शैम्पू से नहाई
रविवार की
अलसही सुबह सी
कुछ धुली
कुछ उजली
अनसुलझे खुले
बाल
काजल की
आँखों पर
हल्की सी रेखा
और तुम हो गई
पुरन मासी का चाँद
थका सा वक्त
और थका मन
पर तुम्हारी
हल्की सी मुस्कान
फिर
जैसे पौ फटने
पर हो जाती है
एक सुंदर सुबह
बस वैसा ही कर देती हो
सुंदर
तनमन
जीवन
मेरे कई सारे
सुने अनसुने
कहावतों कविताओं की
जिंदा सी तस्वीर हो
तुम
या फिर
ऐसे कहूँ क्या
तुम हो एक साकार रूप
सीप मे छिपी मोती का
फूल मे चमकते ओस का
प्रभात की हो लालिमा
शरद पूर्णिमा वाले चाँद
छिटकी चाँदनी
या कह दूं तुम्हें
बरसात की
मेरी पसंदीदा फुहार
जैसे हर पल हर क्षण
बढ़ती है उम्र चुपचाप
वैसे ही
बढ़ रहा है प्रेम
मेरा मेरे
मूक मौन
आप
फिर से यही कहूँगा
जैसे राम की सीता
बस वैसे
मेरी अमृता
🙏🙏🙏
ReplyDeleteBahut khoob kaha hai Pathak ji 🙏🏽
ReplyDelete🌈🎇🎇🎇🎇🎇🎇🎇🎉🎉🎇🎇
ReplyDeleteBeautiful Poem 👌🏻
ReplyDeleteNice
ReplyDeleteNice Poet sahab
ReplyDeleteBeautiful
ReplyDelete