Thursday, August 2, 2012

मुझे नरक ही देना भगवान

मैं दुखी हूँ अपने देश के हालत पर

मैं जलता हूँ दिल मे दिल मे
देश के हालत देखकर..
और चीखते और गालियाँ देते हुए
दूसरो को
सोना चाहता हूँ चादर मे दुब्बकर

मैं रोता हूँ
उदास होता हू
हाथ पर हाथ धरकर
मैं दुखी हूँ अपने देश के  हालत पर

हर पल करना
चाहता हूँ आराम
और अच्छी नींद
चाहे पड़ोस मे हो
दंगे हत्याएँ
जघन्य अपराध
मुझे पिज़्ज़ा और पकोडे वाली भूख है
जबरन बंद करता हूँ कान
और आँख
मुझे सब माफ़ है
अपने आसपास होते हुए पाप
को करते हुए अनदेखा
मैं ओढ़ता हूँ मखमली चादर
खाते हुए चाय पराठे
सब मरे
मेरी बला से

वो 7 दिन से भूखा है
देश के लिए
मर जाए मेरे ठेंगे से
मैं हँसता हूँ सबके साथ उस पर
जान कर भी की कैसे छटपटाता हूँ
1 दिन उपवास रहकर

मैं महस्वार्थी
कायर
दूसरो की दुख पर
चुटकले गढ़नेवाला
मैं 2 दिनों वाला
पाखंडी देशभक्त हूँ
मक्कार हूँ
गुलाम हूँ
मैं नकारा इंसान हूँ

जलते हुए देश
और खुद के अंदर उबलते
लहू पर
रोज डालता हूँ हंसकर पानी
और आज से 100 साल बाद मर का जाना
चाहता हूँ स्वर्ग..

मुझे नरक ही देना भगवान



"हर तरफ फैला अंधेरा है..
जितना पाप सबका है..
उससे दुगना मेरा है.."

7 comments:

  1. aapki is kavita main jo desh bhakti ka ras hai.wo bahut hi uttsahwardhak hai.isse malum chalta hai ki aap ek jane mane rachaita hai..issi tarah apni rachna se shrotayo ka dil jeette rahiye...
    Danyabaad

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  2. Ho sakta hai kanhi chuk hui ho..aage dhyan rakha jayega

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  3. मुझे भी नरक देना भगवान
    क्यों की मुझे दिक्कार है खुद के कायर होने पर
    बिडम्बना यह है कि मैं भी कुछ कर नही सकता अपने देश के लाचार हालात पर।।



    Rahul bhaiya apki kavita ne rula diya. ��

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  4. मुझे भी नरक देना भगवान
    क्यों की मुझे दिक्कार है खुद के कायर होने पर
    बिडम्बना यह है कि मैं भी कुछ कर नही सकता अपने देश के लाचार हालात पर।।



    Rahul bhaiya apki kavita ne rula diya. ��

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