बात कुछ पुरानी है.. ना ही कथा है ना ही कहानी है....और डरने की बात नहीं ये कविता भी नहीं है...मैं ये अपने लिए लिख रहा हूँ ताकि वो बिता हुआ पल फिर से जी सकूँ...और आप अगर इसे पढ़ कर मेरे साथ उस पल को जिएं तो मुझे कोई एतराज भी नहीं है
तो बात तब की है जब मैं एक छोटा सा ..होनहार...और अपने पापा का आग्याकारी बेटा था....कुल जमा सातवीं क्लास मे था...ना ही पूरा किशोर ..और ना ही छोटा बालक....वो नब्बे के दशक का समय था...पापा के पास सेकंड हैंड राजदूत आई.. कुछ समय बाद पापा ने जब महसूस किया की हाथ थोड़ा साफ हो गया है, तो उन्होने एक लॉन्ग राइड का प्लान किया...वैसे वो समय लॉन्ग राइड का नहीं था...आपको कुछ काम निकालना पड़ता था..
हमारा एक छोटा सा हिन्दी मीडियम स्कूल था जिसके कर्ता धर्ता पापा ही थे...कर्ता धर्ता मतलब -प्रिंसिपल, टीचर,-स्टेनो जो भी हो सब का काम वो खुद ही किया करते थे...उस समय शिक्षा विभाग हमारे शहर से कुछ ६० कि.मी. दूर एक दूसरे जिले मे था..पापा ने प्लान बनाया वहां जाने का ..और साथ में मुझे भी ले जाने का ..
खैर अगले दिन सुबह हम दोनो निकल गये ...पापा के पेट पर अपने छोटे से हाथ का सुरक्षा घेरा डाले पीछे बैठा मैं दाँये बाँये सिर घुमाता जीवन के इस समय का आनंद ले रहा था....और थोड़े ही देर में हम अपने शहर को छोड कर बाहर निकल लिए...रोड के दोनो तरफ हरे हरे खेत ...गाँव..पेड़..ठंडी हवा...कच्चे पक्के मकान..नाले..तालाब...वो हर चीज़ जो आँखों को आकर्षित करती है..
पापा रास्ते में पड़ते पेड़ ..फूल ...गाँव .नहर ...रबी की फसल..खरीफ की फसल सबके बारे मे बताते हुए चल रहे थे...राजदूत की फटफट में मैं आधी बात ही सुन पा रहा था.. मुझे हल्की हल्की भूख लग रही थी...मैने पापा को बोला की भूख लगी है....और पापा समझ गये एक छोटे बच्चे को बाहर निकलने पर जो भूख लगती है, वो घर से लाए रोटी सब्जी से नही भरती.... पापा बोले ..थोड़ी देर में रुकते हैं कन्हि....और करीब ५ कि.मी. चलने पर एक छोटी सी टपरी रोड साइड पर थी..बाहर २ बड़े बड़े गंज रखे थे..एक घड़ा था और साथ में कांच के बड़े से जार में समोसे रखे थे....
रोड के इस पार ये तपरी जैसा ढाबा ..और उस पार बह रही थी नहर...सूरज सर पर आने वाला था..पापा ने पूछा क्या है आपके पास बच्चे के लिए....समोसा तो दिख ही रहा था तो उत्तर में दुकानदार ने दोनो गंज के ढक्कन खोल दिए,...एक मे गरमा गरम हरी पीली मटर की चाट थी और दूसरे में गरम गुलाबजामुन...पापा ने मेरी तरफ देखा ..और मैने बिना समय गंवाए मटर की तरफ ..पापा ने एक प्लेट मटर का ऑर्डर कर दिया..थोड़े ही ही देर में मेरे हाथ में एक स्टील के पतली सी प्लेट में थी हरी पीली गरमा गरम मटर की पानी वाली चाट....सच कहूँ तो ऐसा टेस्ट कभी भुला नही जा सकता...लाल कलर के प्लास्टिक की कुर्सी....अच्छी ख़ासी धूप...और साथ मे गरम तीखी पानी वाली चाट ..उस उम्र मे और उस दौर मे इससे ज़्यादा मैं शायद भगवन् से और कुछ मांग भी नहीं सकता था....पर ऐसा सच में नहीं था..कोने में जमीन मे एक गोल्ड स्पॉट(उस समय की एक कोल्ड ड्रिंक) का एक कैरेट बार बार मुझे अपनी और देखने पर मजबूर कर रहा था....हाफ प्लेट चाट खाने के बाद अब मेरा आधा ध्यान चाट पर और आधा ध्यान गोल्ड स्पॉट पर ....ऐसा नही था की मैं अपने पापा से डरता था..और मैं एक गोल्ड स्पॉट लेने नहीं बोल सकता था...शायद ये उस दशक के बच्चों मे एक शर्म थी...या यूँ कहे अनुशासन था..एक झिझक थी.....मैने चाट ख़तम की....पापा से नज़रेचुरा कर ..ठंडी आह के साथ गोल्ड स्पॉट को भरपूर नज़रों से देखा....और वापस जर्नी स्टार्ट करने के लिए रेडी सा हो गया....मैने पापा को बोला चलें अब...पापा मुस्कुरा कर बोले हां चलते हैं......और फिर दुकानदार को पैसे देते हुए बोले ..ये एक गोल्ड स्पॉट की बोतल भी जोड़ लेना...
वो कहते हैं ना..माइ पापा इस बेस्ट...बस मैं जोड़ से वोही चिल्लाना चाहता था....पर मुँह मे फँसी गोल्ड स्पोर्ट बोतल की गर्दन ने ऐसा होने नहीं दिया ...और २-३ सांस में मैंने पूरी बोतल पेट मे उडेल ली....पापा मुझे खड़े मुस्कुराते देखते रहे...ऐसी मुस्कान या तो आप छोटे से बच्चों मे या फिर पोपले मुँह वाले बूढ़ो मे ही देख पाएंगे ..प्योर..निर्मल..सरल...सुंदर..
और फिर २-३ किक और पापा की राजदूत फिर स्टार्ट...पेट भर गया था...मन तृप्त था और मैं आसपास की छोड़ इस सोंच मे डूबा था की जेब में पैसे होने पर भी पापा चाट पकौड़ी या पानीपुरी क्यों नही खाते...जैसे आज भी नहीं खाए...और किसी मेले मे भी नही खाते..उल्टे अपने हिस्से की मिठाई हमको बाँट देते हैं....मेरे लिए दुनिया का सबसे बड़ा आश्चर्य था ये...कोई कैसे अपने हिस्से का कलाकंद किसी और को दे सकता है...जब भी वो ऐसा करते तो मैं उनसे कलाकंद ले के चुपचाप उनको ताकते हुए बस यही दुविधा में रहता था....
खैर कई सारे खेत, कुँए, ६० कि.मी. लंबी सड़क को क्रॉस कर हम पहुंचे शिक्षा विभाग....काम बड़ा नहीं था ..हम पहुंचे दुबे जी के पास..उनके कक्ष में...पापा ने उन्हे किया नमस्कार और उनको देख मैने भी हाथ जोड़ दिए..दुबे जी ने १० इंच के स्माइल के साथ पापा को नमस्कार किया और मुझे देख के बोले वाह पाठकजी लड़का तो होनहार है आपका...बस यही से वो मैने होनहार का तमगा लिया जो आपने इस प्रसंग के शुरुआत मे पढ़ा था... दुबे जी ने अपने सहायक को बोला पाठक जी के लिए चाय और बच्चे के लिए रसगुल्ला ले आओ...पापा ने हाथ जोड़ के बोला अरे नहीं दुबे जी...चाय तो रास्ते में ही हो गई..अभी थोड़ी देर पहले....ये फाइल पर आप साइन बस कर दीजिए...दुबे जी मुस्कुराते हुए बोले...ठीक है पाठक जी जैसा आप बोलें....अपने मातहत को चाय का मना कर दुबे जी बोले बस बच्चे के लिए रसगुल्ला ले आओ...पापा ने फाइल साइन करवाई...और ५ मिनिट्स इधर उधर की बात कर बोले ...चलता हूं दुबे जी...दुबे जी ने भी हाथ जोड़ नमस्कार कर विदा दे दिया....
और मैं रसगुल्ले का क्या होगा इस टेंशन मे आ गया..और कुर्सी में ही चिपक कर बैठा रहा ..पापा ने मेरा हाथ अपने हाथ मे ले लिया..मैं बोलना चाहता था..पापा रसगुल्ला....पर चुप रहा..
२०-२५ कदम चल कर मुझसे रहा नही गया और मैंने बोला पापा रसगुल्ला कौन खाएगा....इतना सुनते ही पापा ज़ोर से हँसने लगे और बोले बेटा कोई रसगुल्ला नहीं आने वाला था..ये तो बस फॉरमॅलिटी है..एक औपचारिकता....मेरे लिए ये नया था...की खिलाना नही है पर बोलना ज़रूरी है खा लो... उफ़ ये अजीब दुनिया...
खैर बाहर आते आते करीब २ बज गये थे....भूख वापस लग गई थी और ये समोसे वाली भूख नहीं थी....पापा ने बोला खाना खाएगा..मैने हाँ में सर हिलाया ....हम दोनो शिक्षा विभाग के पास मे ही एक होटल में बैठे.. पापा ने बोला २ थाली लगाने..मैं चुपचाप बैठा खाने के आने का इंतज़ार करने लगा.....थोड़ी ही देर में दोनों के सामने प्लास्टिक के टेबल पर २ थाली थी....एकदम कुरकुरी भिंडी..गरमा गरम दाल और चावल...टमाटर धनिया की चटनी प्याज और साथ में पापड़...मेरी याददाश्त में बाहर के खाने का शायद ये पहला अनुभव था....और जीवन के इस पड़ाव तक बेस्ट भी....पेट जीभ और मन तीनो धन्य धन्य बोल रहे थे..और मैं सातवें आसमान मे था..सोंच रहा था कि अच्छा हुआ खेलने के चक्कर मे मैने पापा को मना नहीं किया.....खा पीकर हम निकल पड़े ..वापस अपने शहर की ओर....
और जैसा मेरे लिए अनएक्सपेक्टेड था...और शायद आप लोग ने गेस किया होगा...जी हाँ...पापा ने घर जाने से पहले अपनी राजदूत रोकी मधु स्वीट्स की दुकान पर ..और मेरे साथ पूरे घर के लिए पैक कराया रसगुल्ला...
मैं भी चल रहा हूँ उसी पद चिन्ह पर पापा...सब कहते हैं और मैं भी कहूँगा "मेरे पापा बेसटेस्ट"
Friday, June 30, 2023
मेरे पापा बेसटेस्ट
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Straight from the heart
ReplyDeleteबढ़िया उलेख किया है पुरानी बातो को
ReplyDeletePurani yaade taza ho gayi
ReplyDeleteBahut badhiya chote Pathak ji...
ReplyDeleteBahut he shandar bhaiyya... Pyare Papa😍
ReplyDeleteBahot he sahi rasgullo ka swad yaha tak aa gya hai
ReplyDeleteAs always The Best
ReplyDeleteBahut sahi mitra
ReplyDeleteBohot badiya Pathak sahab
ReplyDeleteWhen words become emotions then it has different impact altogether rahul bhaiya😊
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