तो भीया बन गई दीवाली एक दिन वाली ...फोड़ लिए पटाखे और खा लिए बाहर से खरीदी मिठाई....मन हो तो चलो आज तुम्हें 90 के दशक की दीवाली की सैर कराता हूँ।
ऐसा था की तब दीवाली की खुशबू हवा में 10-15 दिन पहले से ही घुलने लगती थी.....घर की सफाई बड़े जोर-शोर से होती...दीवान खुलते ...अलमारी खुलती..टालो पर रखे खोखे खुलते.....और पुराने कपड़े किताबें समान रज़ाई चटाई सबको धूप दिखाया जाना चालू होता...ऐसे ऐसे कोने खोजे जाते जिन्हे झाड़ू देखे साल हो गये..मतलब घर का कोना कोना साफ ....
चुने और डिस्टेंपर से घर की दीवारे रंगीन होने लगती....कुछ अजब ही सुंदर महक होती थी घर की उसके बाद...सारे सामान वापस अपने स्थान पर सजने लगते ..घर देखकर ऐसा लगता कि कोई अभी एकदम नहा धो के तरोताजा हुआ है...
करीब दिवाली के ५ दिन पहले बच्चों की जद्दो जहद चालू होती की कम पैसे मे कैसे ज़्यादा से ज़्यादा पटाखे लाया जाए...पापा के साथ एक बड़े से मैदान मे लगे पटाखे की मेले मे जाते हुए मन मे एक अजब सी धुकधुकी लगी रहती थी....फिर पचासों दुकान के भीड़ मे एक ऐसी दुकान खोजी जाती जो किसी जान पहचान वाले की हो ताकि हमे कम पैसे मे ज़्यादा पटाखे मिले ..पर होता उल्टा था ....जान पहचान वाले अंकल और भैया हमे ज़्यादा लूट लेते थे...बंदूक का क्राज़ ही अलग था... जो एकदम असली लगे ऐसी पिस्टल लेने की एक अलग दीवानगी होती थी. जिसके हाथ मे आते ही हम कमांडो मूवी के मिथुन बन जाते थे..भयंकर भीड़ भाड़ पार करते और झोले मे पटाखे ले कर निकलते सेठ जैसा फील करते ...रास्ते मे वापस आते हुए चाट ...समोसे...जलेबी का लुत्फ उठा घर लौटते
वापस घर आकर पटाखे धूप में सुखाए जाते..प्रॉपर प्लान होता की ५ दिन की दिवाली मे कितने और कौन से पटाखे कब छोड़ने हैं...
सारे घर में गुलाब जामुन, नमकीन, सेव, खुरमी और गुझिए की सुगंध हवा मे तैरने लगती... और ये सारी मिठाई आस पड़ोस के २०-२५ घरों मे आदान प्रदान होती....शाम को नये कपड़े पहन जलते दियों के बीच ...दोस्तों के साथ पटाखे फोड़ने का मज़ा ही अलग ,हर घर के सामने एक से बढ़कर एक सुंदर रंगोलियां बनती...दीपावली मतलब लगता की जीवन एक उत्सव है...
फिर ११ दिन बाद आती थी एकादशी..और कई लोगो को पटाखे फोड़ते देख हर साल ये दुख रहता था की क्यूँ नही थोड़े पटाखे बचाया मैने ...और अगले साल ये गलती ना करने की कसम खाते हुए एकादशी के दिन दीपावली को गुड बाय किया जाता ....
थोड़े ही दूर पर हाफ ईयरली एक्जाम दूर खड़ा मुस्कुराता हुआ गाना गाता मिलता की "आओ बच्चों तुम्हे दिखाए झाँकी हिन्दुस्तान की"...भैया दीपावली का सारा नशा काफूर हो जाता ...और दीपावली यहाँ पूर्णतया खत्म होती
Warm Regards
Rahul Pathak
Rahul Pathak
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