Monday, November 20, 2023
मेरे पुरन मासी का चाँद
रविवार की
अलसही सुबह सी
कुछ धुली
कुछ उजली
अनसुलझे खुले
बाल
काजल की
आँखों पर
हल्की सी रेखा
और तुम हो गई
पुरन मासी का चाँद
थका सा वक्त
और थका मन
पर तुम्हारी
हल्की सी मुस्कान
फिर
जैसे पौ फटने
पर हो जाती है
एक सुंदर सुबह
बस वैसा ही कर देती हो
सुंदर
तनमन
जीवन
मेरे कई सारे
सुने अनसुने
कहावतों कविताओं की
जिंदा सी तस्वीर हो
तुम
या फिर
ऐसे कहूँ क्या
तुम हो एक साकार रूप
सीप मे छिपी मोती का
फूल मे चमकते ओस का
प्रभात की हो लालिमा
शरद पूर्णिमा वाले चाँद
छिटकी चाँदनी
या कह दूं तुम्हें
बरसात की
मेरी पसंदीदा फुहार
जैसे हर पल हर क्षण
बढ़ती है उम्र चुपचाप
वैसे ही
बढ़ रहा है प्रेम
मेरा मेरे
मूक मौन
आप
फिर से यही कहूँगा
जैसे राम की सीता
बस वैसे
मेरी अमृता
Monday, October 30, 2023
मेरे पापा का गाँव - पार्ट-१
ये हमारे होश सम्हालने के बाद बिहार और अपने पापा के गाँव जाने की पहली यात्रा थी ..उस जगह की जहाँ मेरे पापा ने अपना बचपन बिताया.. हम ३ भाई बहन अपनी किशोरा अवस्था में थे...और उनके बचपन से कई किस्से-कहानियाँ सुनी थी... कैसे एक बड़े तालाब मे पापा तैराकरते....वो गन्ने के खेत जहाँ से कोई भी कितने भी गन्ने तोड़ के खा सकता था.......खेतों के पास गन्ने से बनते गुड और सिरे..मिठाई...वो तालाब जिसके सामने ही माँ भवानी का मंदिर था....कैसे गाँव फागुन का रंग होता..होली ३ दिन तक खेली जाती...एक गाँव से दूसरे गाँव लोगों में होली का हुड़दंग होता...... कैसे लोग ज़बरदस्ती भांग वाली मिठाई खिलाते..पापा और उनके बचपन के दोस्तो के किस्से...वो नहर जिसे पर करके बाढ़ के समय स्कूल जाना होता था... चने बूट से भरे खेत....वो पेड़..वो गिल्ली डंडा का खेल...वो हॉकी..वो आम का बागान..पेड़ो पर चढ़ना..और कई तरह के गाँव के खेल....एक बड़ा ही आकर्सन था हमे....मुझे तो अपने पापा छोटे से ये सारे काम करते दिखते थे....सारे क़िस्सो के दौरान मै उनके बालक रूप को सोंच सोंच के मन मे बड़ा हंसता और खुश होता...
इन सबका एक खाका सा मन मे बन गया था...कल्पनाओ में हम सबने तालाब ..भवानी मंदिर...नहर ...जामुन का पेड़..खेत खलिहान सब देखा था..
इन सबको साकार देखने बड़े उत्साह के साथ हम बस में जा रहे थे....पूरे २४ घंटे की जर्नी थी..रोमांचक....बिहार की सीमा में हम रात को पंहुचे...जो की नक्सल प्रभावित था...और ठीक कुछ दूरी पर हमारी बस खराब हो गई..उस समय बिहार अपने जंगल राज से बदनाम था.. बस हमारी खराब हुई एकदम जंगल वाले इलाक़े में और वो भी काली रात. में..हर तरफ अंधेरा...सभी के मन में डर ...लोग आते हुए ट्रक रुकवा के लिफ्ट ले रहे थे...हम सब भी बस से अपना समान नीचे ला कर किसी नेक ट्रक वाले का इंतज़ार करने लगे...चारो तरफ केवल सुनेपन की आवाज थी..घोर अंधकार ...रोड के उस पर मैने पहली बार इतने सारे जुगनुओ को एक साथ चमकते देखा.....दूर दूर तक सन्नाटा था...रोड पर आते केवल इक्के दुक्के ट्रक इन सन्नाटो को चीर रहे थे...सबकी जान सांसत मे थी . पर होइहि सोइ जो राम रचि राखा जपते हुए सब शांत दिखने की कोशिश कर रहे थे...कुछ ही देर मे एक भले से ट्रक ड्राइवर ने हमे लिफ्ट दिया..और हम पंहुच गये ...डेहरी ऑन सोन रेलवे स्टेशन....जहाँ से आगे की यात्रा ट्रेन से होने वाली थी..
ये ९० का दशक था..जब आप अपने यात्रा के दौरान ..खाने पीने का पूरा सामान साथ ले के चलते थे....पूरी भूनजिया और ठेकुआ....ये ३नो का भरपूर स्टॉक था. और हाथ मे ठेकुआ लेकर मै रेलवे स्टेशन की न्यारी दुनिया देखने लगा... ..कई सारी रेहाड़िया...छोटे खोमचे...प्लॅटफॉर्म पर अपनी चादर बिछा कर सुस्ताते लोग...ट्रेनो की सिटी और वो अनाउन्स्मेंट ..ट्रेनो की आवाजाही ...हमारी ट्रेन लेट थी..हम सभी प्लॅटफॉर्म पर बेडशीट बिछा कर बैठ गये और पूरी भूनजिया का भोग चालू हुआ......पापा कुछ समान लाने बाहर जा रहे थे साथ मे मै भी हो लिया....ज़्यादा कुछ याद नही पर होटेल वाले लीटी चोखा से मेरा पहला एनकाउंटर था शायद वो ....छोटे से रोड साइड होट्ल में लिट्टी चोखा प्याज़ चटनी...एक अलग ही स्वाद और फीलिंग ...
ट्रेन से पटना पंहुचे...मामा आगये थे माँ को ननिहाल ले जाने..और आगे की हमारी यात्रा में बस पापा और हम ३ भाई बहन ही थे..और ये हमारे लिए और भी मज़े की बात थी...क्यूंकी पापा से हमे डाट ना के बराबर मिलता था तो पिटाई का कोई ख़ौफ़ ही नही था...खैर ऐसे वैसे कैसे कैसे...हम पंहुच गये ...मेरे पापा के गाँव आमसरी..सुबह के ५ बजे का समय था.....बस रुकी..हम समान के साथ उतरे..और बस ने हमे हॉर्न के साथ विदा किया.... रोड पर थे बस पापा ,दोनो बहन ,मैं और समान....चोरो तरफ और कोई भी नही... सुबह की शीतल हवा...और सामने थी हमारी कल्पना की उड़ान और उनकी सच्ची तस्वीरें....नहर ..और उस पर बना पुल और खेतो को शृंखला.... जब भी पापा अपना गाँव याद करते ये दोनो को जिक्र ज़रूर होता....हम सबने अपना समान उठाया..और चल दिए गाँव की ओर..
साथ चल रही पापा के पहचान की हवा..सड़क....मैं पापा की फीलिंग्स को समझ पा रहा था शायद...भोर होने का आरंभ हो चुका था....
आसमान मे लालिमा आने लगी थी....और थोड़े ही देर मे खेतों ,तालाबों ,झाड़ी को पार करते हुए गाँव के घर आने लगे थे.....हम ३नो भाई बहनों ने जो कल्पना की थी उससे काफ़ी अलग था सब....
Friday, June 30, 2023
मेरे पापा बेसटेस्ट
बात कुछ पुरानी है.. ना ही कथा है ना ही कहानी है....और डरने की बात नहीं ये कविता भी नहीं है...मैं ये अपने लिए लिख रहा हूँ ताकि वो बिता हुआ पल फिर से जी सकूँ...और आप अगर इसे पढ़ कर मेरे साथ उस पल को जिएं तो मुझे कोई एतराज भी नहीं है
तो बात तब की है जब मैं एक छोटा सा ..होनहार...और अपने पापा का आग्याकारी बेटा था....कुल जमा सातवीं क्लास मे था...ना ही पूरा किशोर ..और ना ही छोटा बालक....वो नब्बे के दशक का समय था...पापा के पास सेकंड हैंड राजदूत आई.. कुछ समय बाद पापा ने जब महसूस किया की हाथ थोड़ा साफ हो गया है, तो उन्होने एक लॉन्ग राइड का प्लान किया...वैसे वो समय लॉन्ग राइड का नहीं था...आपको कुछ काम निकालना पड़ता था..
हमारा एक छोटा सा हिन्दी मीडियम स्कूल था जिसके कर्ता धर्ता पापा ही थे...कर्ता धर्ता मतलब -प्रिंसिपल, टीचर,-स्टेनो जो भी हो सब का काम वो खुद ही किया करते थे...उस समय शिक्षा विभाग हमारे शहर से कुछ ६० कि.मी. दूर एक दूसरे जिले मे था..पापा ने प्लान बनाया वहां जाने का ..और साथ में मुझे भी ले जाने का ..
खैर अगले दिन सुबह हम दोनो निकल गये ...पापा के पेट पर अपने छोटे से हाथ का सुरक्षा घेरा डाले पीछे बैठा मैं दाँये बाँये सिर घुमाता जीवन के इस समय का आनंद ले रहा था....और थोड़े ही देर में हम अपने शहर को छोड कर बाहर निकल लिए...रोड के दोनो तरफ हरे हरे खेत ...गाँव..पेड़..ठंडी हवा...कच्चे पक्के मकान..नाले..तालाब...वो हर चीज़ जो आँखों को आकर्षित करती है..
पापा रास्ते में पड़ते पेड़ ..फूल ...गाँव .नहर ...रबी की फसल..खरीफ की फसल सबके बारे मे बताते हुए चल रहे थे...राजदूत की फटफट में मैं आधी बात ही सुन पा रहा था.. मुझे हल्की हल्की भूख लग रही थी...मैने पापा को बोला की भूख लगी है....और पापा समझ गये एक छोटे बच्चे को बाहर निकलने पर जो भूख लगती है, वो घर से लाए रोटी सब्जी से नही भरती.... पापा बोले ..थोड़ी देर में रुकते हैं कन्हि....और करीब ५ कि.मी. चलने पर एक छोटी सी टपरी रोड साइड पर थी..बाहर २ बड़े बड़े गंज रखे थे..एक घड़ा था और साथ में कांच के बड़े से जार में समोसे रखे थे....
रोड के इस पार ये तपरी जैसा ढाबा ..और उस पार बह रही थी नहर...सूरज सर पर आने वाला था..पापा ने पूछा क्या है आपके पास बच्चे के लिए....समोसा तो दिख ही रहा था तो उत्तर में दुकानदार ने दोनो गंज के ढक्कन खोल दिए,...एक मे गरमा गरम हरी पीली मटर की चाट थी और दूसरे में गरम गुलाबजामुन...पापा ने मेरी तरफ देखा ..और मैने बिना समय गंवाए मटर की तरफ ..पापा ने एक प्लेट मटर का ऑर्डर कर दिया..थोड़े ही ही देर में मेरे हाथ में एक स्टील के पतली सी प्लेट में थी हरी पीली गरमा गरम मटर की पानी वाली चाट....सच कहूँ तो ऐसा टेस्ट कभी भुला नही जा सकता...लाल कलर के प्लास्टिक की कुर्सी....अच्छी ख़ासी धूप...और साथ मे गरम तीखी पानी वाली चाट ..उस उम्र मे और उस दौर मे इससे ज़्यादा मैं शायद भगवन् से और कुछ मांग भी नहीं सकता था....पर ऐसा सच में नहीं था..कोने में जमीन मे एक गोल्ड स्पॉट(उस समय की एक कोल्ड ड्रिंक) का एक कैरेट बार बार मुझे अपनी और देखने पर मजबूर कर रहा था....हाफ प्लेट चाट खाने के बाद अब मेरा आधा ध्यान चाट पर और आधा ध्यान गोल्ड स्पॉट पर ....ऐसा नही था की मैं अपने पापा से डरता था..और मैं एक गोल्ड स्पॉट लेने नहीं बोल सकता था...शायद ये उस दशक के बच्चों मे एक शर्म थी...या यूँ कहे अनुशासन था..एक झिझक थी.....मैने चाट ख़तम की....पापा से नज़रेचुरा कर ..ठंडी आह के साथ गोल्ड स्पॉट को भरपूर नज़रों से देखा....और वापस जर्नी स्टार्ट करने के लिए रेडी सा हो गया....मैने पापा को बोला चलें अब...पापा मुस्कुरा कर बोले हां चलते हैं......और फिर दुकानदार को पैसे देते हुए बोले ..ये एक गोल्ड स्पॉट की बोतल भी जोड़ लेना...
वो कहते हैं ना..माइ पापा इस बेस्ट...बस मैं जोड़ से वोही चिल्लाना चाहता था....पर मुँह मे फँसी गोल्ड स्पोर्ट बोतल की गर्दन ने ऐसा होने नहीं दिया ...और २-३ सांस में मैंने पूरी बोतल पेट मे उडेल ली....पापा मुझे खड़े मुस्कुराते देखते रहे...ऐसी मुस्कान या तो आप छोटे से बच्चों मे या फिर पोपले मुँह वाले बूढ़ो मे ही देख पाएंगे ..प्योर..निर्मल..सरल...सुंदर..
और फिर २-३ किक और पापा की राजदूत फिर स्टार्ट...पेट भर गया था...मन तृप्त था और मैं आसपास की छोड़ इस सोंच मे डूबा था की जेब में पैसे होने पर भी पापा चाट पकौड़ी या पानीपुरी क्यों नही खाते...जैसे आज भी नहीं खाए...और किसी मेले मे भी नही खाते..उल्टे अपने हिस्से की मिठाई हमको बाँट देते हैं....मेरे लिए दुनिया का सबसे बड़ा आश्चर्य था ये...कोई कैसे अपने हिस्से का कलाकंद किसी और को दे सकता है...जब भी वो ऐसा करते तो मैं उनसे कलाकंद ले के चुपचाप उनको ताकते हुए बस यही दुविधा में रहता था....
खैर कई सारे खेत, कुँए, ६० कि.मी. लंबी सड़क को क्रॉस कर हम पहुंचे शिक्षा विभाग....काम बड़ा नहीं था ..हम पहुंचे दुबे जी के पास..उनके कक्ष में...पापा ने उन्हे किया नमस्कार और उनको देख मैने भी हाथ जोड़ दिए..दुबे जी ने १० इंच के स्माइल के साथ पापा को नमस्कार किया और मुझे देख के बोले वाह पाठकजी लड़का तो होनहार है आपका...बस यही से वो मैने होनहार का तमगा लिया जो आपने इस प्रसंग के शुरुआत मे पढ़ा था... दुबे जी ने अपने सहायक को बोला पाठक जी के लिए चाय और बच्चे के लिए रसगुल्ला ले आओ...पापा ने हाथ जोड़ के बोला अरे नहीं दुबे जी...चाय तो रास्ते में ही हो गई..अभी थोड़ी देर पहले....ये फाइल पर आप साइन बस कर दीजिए...दुबे जी मुस्कुराते हुए बोले...ठीक है पाठक जी जैसा आप बोलें....अपने मातहत को चाय का मना कर दुबे जी बोले बस बच्चे के लिए रसगुल्ला ले आओ...पापा ने फाइल साइन करवाई...और ५ मिनिट्स इधर उधर की बात कर बोले ...चलता हूं दुबे जी...दुबे जी ने भी हाथ जोड़ नमस्कार कर विदा दे दिया....
और मैं रसगुल्ले का क्या होगा इस टेंशन मे आ गया..और कुर्सी में ही चिपक कर बैठा रहा ..पापा ने मेरा हाथ अपने हाथ मे ले लिया..मैं बोलना चाहता था..पापा रसगुल्ला....पर चुप रहा..
२०-२५ कदम चल कर मुझसे रहा नही गया और मैंने बोला पापा रसगुल्ला कौन खाएगा....इतना सुनते ही पापा ज़ोर से हँसने लगे और बोले बेटा कोई रसगुल्ला नहीं आने वाला था..ये तो बस फॉरमॅलिटी है..एक औपचारिकता....मेरे लिए ये नया था...की खिलाना नही है पर बोलना ज़रूरी है खा लो... उफ़ ये अजीब दुनिया...
खैर बाहर आते आते करीब २ बज गये थे....भूख वापस लग गई थी और ये समोसे वाली भूख नहीं थी....पापा ने बोला खाना खाएगा..मैने हाँ में सर हिलाया ....हम दोनो शिक्षा विभाग के पास मे ही एक होटल में बैठे.. पापा ने बोला २ थाली लगाने..मैं चुपचाप बैठा खाने के आने का इंतज़ार करने लगा.....थोड़ी ही देर में दोनों के सामने प्लास्टिक के टेबल पर २ थाली थी....एकदम कुरकुरी भिंडी..गरमा गरम दाल और चावल...टमाटर धनिया की चटनी प्याज और साथ में पापड़...मेरी याददाश्त में बाहर के खाने का शायद ये पहला अनुभव था....और जीवन के इस पड़ाव तक बेस्ट भी....पेट जीभ और मन तीनो धन्य धन्य बोल रहे थे..और मैं सातवें आसमान मे था..सोंच रहा था कि अच्छा हुआ खेलने के चक्कर मे मैने पापा को मना नहीं किया.....खा पीकर हम निकल पड़े ..वापस अपने शहर की ओर....
और जैसा मेरे लिए अनएक्सपेक्टेड था...और शायद आप लोग ने गेस किया होगा...जी हाँ...पापा ने घर जाने से पहले अपनी राजदूत रोकी मधु स्वीट्स की दुकान पर ..और मेरे साथ पूरे घर के लिए पैक कराया रसगुल्ला...
मैं भी चल रहा हूँ उसी पद चिन्ह पर पापा...सब कहते हैं और मैं भी कहूँगा "मेरे पापा बेसटेस्ट"
Tuesday, June 6, 2023
मिलता नहीं है
एक वीभत्स रेल दुर्घटना ...एक करुणड दृश्य के बाद की कविता...
मिलता नहीं है
Sunday, May 14, 2023
मैं जंगल हो जाना चाहता हूँ
जैसे एक नदी
या एक बड़ा सा पेड़
एक चट्टान
या की एक पशु
शिकार या शिकारी
एक उड़ता पंछी
बंदा दो मुझे बस
घास का फूल
या फीओर बहा दो
जैसे चलती है वान्हा
ठंडी शीतल हवा
एक पगडंडी
जान्हा से अभी कोई
नील गाय चीतल
या निकला हो कोई हाथी का
एक परिवारिक झुंड
मैं हो जाना चाहता हूँ
मस्तमौला बंदर
या फिर
एक गिलहरी
कुछ भी कुछ भी
जैसे जंगल का
सूनापन
या फिर एक
सिहरन पैदा करती
दहाड़ चिंघाड़
एक बड़ा सा उँचा पहाड़
बस कुछ भी कैसे भी
मैं बस एक जंगल
हो जाना चाहता हूँ.