ये हमारे होश सम्हालने के बाद बिहार और अपने पापा के गाँव जाने की पहली यात्रा थी ..उस जगह की जहाँ मेरे पापा ने अपना बचपन बिताया.. हम ३ भाई बहन अपनी किशोरा अवस्था में थे...और उनके बचपन से कई किस्से-कहानियाँ सुनी थी... कैसे एक बड़े तालाब मे पापा तैराकरते....वो गन्ने के खेत जहाँ से कोई भी कितने भी गन्ने तोड़ के खा सकता था.......खेतों के पास गन्ने से बनते गुड और सिरे..मिठाई...वो तालाब जिसके सामने ही माँ भवानी का मंदिर था....कैसे गाँव फागुन का रंग होता..होली ३ दिन तक खेली जाती...एक गाँव से दूसरे गाँव लोगों में होली का हुड़दंग होता...... कैसे लोग ज़बरदस्ती भांग वाली मिठाई खिलाते..पापा और उनके बचपन के दोस्तो के किस्से...वो नहर जिसे पर करके बाढ़ के समय स्कूल जाना होता था... चने बूट से भरे खेत....वो पेड़..वो गिल्ली डंडा का खेल...वो हॉकी..वो आम का बागान..पेड़ो पर चढ़ना..और कई तरह के गाँव के खेल....एक बड़ा ही आकर्सन था हमे....मुझे तो अपने पापा छोटे से ये सारे काम करते दिखते थे....सारे क़िस्सो के दौरान मै उनके बालक रूप को सोंच सोंच के मन मे बड़ा हंसता और खुश होता...
इन सबका एक खाका सा मन मे बन गया था...कल्पनाओ में हम सबने तालाब ..भवानी मंदिर...नहर ...जामुन का पेड़..खेत खलिहान सब देखा था..
इन सबको साकार देखने बड़े उत्साह के साथ हम बस में जा रहे थे....पूरे २४ घंटे की जर्नी थी..रोमांचक....बिहार की सीमा में हम रात को पंहुचे...जो की नक्सल प्रभावित था...और ठीक कुछ दूरी पर हमारी बस खराब हो गई..उस समय बिहार अपने जंगल राज से बदनाम था.. बस हमारी खराब हुई एकदम जंगल वाले इलाक़े में और वो भी काली रात. में..हर तरफ अंधेरा...सभी के मन में डर ...लोग आते हुए ट्रक रुकवा के लिफ्ट ले रहे थे...हम सब भी बस से अपना समान नीचे ला कर किसी नेक ट्रक वाले का इंतज़ार करने लगे...चारो तरफ केवल सुनेपन की आवाज थी..घोर अंधकार ...रोड के उस पर मैने पहली बार इतने सारे जुगनुओ को एक साथ चमकते देखा.....दूर दूर तक सन्नाटा था...रोड पर आते केवल इक्के दुक्के ट्रक इन सन्नाटो को चीर रहे थे...सबकी जान सांसत मे थी . पर होइहि सोइ जो राम रचि राखा जपते हुए सब शांत दिखने की कोशिश कर रहे थे...कुछ ही देर मे एक भले से ट्रक ड्राइवर ने हमे लिफ्ट दिया..और हम पंहुच गये ...डेहरी ऑन सोन रेलवे स्टेशन....जहाँ से आगे की यात्रा ट्रेन से होने वाली थी..
ये ९० का दशक था..जब आप अपने यात्रा के दौरान ..खाने पीने का पूरा सामान साथ ले के चलते थे....पूरी भूनजिया और ठेकुआ....ये ३नो का भरपूर स्टॉक था. और हाथ मे ठेकुआ लेकर मै रेलवे स्टेशन की न्यारी दुनिया देखने लगा... ..कई सारी रेहाड़िया...छोटे खोमचे...प्लॅटफॉर्म पर अपनी चादर बिछा कर सुस्ताते लोग...ट्रेनो की सिटी और वो अनाउन्स्मेंट ..ट्रेनो की आवाजाही ...हमारी ट्रेन लेट थी..हम सभी प्लॅटफॉर्म पर बेडशीट बिछा कर बैठ गये और पूरी भूनजिया का भोग चालू हुआ......पापा कुछ समान लाने बाहर जा रहे थे साथ मे मै भी हो लिया....ज़्यादा कुछ याद नही पर होटेल वाले लीटी चोखा से मेरा पहला एनकाउंटर था शायद वो ....छोटे से रोड साइड होट्ल में लिट्टी चोखा प्याज़ चटनी...एक अलग ही स्वाद और फीलिंग ...
ट्रेन से पटना पंहुचे...मामा आगये थे माँ को ननिहाल ले जाने..और आगे की हमारी यात्रा में बस पापा और हम ३ भाई बहन ही थे..और ये हमारे लिए और भी मज़े की बात थी...क्यूंकी पापा से हमे डाट ना के बराबर मिलता था तो पिटाई का कोई ख़ौफ़ ही नही था...खैर ऐसे वैसे कैसे कैसे...हम पंहुच गये ...मेरे पापा के गाँव आमसरी..सुबह के ५ बजे का समय था.....बस रुकी..हम समान के साथ उतरे..और बस ने हमे हॉर्न के साथ विदा किया.... रोड पर थे बस पापा ,दोनो बहन ,मैं और समान....चोरो तरफ और कोई भी नही... सुबह की शीतल हवा...और सामने थी हमारी कल्पना की उड़ान और उनकी सच्ची तस्वीरें....नहर ..और उस पर बना पुल और खेतो को शृंखला.... जब भी पापा अपना गाँव याद करते ये दोनो को जिक्र ज़रूर होता....हम सबने अपना समान उठाया..और चल दिए गाँव की ओर..
साथ चल रही पापा के पहचान की हवा..सड़क....मैं पापा की फीलिंग्स को समझ पा रहा था शायद...भोर होने का आरंभ हो चुका था....
आसमान मे लालिमा आने लगी थी....और थोड़े ही देर मे खेतों ,तालाबों ,झाड़ी को पार करते हुए गाँव के घर आने लगे थे.....हम ३नो भाई बहनों ने जो कल्पना की थी उससे काफ़ी अलग था सब....
Monday, October 30, 2023
मेरे पापा का गाँव - पार्ट-१
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Nice illustration.... Purani yadon ki sath bht khushi aur sath main bht dard bhi aa jata hai 😊
ReplyDeleteपाठक साहब बहुत बढ़िया लिखें हैं, बिहार के उस दौर का अनुभव याद दिला दिए बिल्कुल.
ReplyDeleteKitna accha likha hai bhaiya sari baten... Rat sunshan mai jugnu dekhkar chikhna maje se.. Or nanise dant khana... Phir gaon jakar amsari ka phuchka khana... Gupchup nahi phuchka..
ReplyDeleteBahut umda bhaiya.. har baar padta hu nostalgic ho jata hun, aapki story ka flow bahut umda hai.. bilkul badhkar rakhta hai— Prabhat
ReplyDeleteEk aur khubsurat rachna.. Sajeev chitran..padhte huye aisa lagta hai jaise khud bhi wahin the.. bahut hi badhiya
ReplyDeleteगांव जैसे तिरने लगा हो नजरों के सामने। एक भाव पूर्ण और सजीव चित्रण। वीडियो कैमरे कि इस दुनिया में ऐसी कहानियां और भी प्रासंगिक हैं, अन्यथा नई पीढ़ी मन की आंखों से दृश्य देखना भूल ही जायेगी। कहानी की अंतिम पंक्ति सहसा भाव की धार मोड़ देती है। स्मृतियां ही शेष रह जाती हैं।
ReplyDeleteबहुत ही सजीव लेखन है।
ReplyDeleteराघवेंद्र
पापा की फीलिंग्स को समझ पा रहा हु आज क्यों गांव प्यारा था उनको 😭🙏🏻.. राहुल भैया दिल से धन्यवाद
ReplyDeleteHeart touching and Nostalgic
ReplyDeleteबहुत ही अच्छे से अभिव्यक्त करने की बहुत प्यारी कला है भैया आपके पास.. बहुत अच्छा लगा ये पढ़ के 👌
ReplyDeleteBahut hi umda aur sajeev chitran..hmko bhi baba ke saath pathak bigha ki yatra aakhon ke samne jivant ho gyi
ReplyDeleteBahut hi pyari kahani he bhai.... stress buster hai ek dam ...aur bhi likhna bhai.... from Abhishek Soni
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