे की मैं उस पर लेट सकता था...और पत्तो की झुर्मुट में किसी को दिखाई भी नही देता...
वो कुछ मेरे भाई जैसा था.....सच मे मुझे याद है जब भी मैं ज़्यादा खुश होता ..उसके तने से लिपट जाया करता...उसे प्यार किया करता
वो मेरे बचपन का एक हिस्सा था...मेरा यार था..मेरा भाई था..
गर्मी के दिनो मे तो वो हमारे दोपहर काटने का स्थान था...जेब मे 1-1 रुपय रखे 2 रईस ..मैं और मेरा बचपन का दोस्त विकी.. कुलफी वाले का इंतज़ार करते..जो 50 पैसे मे 2 आइस्क्रीम दिया करता..और फिर वोन्हि.आइसक्रीम पकड़े नीम के पेड़ पर चढ़ते..जो की काफ़ी ज़्यादा मुस्किल काम था...भले ही कुछ आइस्क्रीम पिघल जाती..पर हम पेड़ पेर चढ़ कर ही उसे खाते....
उन दिनो वीडियो गेम नया नया आया थे और हमरे पड़ोस मे 1 तीसरे दोस्त पीयूष के यान्हा नया वीडियो गेम था..और उससे भी खुशी की बात ये थी की..अंकल और आंटी ऑफीस जाते थे.....और उन पर नज़र रखने का काम भी उसी नीम के पेड़ से हुआ करता..और अंकल आंटी का जाना होता और मेरा और विक्की का नीम के पेड़ से उतर कर..पीयूष के घर मे आना होता....वो हमसे 2 साल छोटा था..उसे बहला फुसला के ...हम दोनो मारिओ का गेम घंटे भर मन भर के खेलते..और अंकल आंटी के आने से पहले रफ्फुचक्कर हो जाते...
मेरा बचपन के सनडे का तीसरा हिस्सा उसी नीम के पेड़ पर बीतता....
एक समय आया की अचानक से हमारा घर छोटा पडने लगा...और मेरे 100 बार मना करने पर भी वो काट दिया गया..वान्हा नया कमरा बन गया..मुझे याद नही मैने खाना पीना छोड़ा. की नही.या फिर रोया ..पर इतना याद है की मैं कभी कभी उसे याद करके दुखी हुआ करता..बहुत ज़्यादा दुखी..
"तू मेरा भाई..
मेरा दोस्त..
मेरे बचपन का
सबसे अटूट हिस्सा
तुझे मैं खो कर
आज भी रोता हू..
सच मे दोस्त मेरे..
मैं तुझे आज भी
बहुत मिस करता हूँ...
और आज का जैसा रिवाज है...उसी अंदाज मे ..."आई लव यू..एंड आई मिस यू"
और भगवान से प्राथना करता हूँ की भगवान बचपन मे सबको एक नीम का पेड़ ज़रूवर दें.....आमीन
Wah Neem ka Ped :)
ReplyDeleteKya Baat! Kya Baat! Kya Baat!.
ReplyDeleteLagta hai aapne Neem ke ped se kaafi swaad uthaya hai.
Abhi vo ped hota to aapne ye blog bhi usi per beth kar post kiya hota.
Anyways bahut khoob likha hai Rahul Sir.
You should keep it up. :D
Bahut hi prashanshniy rachna likhi hai Pathak Sahab....Bharat ek khoj , Hum Log , in sab mai bhi kripya aap apni rachnao ko vistrat roop de aap se yeh nevedan hai....btw bro..its awesome nd really after reading this i am remembering my Nem ka Ped which is on Satna....Keep It Up bro :)
ReplyDeleteREALY GOOD SIRJI.........
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