Sunday, September 14, 2025

मोनू शुक्ला- ४

 मोनू शुक्ला किस्मत के धनी थे शुक्ला जी को ये बात स्पष्ट हो चली थी...पर दिल मानने को तैयार ना था...
 या ऐसा कहे एक ज़िद सी आ चुकी थी...."मोनू का बाप हूँ मैं" ये बार बार दोहरा अपने सारे दुखों का बदला लेने 
शुक्ला जी कमर कसे हुए थे....जैसे तैसे शुक्ला जी ने हलवा गटका....एक नज़र सोफे पर दौड़ाई ..और चल दिए अपने रूम में आराम करने

वैसे इन सब घटनाओं का मोनू को पता तो ना था..पर हल्का हल्का आभास था..कुछ तो गड़बड़ है.....शुक्ला जी के चेहरे की रंगत, उनकी आँखों का उतार-चढ़ाव देखकर मोनू महाराज बेचैन रहने लगे थे।  

नाना नानी मामा ..फिर प्यारी सी मामी...मोनू ने चारों को ऐसा फंसाया की ४ दिन का ट्रिप १० दिन मे बदल गया....उधर शुक्ला जी पनीर, प्रवाल, मिठाई और दूध-दही के खर्च से और दुखी  हो रहे थे.... समय बड़ा ही अजब खिलाड़ी है—क्रोध का लावा कब पिघलकर मोम हो गया, शुक्ला जी भी न समझ  ...प्यारे से शुक्ला जी अपने दुख और बदले को त्याग दिए थे..

.वैसे भी शुक्ला जी को पता नही था की आगे हालत और कठिन हैं...

 मोनू को प्यार हो गया था....नाम था प्रिया बिड़ला......उस समय में लड़को को बिड़ला कपूर मल्होत्रा जैसे सरनेम की लड़कियाँ 
 परियों जैसे होती थी...मतलब किस्से कहानियों मे....पर जैसा मोनू का भाग्य था....मोनू की क्लास मे थी ....और सबसे बड़ी बात ये थी
 की  प्रिया को मोनू पसंद थे...हम केवल पसंद कहेंगे ...क्यूंकी लड़की के दिल का हाल जानना मुश्किल ही नही नामुमकिन है..... प्रिया अपने क्लास मे लड़कों मे सिर्फ़ मोनू से बात करती..बात क्या करती मोनू की बातों और शरारतों पर खिलखिला कर हँसती.....

 १४ के होते हुए मोनू ..हार्मोनल चेंजेस के लपेटे मे थे..... मोनू भाई ने कन्हि पढ़ा था...हँसी तो फँसी ...ये उनका खुद को समझने का अंदाज था....
सोने पर सुहागा ये भी था की  प्रिया का घर भी २-३ मोहल्ले छोड़कर ही था.... टीवी पर नया नया गाना आया था..
" घर से निकलते ही ..कुछ दूर चलते ही" मोनू खुद को गिटार लिए ये गाना उसके गली गाने का दिवा स्वप्न में खोए रहते ...

एक दिन बातों बातों मे मोनू के  प्रिया के जनमदिन का पता लग गया था......12 अक्टूबर ....बस फिर क्या था—चॉकलेट, ग्रीटिंग कार्ड और टेडी बियर लेने की ठान ली।लेकिन दुकान पहुँच कर मालूम हुआ कि इन तीनों गिफ्ट लेने  के लिए तो "लोन" लेना पड़ेगा।
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जैसा पैदा होते ही मोनू के चला आ रहा था......किस्मत तो अच्छी थी ही ..समय भी मोनू महाराज के साथ था....
नाना नानी मामा मामी.....सब को अलग अलग पॉलिश लगा मोनू ने अच्छी खासी रकम लपेट ली.....चॉकलेट ग्रिटिंग कार्ड और टेडी के साथ एक छोटे केक का भी जुगाड़ हो गया था.....

 १२ अक्टूबर

 "जिसका मुझे था इंतज़ार ..जिसके लिए दिल था बेकरार ..वो घड़ी आ गई आ गई" सुबह से जब ये गाना जब तीसरी बार बजा तो शुक्ला जी थोड़े चिंतित हो गये....उन्होंने दिमाग के सारे कोने खंगाल डाले—मिसेज़ शुक्ला का जन्मदिन? शादी की सालगिरह? साले साहब का बर्थडे? मामी जी का? पर कुछ समझ न आया। ...यूँ कहे के पूरा डेटाबेस स्कॅन कर लिया....पर समझ ना आया की आज के दिन क्या खास है......जब कुछ ना याद आया तो ज़ोर से हवा मे सबके लिए प्रश्न छोड़ा...." भाई आज कोई खास दिन है क्या" .....मोनू ने फट से गाना बंद किया ...और सरक लिए स्कूल के लिए..

 आज शुक्ला जी की होने वाली बहू का जन्मदिन था..पर शुक्ला जी अनभीज्ञ रह गये 😓 ...

आज हवा मे अलग महक थी..फ़िज़ा कुछ गुलाबी थी....मोनू शुक्ला आज खुशी में क्लास में लेट हो गये ..जैसे ही अपने क्लास मे एंट्री लिए वैसे ही क्लास टीचर "महकुआ सर"(इनके बारे में भी बताया जाएगा) सामने दिखे....गुस्से में मोनू से बोले ..आइए आइए शुक्ला जी..बारात रेडी है "... क्लास हँसी से गूँज उठी।

 प्रिया भी खिलखिलाकर हँसी...सब कुछ इग्नोर करते हुए मोनू ने अपनी सीट ग्रहण की....जैसे तैसे पीरियड बीत रहे थे..मोनू शुक्ला से लंच ब्रेक का वेट नही हो रहा था..खैर लंच ब्रेक होना था ..हुआ..मोनू को "हैप्पी बर्थ डे  प्रिया बोलना था"..बोले भी
.पर बस एक छोटा-सा "थैंक्यू" मिला और फुल स्टॉप। 
 
मोनू शुक्ला आगे क्या करें समझ नही पा रहे थे.....स्कूल बैग मे अपने हाथों से लिखा ग्रीटिंग कार्ड, डेरी मिल्क, टेडी और पिघलता हुआ केक..सब टेंशन दे रहे थे..

 छुट्टी की घंटी बजते तक मोनू शुक्ला को लगा एक सदी बीत गई....खैर स्कूल के बाहर मोड़ पर मोनू ने  प्रिया  को आवाज़ लगाई.....जैसे ही  प्रिया रुकी..."हैप्पी बर्थडे टू यू ..हैप्पी बर्थडे टू यू डियर प्रिया " का गाना गाते  हुए उन्होने सब समान प्रिया के सुपुर्द कर दिया.....और कुछ सोचने का मौका दिए वहाँ से लप्पा हो लिए......कुछ १० कदम ही चले थे तो एक मोनू मोनू की प्यार भर आवाज़ सुनाई दी...पर वो प्रिया की आवाज़ तो नही थी...शरमाते हुए जैसे ही मोनू शुक्ला थैंक्स के साथ कुछ सुर प्यार भरे शब्द सुनने को मुड़े....सामने थे पिताश्री..शुक्ला जी.....😱

3 comments:

  1. बहुत बढ़िया! आपकी लघुकथा पहले प्यार की मासूमियत को खूबसूरती से दर्शाती है। मोनू शुक्ला को जीवंत बनाने के लिए, उनके आदर्श प्रेम और उनकी उलझी हुई शारीरिक लालसाओं के बीच के संघर्ष को तलाशें। उनकी मासूमियत के टूटने की यह खोज, सशक्त भावनात्मक पहलू और यथार्थवाद को जोड़ेगी।

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