Friday, November 8, 2024

हमारी दीपावली

 तो भीया बन गई दीवाली एक दिन वाली  ...फोड़ लिए पटाखे और खा लिए बाहर से खरीदी मिठाई....मन हो तो चलो आज तुम्हें 90 के दशक की दीवाली की सैर कराता हूँ।

Saturday, August 17, 2024

छावा : संभाजी जी

 
मैं  कलश . कवि कलश... धर्म प्रिय ,न्याय प्रिय ,रणधीर के साथ ज्ञान के साक्षात अवतार प्रभु संभाजी जी महाराज का मित्र..सुनिए हमारी एक छोटी कहानी..

मैने संभाजी को  पहली बार देखा जब शिवाजी महराज औरंगजेब  के द्वारा  दिए शांति प्रस्ताव के छल मे आगरा के किले में  नजरबंद थे....शिवाजी महाराज... साक्षात शंभू ....  शरीर ऐसा की  जैसे स्वयं अर्जुन ..नरश्रेष्ठ. .और संभाजी जैसे  भगवान कार्तिकेय..माँ अंबे के त्रिशूल से रचित महाकाव्य के सर्ग  जैसे संभाजी..

शिवाजी कैसे भी  क़ैद से आज़ाद होने को  व्यग्र थे....उनके मन मे इस बारे मे मंथन जारी था...उन्होंने मुझे और  मेरे परिचित परमानंद जी को संभाजी के सुरक्षा का दायित्व  दिया..शिवाजी जानते थे की शिवाजी  और संभाजी दोनो का साथ मे आगरा से निकलना  लगभग नामुमकिन था.. अपने गले में कौड़ियों की माला पर हाथ फेरते ..  ..संभाजी महाराज से क्षत्रपति ने कहा था..." जल्द मिलेंगे संभा ... ध्यान रखना "

कुछ दिनों के बाद खबर मिली शिवाजी महाराज  शाही सेना को चकमा दे मराठा साम्राज्य सकुशल पंहुच गये ... हम सब ने भी सिंह के शावक को भी  छिपतेछिपाते कुछ माह में रायगढ़  लौटा दिया....इस बीच संभाजी के साथ बिताए हर पल मेरे लिए धरोहर थे...

कई साल बीत गये...औरंगजेब इस्लाम का सहारा ले मुगल साम्राज्य  का विस्तार कर रहा था. .गैर इस्लामिक प्रजा पर प्रतिदिन अत्याचार बढ़ते जा रहे थे.... ..धर्मगुरुओं का निर्ममतापूर्वक हत्या.. जजिया...तलवार के बल पर धर्म परिवर्तन...मंदिरो , मूर्तियों और गर्भगृह का विनाश..हिंद महिलाओं का यौन उत्पीड़न...

अपनी आँखो से मैने मथुरा के मंदिर का विध्वंस देखा....उत्तर मे चारो तरफ त्राहिमाम मचा हुआ था....औरंगजेब के मुगल सिपहसालार हिंदू जनता तलवार की नोक पर विधर्मी बना रहे थे...इस्लाम को ना कहने वालों के लिए बस मृत्यु ही रास्ता थी..

 उधर  दख्खिन  मे  शिवाजी मजबूत होते जा रहे थे.. ..एकमात्र हिंदू राष्ट्र का उदय हो रहा था....औरंगजेब के सारे हथकंडे पैंतरे असफल रहे थे...मराठा सेना ने नाक मे दम कर रहा था...मैं भी एक आशा के साथ  दख्खिन की तरफ कूच किया

 इधरसंभाजी युवराज हो गये थे..लोकप्रिय युवराज जैसे थे युवराज कौशल नंदन श्रीराम... मैने  युवराज संभाजी महाराज को देखा जब वह रायगढ़ के समीप एक शिव मंदिर मे बैठे  आस पास के गाँव वालो की विनती सुन रहे थे  ...एकदम वीरता की सजीव मूर्ति....बलिष्ठ बाहू ...सुदृढ़ सीना...सुकोमल चेहरा..घनी मूँछे ..युवराज ... .मैने आवाज़ लगाई "शंभूऊऊउउ" . .संभाजी ने उठ कर मुझे गले लगा लिया...हमारा भावुक मिलन था कई वर्षो के बाद..


महाराज शिवाजी माँ अंबे की गोद मे लौट चुके थे...अब युवराज नये छत्रपति थे.... संभाजी महराज के नेतृत्व मे मैसूर प्रदेश ,आदिलाबाद  ..और कई किले जीत लिए गये ...हर अभियान पर विजय पताका फहराई जा रही थी...महराज संभाजी का यश बढ़ रहा था

शिवाजी से हर बार मत खाए कुटिल औरंगजेब ने एक विशेष अभियान के तहत विशाल सेना मावल खंड के लिए भेजी....अभियान था संभाजी और मराठा साम्राज्य का पतन

धोखा

महराज सवेश्वर के पास एक मंदिर मे अपने कुछ सेनानायकों संग विश्राम कर रहे थे..........मराठा मीरजाफर गणोजी ने घर का भेद दिया था..
राज्य से गद्दारी की थी....सुबह की लाली ही फूटी थी ..और नीरव शांति को भंग करते हुए जोरो की जंग जारी थी. मुगल फौज  महाराज संभाजी  को घेरे हुई थी....सेनापति म्हलोजी बाबा तलवार से दीवार बने संभू और इख्लास ख़ान की मुगल फौज के बीच खड़े थे....मराठे हर हर महादेव का जयकारा कर रहे थे... साथ मे मुगलिया अल्लाह हू अकबर से गगन गूँज रहा था...म्हलोजी बाबा रणचंडी को अपनी तलवार से मुग़लिया  नरमुंडो की आहुति दे रहे थे

मैं शंभूराजे  के दाहिने हाथ पर रक्षा पंक्ति मे था....महाराज संभाजी मुगल फौज को गाजर मूली की तरह काट रहे थे....अपने घोड़े चन्द्रावत पर सवार साक्षात काल का रूप बने हुए थे...पर मुगल सेना जैसे टिड्डो का फ़ौज़..ख़तम होने होने का नाम ही ले रही थी... श्वानो मे सिंह फँस गया हो ऐसे ही महराज  मुगलों के बीच  फँसे हुए थे... मुगल फ़ौज़ के सैनिकों ने हर तरफ  से महाराज को घेर लिया..हज़ारो के मुगल सेना से मुट्ठी भर मावले सैनिक जूझ रहे थे...म्हलोजी बाबा का तेग भी सैकड़ों की मुग़लिया तादाद के सामने फीका होता जा रहा था... अनेको वार से घायल महावीर बुजुर्ग सेनापति ने आखिरकार अंबे के चरणों मे अपना स्थान सुरक्षित किया ... एक बान मेरे दाहिने हाथ पर लगा और मैं घायल अपने घोड़े से "महाराज" चीत्कार करता नीचे जा गिरा......म्हलोजी बाबा का दुख खत्म नही हुआ था  उस पर  "महाराज"  की मेरी एक करुण पुकार ने संभाजी तलवार की तेज़ी थोड़ी कम कर दिया..संभुराजे ने  अगले पल अपने आपको टिडिदल मे घिरा पाया....तलवार चलाने की जगह भी  नही बची थे.. महराज क़ैद मे थे..साथ मे था मैं ..

आज नराधाम औरंगजेब के जीवन का सबसे  खुशी का दिन था.... दक्खिन जीतने का स्वप्न जीवंत हो उठा... सारा हिन्दुस्तान उसे इस्लाम के झंडे के नीचे नज़र आने लगा था जिस राह के रोड़ा रहे थे साक्षात शंभू अवतार छत्रपति शिवाजी महाराज और मराठे थे..और थे शिवाजी सुता संभाजी

इख्लास ख़ान अपने मुगल फ़ौज़िया पिता फ़ौजदार मुकर्रब ख़ान संग  कैदी संभाजी को ले जल्दी जल्दी निकल पड़ा था कन्हि सुरक्षित दूरी के लिए ताकि अपनी सफलता का जश्न मना सके..... क्यूंकी मावल प्रदेश के सैनिको का डर था...मराठा सेना का छापा वार युद्ध प्रसिद्ध था..शिवाजी के लड़ाके अचानक प्रकट होते और काम करके ऐसे गायब होते की ढूँढे ना मिलते..मुग़लिया सरदार जानता था की मावले अपने महराज के लिए जी जान लगा देंगे

जैसे तैसे महाराज को ले मुगल सेना पहुंच गई बहादुर गढ़ छावनी मे..जान्हा साक्षात था नरपिशाच औरंगजेब जिसने सत्ता के लिए अपने भाइयों और पिता के कत्ल से भी परहेज नही किया था..और अपने धर्म के नाम पर अनगिनत लोगों की हत्या और अंग भंग...महाराज को उनके सबसे बड़े  कर्म.."अपने धर्म की रक्षा" के लिए अपने हाथ से वीभत्स मृत्युदंड देने को उतावला था....

उस नीच आलमगीर  ने फरमान जारी किया मावले राजवंशी  इन "कैदियों" का जुलूस निकाला जाए और बहादुर गढ़ किले तक लाया जाए..महाराज संभाजी और मेरे हाथ बाँध कर और मसखरे जैसे दिखने वाले कपड़े पहना दिए ...चारो तरफ हजारों की भीड़ थी..  जो जोर जोर चिल्ला रहे थे...बहुत से ऐसे थे  जिन्होने ने अभी अभी कलमा पढ़ा था...और अपने आप को ज्यादा  धर्म प्रेमी दिखाने मे उत्साहित हो कंकड़ और अपशब्दों की बौछार किए हुए थे..शोर से हमारी कान फटे जा रहे थे...काफ़िर को मारो...काफ़िर को खिचो......कई मर्माहत करती गालियाँ......

पहले तो हमे रस्सी से बाँध के पैदल घसीटा गया  ..कई बार गिरने जगह जगह से  कपड़े फट गये.....जगह जगह शरीर पर  खुरचने से रक्त आने  लगा था ...कई मन की दूरी हमे घसीटते हुए गये....सारा शरीर छिल गया था फिर भी शक्ति संचित करके हम दोनो फिर खड़े हो उठे..  इस बार बची खुची शक्ति लगाकर शंभुराजे ने रस्सी खींचने वालो को आगे ना बढ़ने में लगा दिया... जब  सैनिको से ना देखा की अब ये ऐसे नही हिलेंगे और उन्हे और ज़ोर लगाना होगा तो  ....हमे को उठा के ऊँट पर टांग दिया गया....और चारो तरफ से कोडो की वर्षा  हो रही थे..हमारे दर्द की सीमा नहीं थी...शरीर का हर अंग रक्त वमन कर रहा था...

जिन शंभू महराज के सामने जनता शीश नवाती थे.. जो शरीर रेशम  के वस्त्र और सोने के आभूषण से सुसज्जित रहते थे उसकी ऐसा दुर्दशा देख के मन रो उठा मेरा..महराज ने मुझे रोता देख धीमे आवाज़ मे पूछा .." क्यूँ रोते हो कलश ...क्यूँ .. अपनी शक्ति बचा के रखो कविराज" और ऐसा कहते हुए स्वयं  बेसुध हो बैठे...मेरी भी आँखें बंद होने लगी..मूर्छा सी छा गई....लोगों का हुजूम और  काफिरों को मारो के नारे  के बीच हम आगे बढ़ रहे थे...
सरेआम हमे मार खाते सहते कई घंटे बीत चुके थे.....और दर्द की परकाष्ठा से महराज संग मैं  कलश बेहोश हो गये...

हमारी आँखे खुली वापस  आलम गीर के दरबार में...सामने मऩहुश औरंगजेब बैठा नमाज़ पढ़ रहा था.... भद्दा चेहरा बूढ़ा परंतु कुटिल ....सामने थे हमारे महराज ...निडर निर्भीक स्वयं शंभू के पुत्र महाराज  संभाजी.....शरीर का पोर पोर दर्द से डूबा था...तथापि महाराज ने दरबार,  औरंगजेब और सभी सिपहसालारों को अनदेखा करते हुए  कहा... कविराज  कहो क्या कहते हो हमे इस दरबार मे देख के.....और मेरा कवि मान फुसफुसा  उठा..

 "राजन तुम हो साँचे ,खूब लड़े तुम जंग,
 तेज तुम्हारा देख के भौचक है औरंग"

दरबार चालू हुआ ...सारे दरबार के सामने ...महराज से उनके शाही दरबार के गुप्तचरों के बारे मे...रायगढ़ के खजाने के बारे मे ..पूछा गया..महराज एकदम दृढ़ शिला के जैसे चुपचाप बैठे रहे.....मुझे भी कभी जागीर का लोभ दिया.. कभी सोने चांदी आभूषण के साथ  जान बख्शने का लोभ दिया...पर यह शरीर तो अब संभाजी का था...धर्म का था....

अंत मे हमें  इस्लाम कबूल करने को कहा गया... महराज का उत्तर सभा के पटाक्षेप के लिए काफ़ी था..
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संभा जी ने गरजते हुए औरंगजेब की आँखो मे आँखे डाल के कहा.... " अधम मुगल सम्राट जीवन के किसी भी क्षण पर मुझे ये मंजूर नही..चाहे तन पर शीश रहे ना रहे... तुम  पूरे मुगल राज्य के  आभूषण स्वर्ण का प्रस्ताव रखो या फिर आलमगीर तुम खुद क्यूँ ना अपनी पुत्री जिन्तुन्निसा का विवाह ही क्यू ना मुझसे करवा दो.. ये शीश केवल माँ अंबे के चरणों मे ही झुकेगा..इस्लाम कतई मंजूर नही"  

आलमगिर का बूढ़ा रक्त काफ़ी देर तक उबलता रहा होगा.....और नतीजा था हमे कालकोठरी....

यातना

हमारा दंड़पत्र आ चुका था.....औरंगजेब का आदेश था वाचाल जिव्हा को काटने का और आंखों की तेज को बुझाने का..... हर दंड महाराज को दो बार भोगना था..क्यूंकी आदेश के अनुसार हर पहला दंड पहले मुझे  को मिलना था फिर महाराज को...

सिपहसालार रूहल्ला ख़ान ने आदेश का तामील किया...पत्थर दिल जल्लादों को चुना गया....लोहे की संड़सी और अंगीठी आ गई थी...काले कलूटे हबशी जल्लादों ने मेरा जबड़ा पकड़ा.. पर मैं केवल कवि ही तो नही था..एक लड़ाका भी था....२-३ हबशी के बस का नहीं था....कुछ और जल्लाद आगे बढ़े और मेरा मुँह खोल दिया.....जिव्हा से विदा लेने का समय आ गया ये  जान के मैने ज़ोर से अंतिम बार अपने स्वामी को प्रणाम कहा....."स्वामी प्रणाम  ......स्वामी प्रणाम....  स्वामी प्रणाम जय भवानी जय चंडी माता" और फिर एक ही झटके मे हबशियों ने मेरी जीभ खिच के ऐसा वार किया की जिभा का टुकड़ा दूर जमीन मे जा गिरा...और २-३ दाँत बाहर आ गये...पूरा शरीर अति वेदना से कांप उठा..मुँह से खून का फ़ौवारा फुट पड़ा ..

महाराज ने बँधे हुए ये दृश्य देखा एक धीमी पुकार लगाई.."कविराज"  ऐसा लगा जैसे अपने बाल राजा को दुलार पूर्वक बुला रहे हैं....मैं अधमरा सा होता ज़मीन पर गिर पड़ा

मेरे दर्द का अन्त नहीं था...मुझे अपने महराज का वोही हाल देखना था जो अभी मेरा हुआ था..१०-१५ हबशियों ने महराज को पकड़ ऐसा ज़ोर लगाया की मूह अपने आप  खुल आया ..एक हबशी ने  संड़सी से जिवहा को पकड़  कर खींचा और फिर ला इलाह चिल्लाते  हुए एक ज़ोर का वार किया ...मुझे महाराज के मुख से आवाज तक नही सुनाई दी ..केवल एक रक्त धारा मुँह से बह रही थी....वो मुख जो हर वक्त जग्दम्बे जग्दम्बे का जप करता था.... वोही क्षत्रीय कुलावंतास श्रीमान माहराज हिंदुपद  गो ब्राह्मण प्रतिपालक संभाजी महराज का मुख रक्त वमन कर रहा था....ये दृश्य देख मेरी आत्मा भी चीत्कार मारती हुई रो पड़ी...

 हमारे दर्द का अंत नहीं था....अब दंड का दूसरा भाग चालू हुआ...सामने गर्म सलाखें लिए जल्लाद को देख मैं समझ गया की  अब आँखो की  बारी है..समय कम था...मैने संभाजी महाराज के लहूलुहान मुख को निहार का अपने चित्त कोष को भरने लगा......ज्यों ज्यों जल्लाद सलाखें लिए आगे बढ़े मैं अपनी आखे  और बड़ी  कर महाराज का मुख निहारता गया....चर्र चर्र और कुछ ही पलों मे दोनों सलाखें  मेरी आँखों की पुतलियों को भेदते हुए निकल गई...मेरे मुँह कटी हुई जिव्हा के कारण केवल आं आं शब्द  फुट पड़ा....

इस बार महाराज की स्पष्ट आवाज़ मेरे कानो मे आई.." मृत्यु से ना डरो कविश्रेष्ठ"   .. लगा असीम दर्द मे भी जैसे औषधि के छींटे आ पड़े

आगे होने वाली घटना मेरे कानो ने देखी ...महराज हर दंड दो बार झेल रहे थे...एक बार मेरा दुख ..फिरउन पर  खुद  बीतता हुआ"
चारो तरफ कोलाहल  था पागल नृशंश जनता इस दंड के मज़े ले रही थी..."अल्लाह हू अकबर ....काफ़िर काफ़िर "का  नारा  सर्वत्र था..

तभी मेरे कानो ने फिर से वही चर्र चर्र की आवाज सुनी....मतलब साफ था की सूर्यबिंब समान संभाजी भोसले महाराज नेत्रहीन हो चुके हैं...ग्राम सलाखें से जलते मांस की गंध मेरे नथुनों मे घुस गये...आं आं कहते महराज का स्वर मेरी पीड़ा को और बढ़ा रहा थे..हमारे नाखून बाल तक उखाड़ लिए गये.... कोलाहल धीरे धीरे शांत हो रहा था..जल्लाद भी हमें सताते सताते शायद थक गये थे...दर्द से हम दोनो की आं आं की निकलती ध्वनि धीर धीरे सब शांत होने लगा...

दर्द से बिलखता मेरा शरीर अपने बचपन से होता हुआ महराज के संग अपनी यादों मे जाने लगा था.......मुझे यकीन था की महराज भी अपने बचपन मे आनी जिजाऊ ,अपनी धाराऊ..आबा साहब.. पत्नी यशुदेवी.. भाई राजाराम ..अपने बालराजा और अपनी बिटिया की यादों मे गुम होंगे..

हम दोनो रह रह कर जिव्हा के अवशिष्ट भाग और जलते नेत्रो मे असीम पीड़ा  से व्याकुल थे....मूह से निकलती थी केवल आंआं  की आवाज़ से..और उसी आं आं की भाषा मे महराज  पीड़ा पर मलहम लगाते और मैं उनके...

क़ैद होने के बाद से हमने अन्न का एक भी दाना नही ग्रहण किया था...हमारे भूखे प्यासे शरीर को ये पीड़ा सहते आठ से नौ दिन हो गये थे...छावनी के कारागार में मुर्गे की बांग से हम दिन  का पता चलता...बस आं आं की  आवाज़ थी जिसे सुन के हमे पता लगता था की अभी हम जिंदा हैं...

नौंवा दिन उदित हुआ..और आलमगीर नया दंड चालू हुआ...इख्लाख़ ख़ान जल्लादों की नई फ़ौज़ लाया और  ज़ोर से चिल्लाया ..
खाल छिल दो इन दोनो काफिरों की.....जैसे कद्दूकस के खोपरा रेता जाता है..वैसे ही हमारे शरीर को कद्दूकस किया जाने लगा..
छुरो से छिलते शरीर से  दर्द के कारण आं आं निकलना भी बंद हो गया....हम दोनो अपने वेदना को दबाए अपने खाल खिचवा लिए...पर तभी एक नया आदेश आया...नमक पानी छिड़को  इन हराम जादो पर..तांबे की चिलमिचिया हिली और नमक पानी के गरम फुवारों से हमरा शरीर दहल गया.....वापस से दोनों के मूह से आं आं आं  की ध्वनि फुट पड़ी...भीषण यातना पूर्ण दंड देख तमाशबीन कोलाहल मचाते रहे. धीरे.. धीरे शोर थम गया...हमारी वेदना बस हम ही जान सकते थे...ऐसी वेदना की मृत्यु भी उस वेदना के आगे मृत्यु भी सुखदायी लगे

उपर आकाश नीला था की काला...अभी दिन था की रात ...हम दोनो बंदी इस समय की सीमा से दूर जा चुके थे...

हमरी आँखे निकालने के बाद चलती यातना का आज १२वाँ दिन था....मेरा अंत नज़दीक था..मेरी वेदना चरम सीमा लाँघ चुकी थी ...बस प्राण छूटने को थे..मैने "प्रणाम...  स्वामी को मेरा प्रणाम " कहा बदले मे गले से बस  आं आं की आवाज़  फूटी ..महराज ने भी आं आं कहके उत्तर दिए...जैसे कह रहे हों ..ना कविराज मेरे से पहले ना  जाना...पर महाराज की ये अंतिम  आज्ञा  पर मेरा अधिकार नही था..महाराज की लगातार  आं आं की  आवाज़ लगा मुझे राक रहे थे...पर काल पर मेरा अधिकार ना था...आं आं कहते महराज पता नही मुझसे क्या कहना चाहते थे...आं आं की उनकी लोरी
 सुनता  मैं जगदम्बिका की गोद मे जा बैठा...

ठीक से याद नही पेर शायद ठीक एक दिन बाद ....मैने देख के मुझे गोद मे लिए माँ अंबे अपने अपने हाथों को फैला ..दूर किसी विशिष्ट के आगमन  और स्वागत हेतु जल्दी जल्दी चली जा रहीं हैं.. ..... सामने थे मेरे महराज. मेरे प्रभु...श्रीमंत महाराज छत्रपति संभाजी...अपने कौड़ियों की माला फेरते जगदंबे जगदंबे कहते माँ अंबे की गोद मे आ समाए...

उपसंहार

मराठा सूर्य अस्त तो हुआ पर संभाजी की शहादत के एक लौ से.लोग जागने लगे ..शाही सेना से हिंदू किनारा करने लगे.... इस्लाम परस्त बूढ़े औरंगजेब के हाथ से भारत फिसलने लगा.

Tuesday, June 25, 2024

रोहन मिश्रा की कहानी -1

 
अपनी कहानी में सब हीरो होते हैं...हर लड़के की ,या यूँ कहूँ युवा होते लड़के की एक कहानी होती है..जिसमें वो लीड रोल में होता है...एक हीरोइन होती है..विलेन होता है...और बहुत से सपोर्टिंग एक्टर भी होते हैं...बैकग्राउंड म्यूज़िक होता है..गाने बजते हैं...बट ये सब बस  लीड एक्टर को ही विज़िबल होता है...

अब आते हैं कहानी पर..९० का दशक  ....मैं रोहन ..रोहन मिश्रा....उमर १५ साल...कक्षा नौवीं..हल्की मूँछे...उँचाई कुछ ५ फीट ८-९ इंच ........वजन ४५-४८ के बीच....घुंघराले बाल....वेस्ट ठीक २७ इंच...२६इंच की पैंट टाइट और २८ की लूस...कुल मिलाकर बिलो एवरेज से २ कदम पीछे दिखने वाला अति साधारण लड़का ..साथ में एक बहुत ही एक्स्ट्राऑर्डिनरी टॅलेंटेड लंगोटीया परम मित्र  विशाल सिंह जो की हर कला मे पारंगत......जहाँ आप ये कह सकते हैं...रोहन यानी मै बस पढ़ाई मे अच्छा था ...तो विशाल पढ़ाई के साथ साथ सबमें उम्दा था.....हर फील्ड का महारथी....पर ये मेरी कहानी है और मैं ही इस कहानी का लीड हूँ.....तो हुआ ऐसा की ८वी को कक्षा को दोनो भाई ने अच्छे अंको से पास किया और इतने सालों मे पहली बार दोनों  का एडमिशन एक ही स्कूल मे हुआ...और मेरे पास आई एक नयी साइकिल.."एटलस- बी एस एल अर."  जिसे हृतिक रोशन ने कहो ना प्यार में चलाई थी...दोनो भाई ने मिल के एक ही साइकल में स्कूल जाने का निर्णय लिया.....विशाल सीट पर मैं करियर पर और दोनो साथ मे पैडल मारते हुए ४ किमी दूर नये स्कूल मे पहुंचे....तो भैया ये थे  कोएड स्कूल...जहां लड़के लड़की एक ही कक्षा मे बैठते.५ फीट दूर ...स्कूल का दूसरा दिन.....सुबह की प्रार्थना....हम सब अपनी अपनी कक्षा की लाइन में हाथ जोड़े खड़े इंतज़ार में...और सामने से आती हैं ३ छात्राएँ..प्रार्थना कराने के लिए....और उनमें सबसे सुंदर चेहरा बीच में...
 मेरी आँख और मस्तिष्क के बीच लड़ाई जारी थी.... आँखे जीतती तो कुछ ज्यादा देर खुली रहती..और हारती तो बंद कुछ पलों के लिये...प्रार्थना खत्म हुई और क्लास में जाते हुए लड़कियों की कतार में पहली सीट पर ही मैंने उसे देखा ...उसकी किसी सहेली ने  उसे पीछे से पुकारा..... "मेघा" .....मेरी उस पर जमी नज़रो को पकड़ते हुए विशाल ने मेरा हाथ लेके लास्ट बेंच पर बैठाया ..और बोला भाई ..और बोला, "भाई, मत देख ऐसे... कुछ नहीं होने वाला है..."

..खैर, मुझे भी अपने आप पर और अपनी शक्ल पर इतना ही विश्वास था।
...अपने चारो तरफ नज़र घुमाया..और अपने ५ किलो के बस्ते  को लास्ट डेस्क पर  रखा ...पहला पीरियड कब चालू हुआ ..और स्कूल का  पहला दिन कब ख़तम..पता ही नहीं चला..हम सब अपने अपने  घर को लौट आए....स्कूल जाने का एक कारण मिल गया था.. बाली उमर का पहला आकर्षण .....प्रार्थना की लाइन से स्कूल के अंतिम पीरियड तक पढ़ाई के साथ उसको देखने का हर एक पल..जैसा भी मौका मिले उसको  निहारने का अलग  खुशी थी....मैं मेघा को अपने दोस्त बनाने की कतार में लग गया ...मज़े की बात ये है की मेरे  इस लाइन में हमारे क्लास ४० मे से २० लड़के थे और डबल मज़े की बात ये है की मैं शायद  इनमें सबसे पीछे था..

जैसा मैंने बताया  सब लड़कों की अलग दुनिया ..कहानी थी...जिसमें सब अपने हिसाब से हीरो थे.... मेघा को शायद ये पता था की १-२ लोग उसे पसंद करते हैं...पर पूरे २० होंगे ये तो शायद ही सोचा होगा...हमें इस क्लास मे पढ़ते एक महीने हो गये...मुझे पता लग गया कि मैं एक लंबी लाइन मे कहीं पीछे गुम सा खड़ा हूँ.....और जो लाइन मे आये हैं...वो बहुत  आगे  हैं...२-४ बार तो मेरे सामने बहस भी चली और एक दो बार आपस में मारपीट भी  ...तेरी भाभी ..नहीं तेरी भाभी ....

बेचारी मेघा ..ना तो उसे अपने देवरों का पता ..ना ही अपने लिए लड़ते हुए हीरो का......विशाल को छोड़ मेरे दिल का हाल किसी को नहीं पता था...और ये हाल देखने के बाद मेरी हड्डियों की भलाई के लिए मैंने भावनाओं को दबाने का भरपूर प्रयास किया..खैर इस दिल को अभी आगे और टूटना था....

.उस टाइम के ड्यूड और दबंग टाइप लड़कों  ने  एक लिस्ट बनाई की मेघा वाली क्यू मे कौन कौन आगे है और किसके  इस रेस को जीतने की ज्यादा संभावना है..और कमीनों ने मुझे इस लिस्ट मे शामिल भी नही  किया.....इस लिस्ट के टॉप ४ की स्कूल की छुट्टी के ठीक बाद बिना  कारण बताओ नोटिस जारी किए  पहले कंबल कुटाई हुई.....जिसमें से २ की मैंने खुद अपने आँखो से देखी ..और जिन दो की सुनी वो तो और भी भयानक दास्तान थी....सच बताउँ भीया रूह कांप उठी......बाकी लिस्ट के टॉपर में से किसी एक दो को २-३ थप्पड़ और बाकी लोग को  धमकी दे कर इस लिस्ट को कतई छोटा कर दिया गया.....बस अब २ ही नाम इस रेस मे रह गये....सूर्यपाल सिंग और अपूर्व पांडे ...मैं  जहाँ बिना हिंसा के इस झंझट से बचने से खुश था..

वहाँ विशाल मेरा चेहरा देख देख हंसता.... पूर्ण स्वराज्य के तर्ज़ मेरा पूर्ण उपेक्षा किया गया था दबंगो के द्वारा..मेरे अस्तित्त्व को अस्वीकार किया गया था....मैं आईने के सामने खड़ा कारण जानते हुए भी दुविधा मे रहा  इस क्यू में इन लोगों ने शामिल ही नही किया...दर्द तो हुआ था इस बात का...एक बात ये अच्छी हुई थी की  मैं किसी के रडार में  नहीं था...स्कूल मे पहली त्रैमासिक परीक्षा हुई.....जिसमें ३ परफॉर्मर मेरे, विशाल और मेघा सहित सारी कक्षा फिजिक्स में फ़ैल हुई.....और मजबूरन  जिन्होने फेल किया था  उनके यहां ट्यूशन करना पड़ा......शाम की क्लास में जहाँ मेघा थी...वहाँ एक दूसरे स्कूल से एक नया चेहरा था....नाज़

और इस बार हमारे विशाल भाई को ५वी बार प्यार हो गया और नाज़ पहले ही दिन से मेरे लिए नाज से नाज़ भाभी हो गई....और अब जहाँ हम ट्यूशन से सीधे घर जाते थे...अब रास्ता बदल गया...पहले हम नाज़ से बिना पूछे चुपचाप पीछे पीछे एक रेस्पेक्टेड डिस्टेन्स से सुरक्षित  उसके घर छोड़ने जाते फिर अपने घर...इस पूरे प्रकरण मे ग़लत ये हो रहा था की उसके मोहल्ले के बाहुबली की नज़र में आ गये थे....खैर मेरे चेहरे या दुबले पतले पर्सनालिटी के कारण मैं बिल्कुल भी हानिकारक की श्रेणी में नहीं आता था..पर विशाल  के साथ ये खुशकिस्मती नहीं थी..पढ़ाई से खेल मे एक नंबर परफॉर्मर....कुल मिलकर वो किसी भी कन्या के क्यू में काफ़ी आगे और बाकी लड़कों के थ्रेट सूची शामिल था.....बिल्कुल हानिकारक टाइप.....खैर अब मैंने मन ही मन विशाल को गुरु मानकर उसके मूव को नोटिस करना जारी किया....

विशाल भाई ने सबसे पहले अपना पेन नाज़ के पास गिराकर बातचीत की शुरुआत की। नाज़ ने पेन उठाकर विशाल को दिया, और दोनों के बीच 'स्माइल', 'थैंक्स' और 'मेंशन नॉट' का आदान-प्रदान हुआ। अगले दिन से, विशाल भाई ने मुझे ट्यूशन के लिए कुछ जल्दी ले जाना शुरू कर दिया, और एक-दो दिनों में जबरदस्ती की गई 'हाय-हेलो' के बाद, नाज़ से वापसी में 'हेलो-हाय' प्राप्त करने में सफल रहे।

दूसरी चाल... कुछ दिनों बाद, विशाल भाई ने अचानक मुझसे कहा कि अब हम दो दिन ट्यूशन नहीं जाएंगे। मैंने कहा कि मैं लेक्चर मिस नहीं करना चाहता, लेकिन विशाल ने चाट, गोलगप्पे और ब्रेड पकौड़े की रिश्वत देकर मुझे दो दिन ट्यूशन नहीं जाने दिया... और फिर तीसरे दिन, वह मुझे समय से पहले ट्यूशन ले गया।
 
   मैं तीन दिन बाद ट्यूशन में मेघा को देखकर खुश था, और विशाल हमारे ट्यूशन वाले सर के घर के पहले मोड़ पर मेरा इंतजार कर रहा था।   दूर से नाज़ आती दिखी, और उसके पीछे     मेघा... मेरे हाथ-पाँव मेघा को पास से देखकर बिना वजह फूलने लगते थे। इतने में ही   
   विशाल       की आवाज़ आई - "नाज़... सुनो"। मेरे प्राण सूख गए, मैंने विशाल की ओर देखा और फिर   नाज़ की ओर... नाज़ भी थोड़ी     
   हैरान थी, पर वह रुक गई।

इतने में विशाल बोला... " मेरी थोड़ी तबीयत खराब  थी इसलिए २ दिन ट्यूशन नहीं आ सका... आंड ई डोंट वॉंट की कोर्स में मैं पीछे हो जाउ ...... क्या तुम मुझे पिछले दो दिनों के अपने नोट्स दे सकती हो?" अंग्रेजी मिश्रित हिंदी सुनकर मुझे अपने कानों पर विश्वास नहीं हो रहा था।

विशाल धड़कने रोके नाज़ के रिप्लाई का वेट कर रहा था..और मैं भी उम्मीद कर रहा था कि नाज़ 'ना' कहे और मुझे हंसने का मौका मिले।
..
लेकिन मेरी निराशा का अंत नहीं हो रहा था..नाज़ ने बोला..." हाँ ..ट्यूशन के बाद ले लेना" और ये सब आगे  बढ़ गई...और मैने और विशाल चुपचाप उनके पीछे पीछे हो लिए , टाइम हो गया थे पढ़ने का....ट्यूशन ख़तम होने के बाद नाज़ ने सबके के सामने अपनी नोट बुक विशाल को दिया.....

सारे लड़को  मे तहलका मचा गया....और नोट लेने का तरीका लड़की से आइस ब्रेक करने के लिए नंबर १ पेर ट्रेंड करने लगा.....मन के किसी कोने मे मैं भी अपने आपको मेघा से नोट माँगते ..स्माइल और हाय बाय का सपना देखने लगा...ठीक इसी घटना के दो दिन बाद ..मेरे से मिलते जुलते ( बोले तो वजन कद काठी ) कुल मिला कर मेरे १९-२० में से १९ टाइप वाले गौरीशंकर ने  ठीक उसी जगह विशाल के स्टाइल में मेघा से कॉपी माँगी.....और बदले में सुनने में आया की काफ़ी सुनने को मिला....और मेरा सपना भी सपना रह गया.....

दिन कट रहे थे....एकतरफा प्यार या यूँ कहे एकतरफ़ा आकर्षण भी बढ़ रहा था... और उधर मेरे जिगरी दोस्त ने कसम खा रखी थी की जीवन में नमक मिर्च की कमी नही होने दिया जाएगा..... एक ठंड ट्यूशन से  लौटने की शाम से दोनो भाई रोज की क्रिया मतलब नाज़ को अपने निगरानी मे सुरक्षित  उसके घर तक छोड़ने के रास्ते मे थे....एक इलेक्ट्रिक पोल का बल्ब फ्यूज था जो दूर से विशाल भाई ने देख लिया....और मुझे  बोला भाई..२ मिनिट रुक मैं आया और ये कह के मेरे हाथ से साइकिल लगभग छीन के चीते की गति से नाज़ की ओर बढ़े और  बोले  मे  "एस्कूसे मे नाज़"..बस इसके बाद की बातचीत मुझे सुनाई नहीं दी.....मेरे दिल का धड़कन बढ़ा हुआ था की मोहल्ले के कोई अंकल या अन्य बाहुबली ये ना देख ले....२-३ मिनिट मे भाई वापस आए..मैने पूछा  भाई क्या रायता फैला आया ..विशाल बोला कुछ नही ,,,बस वुड योउ लीके तो बे फ्रेंड्स वित मे पूछ के आया हूँ..और आगे कुछ पूछने से पहले  बोला की उसने हाँ बोल दिया है फ्रेंडशिप को...... मुझे लगा कि शायद कुछ अच्छा ही हो रहा है।...

खैर दूसरे दिन स्कूल जाने के ठीक पहले मेरे घर के  लैंडलाइन  पर मेरे क्लास मेट प्रभात का कॉल आया की भाई क्या कांड किया है तूने... तूने रात को  नाज़ को  रोक छेड़ा..... उसने फिर बोला उसकी मोहल्ले मे एक मुंहबोले भाई ने ये देख लिया की तू बंद लाइट के नीचे नाज़ को रोक अपने साइकल पर से कुछ बोला....और सुबह से चैन डंडा और रॉड ले के तुझे ढूँढ रहा  है धरमदयाल बहूत  ख़तरनाक है धरम...आज स्कूल मत आना....अब मैं क्या बताता की वो मैं नही था...विशाल था....मेरा तो काटो तो खून नही वाला हालत था.

हे राम....चैन और रोड को इमॅजिन करके ही मुझे चक्कर आने लगे....मैं तुरंत विशाल के यहाँ  गया और बोला भाई क्या रायता  फैलाए हो समेटो नही तो मैं तो रो दूँगा  एक दो रॉड के बाद और बाकी आप को खाना होगा....

अब समय था रायता समेटने का.....विशाल ने तुरंत दो तीन फोन घुमाए.......स्कूल जाने का सवाल ही नही था...घर से झूठ बोल के जो थोड़े  ठीक ठाक मित्र थे उनके साथ बैठक की और निष्कर्ष निकाला...माफी...तुरंत माफी..क्योंकि स्कूल जाना इंपॉर्टेंट था..घर पर ज्यादा दिन झूठ नही बोल सकते थे....विशाल भाई ने  टालमटोल की ..कहाँ नाज़ को क्या मुँह दिखाउन्गा तो मैंने कहा मैं माँग लूँगा माफी ऐसे भी वारंट मेरे नाम का ही निकला है..

..बस हम ८-१० दोस्तों ने गाड़ी उठाई और  पंहुच गये धरम भाई से माफी माँगने.. नाज़ के सारे मोहल्ले मे हम सब  धरम को ढूंढते फिर रहे थे की सॉरी बोल के मामला ख़तम करे...मैं जहाँ भी २-४ लड़के देखता ...वहाँ  बाइक रोक के पूछता की धरम को देखा है.....सुबह से  दोपहर हो गई और फिर शाम होने को आई ..धरम भाई ना मिलना था ना मिले...सबने कहा चलो कल ट्राई करते हैं...पर मैंने माफी आज ही माँग के कहानी ख़तम करने की कसम खाई थी....

मैंने बोल अब बचा लास्ट ऑप्शन  धरम भाई का घर... मैंने कहा चलो वहां चल के सॉरी बोलनेगे.....धरम भाई का घर पता करके हम धरम के घर को पंहुच गये.....और मैने जा के डोर बेल बजाई....धरम की मम्मी बाहर आईं....मैने कहा आंटी धरम भाई घर पर हैं......इतने सारे लड़को को धरम के बारे मे पूछता  देख आंटी डर गईं ..और उन्होने मना कर दिया..मैं भी माफी माँगने की ज़िद पर था..मैने कहा आंटी  पता है की किधर मिलेंगे...आंटी ने कहा वो तो अपने गाँव गया एक महीने के लिए...इतना बड़ा झूठ सुन के मैं बहूत दुखी हुआ...क्यूंकी १ दिन पहले से धरम भाई रॉड और हथियार लिए मुझे ढूँढ रहे थे...मैने ज़ोर देकर कहा आंटी प्लीज बुलाइए धरम को.....पर आंटी ने साफ साफ झूठ दोहरा दिया...मरता क्या ना करता ...हम सब बिन माफी माँगे और मिले वापस आ गये....अब तो नेक्स्ट डे कोई और कारण नहीं बचा था....स्कूल जाना ही पड़ा...और देर जब तक स्कूल मे थे दोनो डरे सहमे चुपचाप बैठे रहे.....पूरा दिन राम राम मे गया.....नेक्स्ट डे भी सेम ही गुजरा...तीसरे दिन मैंने १-२ लड़को को बात करते सुना की...धरम को उसकी मम्मी ने गाँव भेज दिया क्योंकि कुछ लड़के उसको मरने को ढूँढ रहे थे और घर तक पहुँच गये थे......बोलो सियावर रामचंद्र की जय ..मन ही मन बहूत हँसी आई मुझे ...जब मैने विशाल को बताया तो हम दोनो और भी हँसे और एक बात बात पता चली...भीया बाहुबलियों की भी फटती है.....और ये रायता अपने आप सिमट गया था....


Sunday, April 7, 2024

अब वैसी शाम नही होती

अब शाम नही होती...या ऐसे कहें को वैसी शाम  नही होती जैसा की ८०-९० के दशक मे हुआ करती थी...पता  नही ये मेरा भ्रम है की सत्य  सुर्यदेव ता पटल से कुछ धीरे धीरे अस्त होते थे उस समय...और होती थी एक लंबी शाम बच्चो को देर तक खेलने को....मम्मियों और पड़ोस की आंटी की गपशप के लिए..

मुझे ये भी लगता है की तब की शामें कुछ शांत हुआ करती थी .. आप अपने घरौंदों को लौटे पक्षियों का कलरव  सुन सकते थे  ...मोटर गाड़ी की आवाज़ तो गाहे बगाहे ही आती थी....ये शाम ४:०० से ७:०० बजे तक की ही थी...पर काफ़ी लंबी लगा करती  पूरे दिन का सबसे अच्छा समय सबके लिए..

 हर शाम खूबसूरत होती...हमारे मोहल्ले में सब बच्चे मिले के खेला करते...छुपम छुपाई ,बुढ़िया छू और परी-पत्थर ,ऐसे बहूत सारे खेल और भी थे जैसे खो खो, जैसे आमदण्डा....कोई हारता कोई जीत जाता, कोई रूठ जाता तो कोई दाम देके थकने के बाद रोते रोते घर जाता ..सबका एक अलग मज़ा था

ये उस समय की बात है जब  केवल दूरदर्शन हुआ करता था...रंगोली चित्रहार और रंगो के रविवार का..तब आप  हर हफ्ते एक मूवी देखते थे एक लंबे ब्रेक के साथ ...

सारी शामें अलग .... और कभी कभी आती थी एक शाम ..जब पापा घर जल्दी आ जाते...एक शाम जिसका मुझे इंतज़ार होता ...

कभी मैं ..और साथ में कभी मेरा कोई दोस्त लकी रहा तो वो..हम जाते एक लॉन्ग वॉक पर..शहर के बाहर...छोटे मोटे कस्बों को पार करते हुए...
हम पहुंच जाते एक अलग देश...जान्हा दूर दूर तक घर  ना होता...केवल मैदान.. लंबे लंबे घास के मैदान...
और उनके बीच से बहती एक पानी की धारा....जो कन्हि नाले का ..कन्हि नदी का और कन्हि बड़े तालाब का रूप ले लेती....
कई बड़े बड़े चट्टानों के पीछे उछल कूद करती ये बेनामी पानी की धारा.. एकदम छुपी हुई थी....जो आपको तब दिखाई देती जब आप उसके बिल्कुल करीब  पहुंच जाते....हो सकता है मुझे ही उसका लोकल नाम ना पता हो...या उसका कोई नाम ही ना हो ....पर मैंने उसका नया नामकरण किया था  अपने दोस्तों के बीच..."गुप्त नाला" क्योंकि वो एक छिपी हुई धारा थी....

जब भी एक नई शाम मेरा कोई दोस्त हमें जॉइन करता ..मैं उसे उस नाले को दिखाने को काफी उत्सुक होता....किनारे बैठ कर पानी मे पैर डालना....छोटी छोटी मछलियां केकड़े...मेंढक और दूसरे किडो मकोडो को ताकना...एक अलग मज़ा था...

सूरज अपने अवसान की तैयारी कर रहा होता ..और हम दोस्त घास के मैदान मे दौड़ रहे होते....एक बड़े पत्थर पर खड़ा होकर  पानी को छोटे छोटे पत्थरों से टकराते और आगे बढ़ते देखना मुझे तब भी अच्छा लगता था और आज भी..

रास्ते मे पापा  कभी महाभारत की कहानियाँ  सुनाते ...तो कभी कोई पौराणिक कहानी..मुझे अर्जुन,कर्ण,अभिमन्यु  सबके सबके साकार दिखते..
चक्रव्यूह में घिरा वीर अभिमन्यु....अर्जुन के  गांडीव से निकलते तीर..कृष्ण के उंगली मे सुदर्शन....अंगुलिमाल ..अहिल्या....सब के सब साकार दिखते
एकदम ध्यान से कहानियों को सुनते ..उनसे कई सारे प्रश्न करते..उनके उत्तर समझते ..साथ मे शीतल ताजी हवा के झोंके से गले मिलते..हम चलते रहते..घर से निकल कर घर की ओर

जैसे  जैसे सूरज क्षितिज की और प्रस्थान करता हम भी अपने घर की और प्रस्थान करते.. आते आते रास्ते मे आता एक छोटी सी मिठाई की दुकान..जिसमे गिन चुन के आप को मिठाई दिखती....कढ़ाई में गाढ़े होते दूध ..और रंग बदल कर कलाकंद का रूप लेते हुए देखने से उसे
खाने का मज़ा दुगना हो जाता...ज्यादा नही १-२ पीस ही हमें मिला करता ..पर वैसा टेस्ट आज भी किसी मिठाई का नही...पता नही  कलाकंद   का वो टेस्ट कन्हि गुम सा हो गया है....रात ढलने से पहले हम घर पर आ जाते.....जान्हा  सिगड़ी पर बनी सब्जी दाल और गरमागरम माँ के हाथों फुल्के हमरा इंतजार करते......


हैं मेरे पास कुछ पैसे
कोई है जो
मेरे लिए
टाइम मशीन
बना दे
एक

मै फिर से
पापा के कंधों पर
चढ़ जाऊंगा
उंगली थामे
फिर वही
जगह
घूम आउन्गा
और लाऊंगा
 बहुत सी यादें
कहानी
और उस वक्त का टुकड़ा
जिसे
आज के लोग
ना देख पाएंगे
ना समझ पाएंगे