Tuesday, June 25, 2024
रोहन मिश्रा की कहानी -1
अपनी कहानी में सब हीरो होते हैं...हर लड़के की ,या यूँ कहूँ युवा होते लड़के की एक कहानी होती है..जिसमें वो लीड रोल में होता है...एक हीरोइन होती है..विलेन होता है...और बहुत से सपोर्टिंग एक्टर भी होते हैं...बैकग्राउंड म्यूज़िक होता है..गाने बजते हैं...बट ये सब बस लीड एक्टर को ही विज़िबल होता है...
अब आते हैं कहानी पर..९० का दशक ....मैं रोहन ..रोहन मिश्रा....उमर १५ साल...कक्षा नौवीं..हल्की मूँछे...उँचाई कुछ ५ फीट ८-९ इंच ........वजन ४५-४८ के बीच....घुंघराले बाल....वेस्ट ठीक २७ इंच...२६इंच की पैंट टाइट और २८ की लूस...कुल मिलाकर बिलो एवरेज से २ कदम पीछे दिखने वाला अति साधारण लड़का ..साथ में एक बहुत ही एक्स्ट्राऑर्डिनरी टॅलेंटेड लंगोटीया परम मित्र विशाल सिंह जो की हर कला मे पारंगत......जहाँ आप ये कह सकते हैं...रोहन यानी मै बस पढ़ाई मे अच्छा था ...तो विशाल पढ़ाई के साथ साथ सबमें उम्दा था.....हर फील्ड का महारथी....पर ये मेरी कहानी है और मैं ही इस कहानी का लीड हूँ.....तो हुआ ऐसा की ८वी को कक्षा को दोनो भाई ने अच्छे अंको से पास किया और इतने सालों मे पहली बार दोनों का एडमिशन एक ही स्कूल मे हुआ...और मेरे पास आई एक नयी साइकिल.."एटलस- बी एस एल अर." जिसे हृतिक रोशन ने कहो ना प्यार में चलाई थी...दोनो भाई ने मिल के एक ही साइकल में स्कूल जाने का निर्णय लिया.....विशाल सीट पर मैं करियर पर और दोनो साथ मे पैडल मारते हुए ४ किमी दूर नये स्कूल मे पहुंचे....तो भैया ये थे कोएड स्कूल...जहां लड़के लड़की एक ही कक्षा मे बैठते.५ फीट दूर ...स्कूल का दूसरा दिन.....सुबह की प्रार्थना....हम सब अपनी अपनी कक्षा की लाइन में हाथ जोड़े खड़े इंतज़ार में...और सामने से आती हैं ३ छात्राएँ..प्रार्थना कराने के लिए....और उनमें सबसे सुंदर चेहरा बीच में...
मेरी आँख और मस्तिष्क के बीच लड़ाई जारी थी.... आँखे जीतती तो कुछ ज्यादा देर खुली रहती..और हारती तो बंद कुछ पलों के लिये...प्रार्थना खत्म हुई और क्लास में जाते हुए लड़कियों की कतार में पहली सीट पर ही मैंने उसे देखा ...उसकी किसी सहेली ने उसे पीछे से पुकारा..... "मेघा" .....मेरी उस पर जमी नज़रो को पकड़ते हुए विशाल ने मेरा हाथ लेके लास्ट बेंच पर बैठाया ..और बोला भाई ..और बोला, "भाई, मत देख ऐसे... कुछ नहीं होने वाला है..."
..खैर, मुझे भी अपने आप पर और अपनी शक्ल पर इतना ही विश्वास था।
...अपने चारो तरफ नज़र घुमाया..और अपने ५ किलो के बस्ते को लास्ट डेस्क पर रखा ...पहला पीरियड कब चालू हुआ ..और स्कूल का पहला दिन कब ख़तम..पता ही नहीं चला..हम सब अपने अपने घर को लौट आए....स्कूल जाने का एक कारण मिल गया था.. बाली उमर का पहला आकर्षण .....प्रार्थना की लाइन से स्कूल के अंतिम पीरियड तक पढ़ाई के साथ उसको देखने का हर एक पल..जैसा भी मौका मिले उसको निहारने का अलग खुशी थी....मैं मेघा को अपने दोस्त बनाने की कतार में लग गया ...मज़े की बात ये है की मेरे इस लाइन में हमारे क्लास ४० मे से २० लड़के थे और डबल मज़े की बात ये है की मैं शायद इनमें सबसे पीछे था..
जैसा मैंने बताया सब लड़कों की अलग दुनिया ..कहानी थी...जिसमें सब अपने हिसाब से हीरो थे.... मेघा को शायद ये पता था की १-२ लोग उसे पसंद करते हैं...पर पूरे २० होंगे ये तो शायद ही सोचा होगा...हमें इस क्लास मे पढ़ते एक महीने हो गये...मुझे पता लग गया कि मैं एक लंबी लाइन मे कहीं पीछे गुम सा खड़ा हूँ.....और जो लाइन मे आये हैं...वो बहुत आगे हैं...२-४ बार तो मेरे सामने बहस भी चली और एक दो बार आपस में मारपीट भी ...तेरी भाभी ..नहीं तेरी भाभी ....
बेचारी मेघा ..ना तो उसे अपने देवरों का पता ..ना ही अपने लिए लड़ते हुए हीरो का......विशाल को छोड़ मेरे दिल का हाल किसी को नहीं पता था...और ये हाल देखने के बाद मेरी हड्डियों की भलाई के लिए मैंने भावनाओं को दबाने का भरपूर प्रयास किया..खैर इस दिल को अभी आगे और टूटना था....
.उस टाइम के ड्यूड और दबंग टाइप लड़कों ने एक लिस्ट बनाई की मेघा वाली क्यू मे कौन कौन आगे है और किसके इस रेस को जीतने की ज्यादा संभावना है..और कमीनों ने मुझे इस लिस्ट मे शामिल भी नही किया.....इस लिस्ट के टॉप ४ की स्कूल की छुट्टी के ठीक बाद बिना कारण बताओ नोटिस जारी किए पहले कंबल कुटाई हुई.....जिसमें से २ की मैंने खुद अपने आँखो से देखी ..और जिन दो की सुनी वो तो और भी भयानक दास्तान थी....सच बताउँ भीया रूह कांप उठी......बाकी लिस्ट के टॉपर में से किसी एक दो को २-३ थप्पड़ और बाकी लोग को धमकी दे कर इस लिस्ट को कतई छोटा कर दिया गया.....बस अब २ ही नाम इस रेस मे रह गये....सूर्यपाल सिंग और अपूर्व पांडे ...मैं जहाँ बिना हिंसा के इस झंझट से बचने से खुश था..
वहाँ विशाल मेरा चेहरा देख देख हंसता.... पूर्ण स्वराज्य के तर्ज़ मेरा पूर्ण उपेक्षा किया गया था दबंगो के द्वारा..मेरे अस्तित्त्व को अस्वीकार किया गया था....मैं आईने के सामने खड़ा कारण जानते हुए भी दुविधा मे रहा इस क्यू में इन लोगों ने शामिल ही नही किया...दर्द तो हुआ था इस बात का...एक बात ये अच्छी हुई थी की मैं किसी के रडार में नहीं था...स्कूल मे पहली त्रैमासिक परीक्षा हुई.....जिसमें ३ परफॉर्मर मेरे, विशाल और मेघा सहित सारी कक्षा फिजिक्स में फ़ैल हुई.....और मजबूरन जिन्होने फेल किया था उनके यहां ट्यूशन करना पड़ा......शाम की क्लास में जहाँ मेघा थी...वहाँ एक दूसरे स्कूल से एक नया चेहरा था....नाज़
और इस बार हमारे विशाल भाई को ५वी बार प्यार हो गया और नाज़ पहले ही दिन से मेरे लिए नाज से नाज़ भाभी हो गई....और अब जहाँ हम ट्यूशन से सीधे घर जाते थे...अब रास्ता बदल गया...पहले हम नाज़ से बिना पूछे चुपचाप पीछे पीछे एक रेस्पेक्टेड डिस्टेन्स से सुरक्षित उसके घर छोड़ने जाते फिर अपने घर...इस पूरे प्रकरण मे ग़लत ये हो रहा था की उसके मोहल्ले के बाहुबली की नज़र में आ गये थे....खैर मेरे चेहरे या दुबले पतले पर्सनालिटी के कारण मैं बिल्कुल भी हानिकारक की श्रेणी में नहीं आता था..पर विशाल के साथ ये खुशकिस्मती नहीं थी..पढ़ाई से खेल मे एक नंबर परफॉर्मर....कुल मिलकर वो किसी भी कन्या के क्यू में काफ़ी आगे और बाकी लड़कों के थ्रेट सूची शामिल था.....बिल्कुल हानिकारक टाइप.....खैर अब मैंने मन ही मन विशाल को गुरु मानकर उसके मूव को नोटिस करना जारी किया....
विशाल भाई ने सबसे पहले अपना पेन नाज़ के पास गिराकर बातचीत की शुरुआत की। नाज़ ने पेन उठाकर विशाल को दिया, और दोनों के बीच 'स्माइल', 'थैंक्स' और 'मेंशन नॉट' का आदान-प्रदान हुआ। अगले दिन से, विशाल भाई ने मुझे ट्यूशन के लिए कुछ जल्दी ले जाना शुरू कर दिया, और एक-दो दिनों में जबरदस्ती की गई 'हाय-हेलो' के बाद, नाज़ से वापसी में 'हेलो-हाय' प्राप्त करने में सफल रहे।
दूसरी चाल... कुछ दिनों बाद, विशाल भाई ने अचानक मुझसे कहा कि अब हम दो दिन ट्यूशन नहीं जाएंगे। मैंने कहा कि मैं लेक्चर मिस नहीं करना चाहता, लेकिन विशाल ने चाट, गोलगप्पे और ब्रेड पकौड़े की रिश्वत देकर मुझे दो दिन ट्यूशन नहीं जाने दिया... और फिर तीसरे दिन, वह मुझे समय से पहले ट्यूशन ले गया।
मैं तीन दिन बाद ट्यूशन में मेघा को देखकर खुश था, और विशाल हमारे ट्यूशन वाले सर के घर के पहले मोड़ पर मेरा इंतजार कर रहा था। दूर से नाज़ आती दिखी, और उसके पीछे मेघा... मेरे हाथ-पाँव मेघा को पास से देखकर बिना वजह फूलने लगते थे। इतने में ही
विशाल की आवाज़ आई - "नाज़... सुनो"। मेरे प्राण सूख गए, मैंने विशाल की ओर देखा और फिर नाज़ की ओर... नाज़ भी थोड़ी
हैरान थी, पर वह रुक गई।
इतने में विशाल बोला... " मेरी थोड़ी तबीयत खराब थी इसलिए २ दिन ट्यूशन नहीं आ सका... आंड ई डोंट वॉंट की कोर्स में मैं पीछे हो जाउ ...... क्या तुम मुझे पिछले दो दिनों के अपने नोट्स दे सकती हो?" अंग्रेजी मिश्रित हिंदी सुनकर मुझे अपने कानों पर विश्वास नहीं हो रहा था।
विशाल धड़कने रोके नाज़ के रिप्लाई का वेट कर रहा था..और मैं भी उम्मीद कर रहा था कि नाज़ 'ना' कहे और मुझे हंसने का मौका मिले।
..
लेकिन मेरी निराशा का अंत नहीं हो रहा था..नाज़ ने बोला..." हाँ ..ट्यूशन के बाद ले लेना" और ये सब आगे बढ़ गई...और मैने और विशाल चुपचाप उनके पीछे पीछे हो लिए , टाइम हो गया थे पढ़ने का....ट्यूशन ख़तम होने के बाद नाज़ ने सबके के सामने अपनी नोट बुक विशाल को दिया.....
सारे लड़को मे तहलका मचा गया....और नोट लेने का तरीका लड़की से आइस ब्रेक करने के लिए नंबर १ पेर ट्रेंड करने लगा.....मन के किसी कोने मे मैं भी अपने आपको मेघा से नोट माँगते ..स्माइल और हाय बाय का सपना देखने लगा...ठीक इसी घटना के दो दिन बाद ..मेरे से मिलते जुलते ( बोले तो वजन कद काठी ) कुल मिला कर मेरे १९-२० में से १९ टाइप वाले गौरीशंकर ने ठीक उसी जगह विशाल के स्टाइल में मेघा से कॉपी माँगी.....और बदले में सुनने में आया की काफ़ी सुनने को मिला....और मेरा सपना भी सपना रह गया.....
दिन कट रहे थे....एकतरफा प्यार या यूँ कहे एकतरफ़ा आकर्षण भी बढ़ रहा था... और उधर मेरे जिगरी दोस्त ने कसम खा रखी थी की जीवन में नमक मिर्च की कमी नही होने दिया जाएगा..... एक ठंड ट्यूशन से लौटने की शाम से दोनो भाई रोज की क्रिया मतलब नाज़ को अपने निगरानी मे सुरक्षित उसके घर तक छोड़ने के रास्ते मे थे....एक इलेक्ट्रिक पोल का बल्ब फ्यूज था जो दूर से विशाल भाई ने देख लिया....और मुझे बोला भाई..२ मिनिट रुक मैं आया और ये कह के मेरे हाथ से साइकिल लगभग छीन के चीते की गति से नाज़ की ओर बढ़े और बोले मे "एस्कूसे मे नाज़"..बस इसके बाद की बातचीत मुझे सुनाई नहीं दी.....मेरे दिल का धड़कन बढ़ा हुआ था की मोहल्ले के कोई अंकल या अन्य बाहुबली ये ना देख ले....२-३ मिनिट मे भाई वापस आए..मैने पूछा भाई क्या रायता फैला आया ..विशाल बोला कुछ नही ,,,बस वुड योउ लीके तो बे फ्रेंड्स वित मे पूछ के आया हूँ..और आगे कुछ पूछने से पहले बोला की उसने हाँ बोल दिया है फ्रेंडशिप को...... मुझे लगा कि शायद कुछ अच्छा ही हो रहा है।...
खैर दूसरे दिन स्कूल जाने के ठीक पहले मेरे घर के लैंडलाइन पर मेरे क्लास मेट प्रभात का कॉल आया की भाई क्या कांड किया है तूने... तूने रात को नाज़ को रोक छेड़ा..... उसने फिर बोला उसकी मोहल्ले मे एक मुंहबोले भाई ने ये देख लिया की तू बंद लाइट के नीचे नाज़ को रोक अपने साइकल पर से कुछ बोला....और सुबह से चैन डंडा और रॉड ले के तुझे ढूँढ रहा है धरमदयाल बहूत ख़तरनाक है धरम...आज स्कूल मत आना....अब मैं क्या बताता की वो मैं नही था...विशाल था....मेरा तो काटो तो खून नही वाला हालत था.
हे राम....चैन और रोड को इमॅजिन करके ही मुझे चक्कर आने लगे....मैं तुरंत विशाल के यहाँ गया और बोला भाई क्या रायता फैलाए हो समेटो नही तो मैं तो रो दूँगा एक दो रॉड के बाद और बाकी आप को खाना होगा....
अब समय था रायता समेटने का.....विशाल ने तुरंत दो तीन फोन घुमाए.......स्कूल जाने का सवाल ही नही था...घर से झूठ बोल के जो थोड़े ठीक ठाक मित्र थे उनके साथ बैठक की और निष्कर्ष निकाला...माफी...तुरंत माफी..क्योंकि स्कूल जाना इंपॉर्टेंट था..घर पर ज्यादा दिन झूठ नही बोल सकते थे....विशाल भाई ने टालमटोल की ..कहाँ नाज़ को क्या मुँह दिखाउन्गा तो मैंने कहा मैं माँग लूँगा माफी ऐसे भी वारंट मेरे नाम का ही निकला है..
..बस हम ८-१० दोस्तों ने गाड़ी उठाई और पंहुच गये धरम भाई से माफी माँगने.. नाज़ के सारे मोहल्ले मे हम सब धरम को ढूंढते फिर रहे थे की सॉरी बोल के मामला ख़तम करे...मैं जहाँ भी २-४ लड़के देखता ...वहाँ बाइक रोक के पूछता की धरम को देखा है.....सुबह से दोपहर हो गई और फिर शाम होने को आई ..धरम भाई ना मिलना था ना मिले...सबने कहा चलो कल ट्राई करते हैं...पर मैंने माफी आज ही माँग के कहानी ख़तम करने की कसम खाई थी....
मैंने बोल अब बचा लास्ट ऑप्शन धरम भाई का घर... मैंने कहा चलो वहां चल के सॉरी बोलनेगे.....धरम भाई का घर पता करके हम धरम के घर को पंहुच गये.....और मैने जा के डोर बेल बजाई....धरम की मम्मी बाहर आईं....मैने कहा आंटी धरम भाई घर पर हैं......इतने सारे लड़को को धरम के बारे मे पूछता देख आंटी डर गईं ..और उन्होने मना कर दिया..मैं भी माफी माँगने की ज़िद पर था..मैने कहा आंटी पता है की किधर मिलेंगे...आंटी ने कहा वो तो अपने गाँव गया एक महीने के लिए...इतना बड़ा झूठ सुन के मैं बहूत दुखी हुआ...क्यूंकी १ दिन पहले से धरम भाई रॉड और हथियार लिए मुझे ढूँढ रहे थे...मैने ज़ोर देकर कहा आंटी प्लीज बुलाइए धरम को.....पर आंटी ने साफ साफ झूठ दोहरा दिया...मरता क्या ना करता ...हम सब बिन माफी माँगे और मिले वापस आ गये....अब तो नेक्स्ट डे कोई और कारण नहीं बचा था....स्कूल जाना ही पड़ा...और देर जब तक स्कूल मे थे दोनो डरे सहमे चुपचाप बैठे रहे.....पूरा दिन राम राम मे गया.....नेक्स्ट डे भी सेम ही गुजरा...तीसरे दिन मैंने १-२ लड़को को बात करते सुना की...धरम को उसकी मम्मी ने गाँव भेज दिया क्योंकि कुछ लड़के उसको मरने को ढूँढ रहे थे और घर तक पहुँच गये थे......बोलो सियावर रामचंद्र की जय ..मन ही मन बहूत हँसी आई मुझे ...जब मैने विशाल को बताया तो हम दोनो और भी हँसे और एक बात बात पता चली...भीया बाहुबलियों की भी फटती है.....और ये रायता अपने आप सिमट गया था....
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पाठक साहब, अगला पार्ट भी जल्दी लिखें. शुभकामनायें.
ReplyDeleteEkdm cinema dekh liya aisa lga..every 90s kid can relate
ReplyDeleteBahut umda..
ReplyDeleteGood job bhaiya ji
ReplyDeleteHaha..great story. Loved the nostalgia and the twist in the end ❤️😅
ReplyDelete90s ki galiyon ka ek suhana safar, ek yuva ki bhavnayain aut Pahle aakarshan ka ahsaas, sabhi ki achi prastuti 👏👏
ReplyDeleteBahut badhiya Pathak ji agli kahani ka intezar rahega
ReplyDeleteWaiting for the next part
ReplyDeleteCinema banaye kya....
ReplyDeleteबहुत बढिया सजीव
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