Tuesday, June 25, 2024

रोहन मिश्रा की कहानी -1

 
अपनी कहानी में सब हीरो होते हैं...हर लड़के की ,या यूँ कहूँ युवा होते लड़के की एक कहानी होती है..जिसमें वो लीड रोल में होता है...एक हीरोइन होती है..विलेन होता है...और बहुत से सपोर्टिंग एक्टर भी होते हैं...बैकग्राउंड म्यूज़िक होता है..गाने बजते हैं...बट ये सब बस  लीड एक्टर को ही विज़िबल होता है...

अब आते हैं कहानी पर..९० का दशक  ....मैं रोहन ..रोहन मिश्रा....उमर १५ साल...कक्षा नौवीं..हल्की मूँछे...उँचाई कुछ ५ फीट ८-९ इंच ........वजन ४५-४८ के बीच....घुंघराले बाल....वेस्ट ठीक २७ इंच...२६इंच की पैंट टाइट और २८ की लूस...कुल मिलाकर बिलो एवरेज से २ कदम पीछे दिखने वाला अति साधारण लड़का ..साथ में एक बहुत ही एक्स्ट्राऑर्डिनरी टॅलेंटेड लंगोटीया परम मित्र  विशाल सिंह जो की हर कला मे पारंगत......जहाँ आप ये कह सकते हैं...रोहन यानी मै बस पढ़ाई मे अच्छा था ...तो विशाल पढ़ाई के साथ साथ सबमें उम्दा था.....हर फील्ड का महारथी....पर ये मेरी कहानी है और मैं ही इस कहानी का लीड हूँ.....तो हुआ ऐसा की ८वी को कक्षा को दोनो भाई ने अच्छे अंको से पास किया और इतने सालों मे पहली बार दोनों  का एडमिशन एक ही स्कूल मे हुआ...और मेरे पास आई एक नयी साइकिल.."एटलस- बी एस एल अर."  जिसे हृतिक रोशन ने कहो ना प्यार में चलाई थी...दोनो भाई ने मिल के एक ही साइकल में स्कूल जाने का निर्णय लिया.....विशाल सीट पर मैं करियर पर और दोनो साथ मे पैडल मारते हुए ४ किमी दूर नये स्कूल मे पहुंचे....तो भैया ये थे  कोएड स्कूल...जहां लड़के लड़की एक ही कक्षा मे बैठते.५ फीट दूर ...स्कूल का दूसरा दिन.....सुबह की प्रार्थना....हम सब अपनी अपनी कक्षा की लाइन में हाथ जोड़े खड़े इंतज़ार में...और सामने से आती हैं ३ छात्राएँ..प्रार्थना कराने के लिए....और उनमें सबसे सुंदर चेहरा बीच में...
 मेरी आँख और मस्तिष्क के बीच लड़ाई जारी थी.... आँखे जीतती तो कुछ ज्यादा देर खुली रहती..और हारती तो बंद कुछ पलों के लिये...प्रार्थना खत्म हुई और क्लास में जाते हुए लड़कियों की कतार में पहली सीट पर ही मैंने उसे देखा ...उसकी किसी सहेली ने  उसे पीछे से पुकारा..... "मेघा" .....मेरी उस पर जमी नज़रो को पकड़ते हुए विशाल ने मेरा हाथ लेके लास्ट बेंच पर बैठाया ..और बोला भाई ..और बोला, "भाई, मत देख ऐसे... कुछ नहीं होने वाला है..."

..खैर, मुझे भी अपने आप पर और अपनी शक्ल पर इतना ही विश्वास था।
...अपने चारो तरफ नज़र घुमाया..और अपने ५ किलो के बस्ते  को लास्ट डेस्क पर  रखा ...पहला पीरियड कब चालू हुआ ..और स्कूल का  पहला दिन कब ख़तम..पता ही नहीं चला..हम सब अपने अपने  घर को लौट आए....स्कूल जाने का एक कारण मिल गया था.. बाली उमर का पहला आकर्षण .....प्रार्थना की लाइन से स्कूल के अंतिम पीरियड तक पढ़ाई के साथ उसको देखने का हर एक पल..जैसा भी मौका मिले उसको  निहारने का अलग  खुशी थी....मैं मेघा को अपने दोस्त बनाने की कतार में लग गया ...मज़े की बात ये है की मेरे  इस लाइन में हमारे क्लास ४० मे से २० लड़के थे और डबल मज़े की बात ये है की मैं शायद  इनमें सबसे पीछे था..

जैसा मैंने बताया  सब लड़कों की अलग दुनिया ..कहानी थी...जिसमें सब अपने हिसाब से हीरो थे.... मेघा को शायद ये पता था की १-२ लोग उसे पसंद करते हैं...पर पूरे २० होंगे ये तो शायद ही सोचा होगा...हमें इस क्लास मे पढ़ते एक महीने हो गये...मुझे पता लग गया कि मैं एक लंबी लाइन मे कहीं पीछे गुम सा खड़ा हूँ.....और जो लाइन मे आये हैं...वो बहुत  आगे  हैं...२-४ बार तो मेरे सामने बहस भी चली और एक दो बार आपस में मारपीट भी  ...तेरी भाभी ..नहीं तेरी भाभी ....

बेचारी मेघा ..ना तो उसे अपने देवरों का पता ..ना ही अपने लिए लड़ते हुए हीरो का......विशाल को छोड़ मेरे दिल का हाल किसी को नहीं पता था...और ये हाल देखने के बाद मेरी हड्डियों की भलाई के लिए मैंने भावनाओं को दबाने का भरपूर प्रयास किया..खैर इस दिल को अभी आगे और टूटना था....

.उस टाइम के ड्यूड और दबंग टाइप लड़कों  ने  एक लिस्ट बनाई की मेघा वाली क्यू मे कौन कौन आगे है और किसके  इस रेस को जीतने की ज्यादा संभावना है..और कमीनों ने मुझे इस लिस्ट मे शामिल भी नही  किया.....इस लिस्ट के टॉप ४ की स्कूल की छुट्टी के ठीक बाद बिना  कारण बताओ नोटिस जारी किए  पहले कंबल कुटाई हुई.....जिसमें से २ की मैंने खुद अपने आँखो से देखी ..और जिन दो की सुनी वो तो और भी भयानक दास्तान थी....सच बताउँ भीया रूह कांप उठी......बाकी लिस्ट के टॉपर में से किसी एक दो को २-३ थप्पड़ और बाकी लोग को  धमकी दे कर इस लिस्ट को कतई छोटा कर दिया गया.....बस अब २ ही नाम इस रेस मे रह गये....सूर्यपाल सिंग और अपूर्व पांडे ...मैं  जहाँ बिना हिंसा के इस झंझट से बचने से खुश था..

वहाँ विशाल मेरा चेहरा देख देख हंसता.... पूर्ण स्वराज्य के तर्ज़ मेरा पूर्ण उपेक्षा किया गया था दबंगो के द्वारा..मेरे अस्तित्त्व को अस्वीकार किया गया था....मैं आईने के सामने खड़ा कारण जानते हुए भी दुविधा मे रहा  इस क्यू में इन लोगों ने शामिल ही नही किया...दर्द तो हुआ था इस बात का...एक बात ये अच्छी हुई थी की  मैं किसी के रडार में  नहीं था...स्कूल मे पहली त्रैमासिक परीक्षा हुई.....जिसमें ३ परफॉर्मर मेरे, विशाल और मेघा सहित सारी कक्षा फिजिक्स में फ़ैल हुई.....और मजबूरन  जिन्होने फेल किया था  उनके यहां ट्यूशन करना पड़ा......शाम की क्लास में जहाँ मेघा थी...वहाँ एक दूसरे स्कूल से एक नया चेहरा था....नाज़

और इस बार हमारे विशाल भाई को ५वी बार प्यार हो गया और नाज़ पहले ही दिन से मेरे लिए नाज से नाज़ भाभी हो गई....और अब जहाँ हम ट्यूशन से सीधे घर जाते थे...अब रास्ता बदल गया...पहले हम नाज़ से बिना पूछे चुपचाप पीछे पीछे एक रेस्पेक्टेड डिस्टेन्स से सुरक्षित  उसके घर छोड़ने जाते फिर अपने घर...इस पूरे प्रकरण मे ग़लत ये हो रहा था की उसके मोहल्ले के बाहुबली की नज़र में आ गये थे....खैर मेरे चेहरे या दुबले पतले पर्सनालिटी के कारण मैं बिल्कुल भी हानिकारक की श्रेणी में नहीं आता था..पर विशाल  के साथ ये खुशकिस्मती नहीं थी..पढ़ाई से खेल मे एक नंबर परफॉर्मर....कुल मिलकर वो किसी भी कन्या के क्यू में काफ़ी आगे और बाकी लड़कों के थ्रेट सूची शामिल था.....बिल्कुल हानिकारक टाइप.....खैर अब मैंने मन ही मन विशाल को गुरु मानकर उसके मूव को नोटिस करना जारी किया....

विशाल भाई ने सबसे पहले अपना पेन नाज़ के पास गिराकर बातचीत की शुरुआत की। नाज़ ने पेन उठाकर विशाल को दिया, और दोनों के बीच 'स्माइल', 'थैंक्स' और 'मेंशन नॉट' का आदान-प्रदान हुआ। अगले दिन से, विशाल भाई ने मुझे ट्यूशन के लिए कुछ जल्दी ले जाना शुरू कर दिया, और एक-दो दिनों में जबरदस्ती की गई 'हाय-हेलो' के बाद, नाज़ से वापसी में 'हेलो-हाय' प्राप्त करने में सफल रहे।

दूसरी चाल... कुछ दिनों बाद, विशाल भाई ने अचानक मुझसे कहा कि अब हम दो दिन ट्यूशन नहीं जाएंगे। मैंने कहा कि मैं लेक्चर मिस नहीं करना चाहता, लेकिन विशाल ने चाट, गोलगप्पे और ब्रेड पकौड़े की रिश्वत देकर मुझे दो दिन ट्यूशन नहीं जाने दिया... और फिर तीसरे दिन, वह मुझे समय से पहले ट्यूशन ले गया।
 
   मैं तीन दिन बाद ट्यूशन में मेघा को देखकर खुश था, और विशाल हमारे ट्यूशन वाले सर के घर के पहले मोड़ पर मेरा इंतजार कर रहा था।   दूर से नाज़ आती दिखी, और उसके पीछे     मेघा... मेरे हाथ-पाँव मेघा को पास से देखकर बिना वजह फूलने लगते थे। इतने में ही   
   विशाल       की आवाज़ आई - "नाज़... सुनो"। मेरे प्राण सूख गए, मैंने विशाल की ओर देखा और फिर   नाज़ की ओर... नाज़ भी थोड़ी     
   हैरान थी, पर वह रुक गई।

इतने में विशाल बोला... " मेरी थोड़ी तबीयत खराब  थी इसलिए २ दिन ट्यूशन नहीं आ सका... आंड ई डोंट वॉंट की कोर्स में मैं पीछे हो जाउ ...... क्या तुम मुझे पिछले दो दिनों के अपने नोट्स दे सकती हो?" अंग्रेजी मिश्रित हिंदी सुनकर मुझे अपने कानों पर विश्वास नहीं हो रहा था।

विशाल धड़कने रोके नाज़ के रिप्लाई का वेट कर रहा था..और मैं भी उम्मीद कर रहा था कि नाज़ 'ना' कहे और मुझे हंसने का मौका मिले।
..
लेकिन मेरी निराशा का अंत नहीं हो रहा था..नाज़ ने बोला..." हाँ ..ट्यूशन के बाद ले लेना" और ये सब आगे  बढ़ गई...और मैने और विशाल चुपचाप उनके पीछे पीछे हो लिए , टाइम हो गया थे पढ़ने का....ट्यूशन ख़तम होने के बाद नाज़ ने सबके के सामने अपनी नोट बुक विशाल को दिया.....

सारे लड़को  मे तहलका मचा गया....और नोट लेने का तरीका लड़की से आइस ब्रेक करने के लिए नंबर १ पेर ट्रेंड करने लगा.....मन के किसी कोने मे मैं भी अपने आपको मेघा से नोट माँगते ..स्माइल और हाय बाय का सपना देखने लगा...ठीक इसी घटना के दो दिन बाद ..मेरे से मिलते जुलते ( बोले तो वजन कद काठी ) कुल मिला कर मेरे १९-२० में से १९ टाइप वाले गौरीशंकर ने  ठीक उसी जगह विशाल के स्टाइल में मेघा से कॉपी माँगी.....और बदले में सुनने में आया की काफ़ी सुनने को मिला....और मेरा सपना भी सपना रह गया.....

दिन कट रहे थे....एकतरफा प्यार या यूँ कहे एकतरफ़ा आकर्षण भी बढ़ रहा था... और उधर मेरे जिगरी दोस्त ने कसम खा रखी थी की जीवन में नमक मिर्च की कमी नही होने दिया जाएगा..... एक ठंड ट्यूशन से  लौटने की शाम से दोनो भाई रोज की क्रिया मतलब नाज़ को अपने निगरानी मे सुरक्षित  उसके घर तक छोड़ने के रास्ते मे थे....एक इलेक्ट्रिक पोल का बल्ब फ्यूज था जो दूर से विशाल भाई ने देख लिया....और मुझे  बोला भाई..२ मिनिट रुक मैं आया और ये कह के मेरे हाथ से साइकिल लगभग छीन के चीते की गति से नाज़ की ओर बढ़े और  बोले  मे  "एस्कूसे मे नाज़"..बस इसके बाद की बातचीत मुझे सुनाई नहीं दी.....मेरे दिल का धड़कन बढ़ा हुआ था की मोहल्ले के कोई अंकल या अन्य बाहुबली ये ना देख ले....२-३ मिनिट मे भाई वापस आए..मैने पूछा  भाई क्या रायता फैला आया ..विशाल बोला कुछ नही ,,,बस वुड योउ लीके तो बे फ्रेंड्स वित मे पूछ के आया हूँ..और आगे कुछ पूछने से पहले  बोला की उसने हाँ बोल दिया है फ्रेंडशिप को...... मुझे लगा कि शायद कुछ अच्छा ही हो रहा है।...

खैर दूसरे दिन स्कूल जाने के ठीक पहले मेरे घर के  लैंडलाइन  पर मेरे क्लास मेट प्रभात का कॉल आया की भाई क्या कांड किया है तूने... तूने रात को  नाज़ को  रोक छेड़ा..... उसने फिर बोला उसकी मोहल्ले मे एक मुंहबोले भाई ने ये देख लिया की तू बंद लाइट के नीचे नाज़ को रोक अपने साइकल पर से कुछ बोला....और सुबह से चैन डंडा और रॉड ले के तुझे ढूँढ रहा  है धरमदयाल बहूत  ख़तरनाक है धरम...आज स्कूल मत आना....अब मैं क्या बताता की वो मैं नही था...विशाल था....मेरा तो काटो तो खून नही वाला हालत था.

हे राम....चैन और रोड को इमॅजिन करके ही मुझे चक्कर आने लगे....मैं तुरंत विशाल के यहाँ  गया और बोला भाई क्या रायता  फैलाए हो समेटो नही तो मैं तो रो दूँगा  एक दो रॉड के बाद और बाकी आप को खाना होगा....

अब समय था रायता समेटने का.....विशाल ने तुरंत दो तीन फोन घुमाए.......स्कूल जाने का सवाल ही नही था...घर से झूठ बोल के जो थोड़े  ठीक ठाक मित्र थे उनके साथ बैठक की और निष्कर्ष निकाला...माफी...तुरंत माफी..क्योंकि स्कूल जाना इंपॉर्टेंट था..घर पर ज्यादा दिन झूठ नही बोल सकते थे....विशाल भाई ने  टालमटोल की ..कहाँ नाज़ को क्या मुँह दिखाउन्गा तो मैंने कहा मैं माँग लूँगा माफी ऐसे भी वारंट मेरे नाम का ही निकला है..

..बस हम ८-१० दोस्तों ने गाड़ी उठाई और  पंहुच गये धरम भाई से माफी माँगने.. नाज़ के सारे मोहल्ले मे हम सब  धरम को ढूंढते फिर रहे थे की सॉरी बोल के मामला ख़तम करे...मैं जहाँ भी २-४ लड़के देखता ...वहाँ  बाइक रोक के पूछता की धरम को देखा है.....सुबह से  दोपहर हो गई और फिर शाम होने को आई ..धरम भाई ना मिलना था ना मिले...सबने कहा चलो कल ट्राई करते हैं...पर मैंने माफी आज ही माँग के कहानी ख़तम करने की कसम खाई थी....

मैंने बोल अब बचा लास्ट ऑप्शन  धरम भाई का घर... मैंने कहा चलो वहां चल के सॉरी बोलनेगे.....धरम भाई का घर पता करके हम धरम के घर को पंहुच गये.....और मैने जा के डोर बेल बजाई....धरम की मम्मी बाहर आईं....मैने कहा आंटी धरम भाई घर पर हैं......इतने सारे लड़को को धरम के बारे मे पूछता  देख आंटी डर गईं ..और उन्होने मना कर दिया..मैं भी माफी माँगने की ज़िद पर था..मैने कहा आंटी  पता है की किधर मिलेंगे...आंटी ने कहा वो तो अपने गाँव गया एक महीने के लिए...इतना बड़ा झूठ सुन के मैं बहूत दुखी हुआ...क्यूंकी १ दिन पहले से धरम भाई रॉड और हथियार लिए मुझे ढूँढ रहे थे...मैने ज़ोर देकर कहा आंटी प्लीज बुलाइए धरम को.....पर आंटी ने साफ साफ झूठ दोहरा दिया...मरता क्या ना करता ...हम सब बिन माफी माँगे और मिले वापस आ गये....अब तो नेक्स्ट डे कोई और कारण नहीं बचा था....स्कूल जाना ही पड़ा...और देर जब तक स्कूल मे थे दोनो डरे सहमे चुपचाप बैठे रहे.....पूरा दिन राम राम मे गया.....नेक्स्ट डे भी सेम ही गुजरा...तीसरे दिन मैंने १-२ लड़को को बात करते सुना की...धरम को उसकी मम्मी ने गाँव भेज दिया क्योंकि कुछ लड़के उसको मरने को ढूँढ रहे थे और घर तक पहुँच गये थे......बोलो सियावर रामचंद्र की जय ..मन ही मन बहूत हँसी आई मुझे ...जब मैने विशाल को बताया तो हम दोनो और भी हँसे और एक बात बात पता चली...भीया बाहुबलियों की भी फटती है.....और ये रायता अपने आप सिमट गया था....


Sunday, April 7, 2024

अब वैसी शाम नही होती

अब शाम नही होती...या ऐसे कहें को वैसी शाम  नही होती जैसा की ८०-९० के दशक मे हुआ करती थी...पता  नही ये मेरा भ्रम है की सत्य  सुर्यदेव ता पटल से कुछ धीरे धीरे अस्त होते थे उस समय...और होती थी एक लंबी शाम बच्चो को देर तक खेलने को....मम्मियों और पड़ोस की आंटी की गपशप के लिए..

मुझे ये भी लगता है की तब की शामें कुछ शांत हुआ करती थी .. आप अपने घरौंदों को लौटे पक्षियों का कलरव  सुन सकते थे  ...मोटर गाड़ी की आवाज़ तो गाहे बगाहे ही आती थी....ये शाम ४:०० से ७:०० बजे तक की ही थी...पर काफ़ी लंबी लगा करती  पूरे दिन का सबसे अच्छा समय सबके लिए..

 हर शाम खूबसूरत होती...हमारे मोहल्ले में सब बच्चे मिले के खेला करते...छुपम छुपाई ,बुढ़िया छू और परी-पत्थर ,ऐसे बहूत सारे खेल और भी थे जैसे खो खो, जैसे आमदण्डा....कोई हारता कोई जीत जाता, कोई रूठ जाता तो कोई दाम देके थकने के बाद रोते रोते घर जाता ..सबका एक अलग मज़ा था

ये उस समय की बात है जब  केवल दूरदर्शन हुआ करता था...रंगोली चित्रहार और रंगो के रविवार का..तब आप  हर हफ्ते एक मूवी देखते थे एक लंबे ब्रेक के साथ ...

सारी शामें अलग .... और कभी कभी आती थी एक शाम ..जब पापा घर जल्दी आ जाते...एक शाम जिसका मुझे इंतज़ार होता ...

कभी मैं ..और साथ में कभी मेरा कोई दोस्त लकी रहा तो वो..हम जाते एक लॉन्ग वॉक पर..शहर के बाहर...छोटे मोटे कस्बों को पार करते हुए...
हम पहुंच जाते एक अलग देश...जान्हा दूर दूर तक घर  ना होता...केवल मैदान.. लंबे लंबे घास के मैदान...
और उनके बीच से बहती एक पानी की धारा....जो कन्हि नाले का ..कन्हि नदी का और कन्हि बड़े तालाब का रूप ले लेती....
कई बड़े बड़े चट्टानों के पीछे उछल कूद करती ये बेनामी पानी की धारा.. एकदम छुपी हुई थी....जो आपको तब दिखाई देती जब आप उसके बिल्कुल करीब  पहुंच जाते....हो सकता है मुझे ही उसका लोकल नाम ना पता हो...या उसका कोई नाम ही ना हो ....पर मैंने उसका नया नामकरण किया था  अपने दोस्तों के बीच..."गुप्त नाला" क्योंकि वो एक छिपी हुई धारा थी....

जब भी एक नई शाम मेरा कोई दोस्त हमें जॉइन करता ..मैं उसे उस नाले को दिखाने को काफी उत्सुक होता....किनारे बैठ कर पानी मे पैर डालना....छोटी छोटी मछलियां केकड़े...मेंढक और दूसरे किडो मकोडो को ताकना...एक अलग मज़ा था...

सूरज अपने अवसान की तैयारी कर रहा होता ..और हम दोस्त घास के मैदान मे दौड़ रहे होते....एक बड़े पत्थर पर खड़ा होकर  पानी को छोटे छोटे पत्थरों से टकराते और आगे बढ़ते देखना मुझे तब भी अच्छा लगता था और आज भी..

रास्ते मे पापा  कभी महाभारत की कहानियाँ  सुनाते ...तो कभी कोई पौराणिक कहानी..मुझे अर्जुन,कर्ण,अभिमन्यु  सबके सबके साकार दिखते..
चक्रव्यूह में घिरा वीर अभिमन्यु....अर्जुन के  गांडीव से निकलते तीर..कृष्ण के उंगली मे सुदर्शन....अंगुलिमाल ..अहिल्या....सब के सब साकार दिखते
एकदम ध्यान से कहानियों को सुनते ..उनसे कई सारे प्रश्न करते..उनके उत्तर समझते ..साथ मे शीतल ताजी हवा के झोंके से गले मिलते..हम चलते रहते..घर से निकल कर घर की ओर

जैसे  जैसे सूरज क्षितिज की और प्रस्थान करता हम भी अपने घर की और प्रस्थान करते.. आते आते रास्ते मे आता एक छोटी सी मिठाई की दुकान..जिसमे गिन चुन के आप को मिठाई दिखती....कढ़ाई में गाढ़े होते दूध ..और रंग बदल कर कलाकंद का रूप लेते हुए देखने से उसे
खाने का मज़ा दुगना हो जाता...ज्यादा नही १-२ पीस ही हमें मिला करता ..पर वैसा टेस्ट आज भी किसी मिठाई का नही...पता नही  कलाकंद   का वो टेस्ट कन्हि गुम सा हो गया है....रात ढलने से पहले हम घर पर आ जाते.....जान्हा  सिगड़ी पर बनी सब्जी दाल और गरमागरम माँ के हाथों फुल्के हमरा इंतजार करते......


हैं मेरे पास कुछ पैसे
कोई है जो
मेरे लिए
टाइम मशीन
बना दे
एक

मै फिर से
पापा के कंधों पर
चढ़ जाऊंगा
उंगली थामे
फिर वही
जगह
घूम आउन्गा
और लाऊंगा
 बहुत सी यादें
कहानी
और उस वक्त का टुकड़ा
जिसे
आज के लोग
ना देख पाएंगे
ना समझ पाएंगे

Monday, November 20, 2023

मेरे पुरन मासी का चाँद

 शैम्पू से नहाई
रविवार की
अलसही सुबह सी
कुछ धुली
कुछ उजली
अनसुलझे खुले
बाल
 काजल की
आँखों  पर
हल्की सी रेखा
और तुम हो गई
पुरन मासी का चाँद

 थका सा वक्त
और थका मन
पर तुम्हारी
हल्की सी मुस्कान
फिर
जैसे पौ फटने
पर हो जाती है
एक सुंदर सुबह
बस वैसा ही कर देती हो
सुंदर
तनमन
जीवन

मेरे कई सारे
सुने अनसुने
कहावतों कविताओं की
जिंदा सी तस्वीर हो
 तुम
या फिर
 ऐसे कहूँ क्या
तुम हो एक साकार रूप
सीप मे छिपी मोती का
फूल मे चमकते ओस का
प्रभात की हो लालिमा
शरद पूर्णिमा वाले चाँद
छिटकी चाँदनी
या कह दूं तुम्हें
बरसात की
मेरी पसंदीदा फुहार


जैसे हर पल हर क्षण
बढ़ती है उम्र चुपचाप
वैसे ही
बढ़ रहा है प्रेम
मेरा मेरे
मूक मौन
आप  

फिर से यही कहूँगा
जैसे राम की सीता
बस वैसे
मेरी अमृता

Monday, October 30, 2023

मेरे पापा का गाँव - पार्ट-१

ये हमारे होश सम्हालने के बाद बिहार और अपने पापा के गाँव जाने की पहली यात्रा थी ..उस जगह की जहाँ मेरे पापा ने अपना बचपन बिताया.. हम ३ भाई बहन अपनी किशोरा अवस्था में थे...और उनके बचपन से कई  किस्से-कहानियाँ सुनी थी... कैसे एक बड़े तालाब मे पापा तैराकरते....वो गन्ने के खेत  जहाँ से कोई भी कितने भी गन्ने तोड़ के खा सकता था.......खेतों के पास गन्ने से बनते गुड और सिरे..मिठाई...वो तालाब जिसके सामने ही माँ भवानी का मंदिर था....कैसे गाँव फागुन का रंग होता..होली  ३ दिन तक खेली जाती...एक गाँव से दूसरे गाँव लोगों  में होली का हुड़दंग होता...... कैसे लोग  ज़बरदस्ती भांग वाली मिठाई खिलाते..पापा और  उनके बचपन के दोस्तो के किस्से...वो नहर जिसे पर करके बाढ़ के समय स्कूल जाना होता था... चने बूट से भरे खेत....वो पेड़..वो गिल्ली डंडा का खेल...वो हॉकी..वो आम का बागान..पेड़ो पर  चढ़ना..और कई तरह के गाँव के खेल....एक बड़ा ही  आकर्सन  था हमे....मुझे तो अपने पापा छोटे से ये सारे काम करते दिखते थे....सारे क़िस्सो के दौरान मै उनके बालक रूप को सोंच सोंच के मन मे बड़ा हंसता और खुश होता...

इन सबका एक खाका सा मन मे बन गया था...कल्पनाओ में हम सबने तालाब ..भवानी मंदिर...नहर ...जामुन का पेड़..खेत खलिहान सब देखा था..

इन सबको साकार देखने बड़े उत्साह के साथ हम बस में जा रहे थे....पूरे २४ घंटे की जर्नी थी..रोमांचक....बिहार की सीमा में हम रात को पंहुचे...जो की नक्सल प्रभावित था...और ठीक कुछ दूरी पर हमारी बस खराब हो गई..उस समय बिहार अपने जंगल राज से बदनाम था.. बस हमारी खराब हुई एकदम जंगल  वाले इलाक़े में  और वो भी काली रात. में..हर तरफ अंधेरा...सभी के मन में डर ...लोग आते हुए  ट्रक रुकवा के लिफ्ट ले रहे थे...हम सब भी बस से अपना समान  नीचे ला कर  किसी नेक ट्रक वाले का इंतज़ार करने लगे...चारो तरफ  केवल सुनेपन की आवाज थी..घोर अंधकार ...रोड के उस पर मैने पहली बार इतने सारे जुगनुओ को एक साथ चमकते देखा.....दूर दूर तक सन्नाटा था...रोड पर आते केवल इक्के दुक्के  ट्रक इन सन्नाटो को चीर रहे थे...सबकी जान सांसत मे थी .  पर होइहि सोइ जो राम रचि राखा जपते हुए सब शांत दिखने की कोशिश कर रहे थे...कुछ ही देर मे एक भले से ट्रक ड्राइवर ने हमे लिफ्ट दिया..और हम पंहुच गये ...डेहरी ऑन सोन रेलवे स्टेशन....जहाँ से आगे की यात्रा ट्रेन से होने वाली थी..

ये ९० का दशक था..जब आप अपने  यात्रा के दौरान ..खाने पीने का पूरा सामान साथ ले के चलते थे....पूरी भूनजिया और ठेकुआ....ये ३नो का भरपूर स्टॉक था. और हाथ मे ठेकुआ  लेकर मै रेलवे स्टेशन की न्यारी दुनिया देखने लगा... ..कई सारी रेहाड़िया...छोटे खोमचे...प्लॅटफॉर्म पर अपनी चादर बिछा कर सुस्ताते लोग...ट्रेनो की सिटी और वो अनाउन्स्मेंट ..ट्रेनो की आवाजाही ...हमारी ट्रेन लेट थी..हम सभी प्लॅटफॉर्म पर बेडशीट बिछा कर बैठ गये और पूरी भूनजिया का भोग चालू हुआ......पापा कुछ समान लाने बाहर जा रहे थे साथ मे मै भी हो लिया....ज़्यादा कुछ याद नही पर होटेल वाले लीटी चोखा से मेरा पहला एनकाउंटर था शायद वो ....छोटे से रोड साइड होट्ल में  लिट्टी चोखा प्याज़ चटनी...एक अलग ही स्वाद और फीलिंग ...

ट्रेन से पटना पंहुचे...मामा आगये थे माँ को ननिहाल ले जाने..और आगे की हमारी  यात्रा में बस पापा और हम ३ भाई बहन ही थे..और ये हमारे लिए  और भी मज़े की बात थी...क्यूंकी पापा से हमे  डाट ना के बराबर मिलता था तो पिटाई का कोई ख़ौफ़ ही नही था...खैर ऐसे वैसे कैसे कैसे...हम पंहुच गये ...मेरे पापा के गाँव  आमसरी..सुबह के ५ बजे का समय था.....बस रुकी..हम समान के साथ उतरे..और बस ने हमे हॉर्न के साथ विदा किया.... रोड  पर थे बस पापा  ,दोनो बहन ,मैं और समान....चोरो तरफ और कोई  भी नही... सुबह की शीतल हवा...और सामने थी हमारी कल्पना की उड़ान और उनकी सच्ची तस्वीरें....नहर ..और उस पर बना पुल और खेतो को शृंखला.... जब भी पापा अपना गाँव याद  करते ये दोनो को जिक्र ज़रूर होता....हम सबने अपना समान उठाया..और चल दिए गाँव की ओर..

साथ चल रही पापा के पहचान की हवा..सड़क....मैं पापा की फीलिंग्स को समझ पा रहा था शायद...भोर होने का आरंभ हो चुका था....
आसमान मे लालिमा आने लगी थी....और थोड़े ही देर मे खेतों ,तालाबों ,झाड़ी को पार करते हुए गाँव के घर आने लगे थे.....हम ३नो भाई बहनों ने जो कल्पना की थी उससे काफ़ी अलग था सब....



Friday, June 30, 2023

मेरे पापा बेसटेस्ट

 बात कुछ पुरानी है.. ना ही कथा है ना ही कहानी है....और डरने की बात नहीं ये कविता भी नहीं है...मैं ये अपने लिए लिख रहा  हूँ ताकि वो बिता हुआ पल फिर से जी सकूँ...और आप अगर इसे पढ़  कर मेरे साथ उस पल को जिएं  तो मुझे कोई एतराज भी नहीं है
 

तो बात तब की है जब मैं एक छोटा सा ..होनहार...और अपने पापा का  आग्याकारी बेटा था....कुल जमा सातवीं क्लास मे था...ना ही पूरा किशोर ..और ना ही छोटा बालक....वो नब्बे के दशक का समय था...पापा के पास सेकंड हैंड राजदूत आई.. कुछ समय बाद पापा ने जब महसूस किया की हाथ थोड़ा साफ हो गया है, तो उन्होने एक लॉन्ग राइड का प्लान किया...वैसे वो समय लॉन्ग राइड का नहीं था...आपको कुछ काम निकालना पड़ता था..

हमारा एक छोटा सा हिन्दी मीडियम स्कूल था जिसके कर्ता धर्ता पापा ही थे...कर्ता धर्ता मतलब -प्रिंसिपल, टीचर,-स्टेनो जो भी हो सब का काम वो खुद ही किया करते थे...उस समय शिक्षा विभाग हमारे शहर से कुछ ६० कि.मी. दूर एक दूसरे जिले मे था..पापा ने प्लान बनाया वहां जाने का ..और साथ में मुझे भी ले जाने का ..

 

खैर अगले दिन सुबह हम दोनो निकल गये ...पापा के पेट पर अपने छोटे से हाथ का सुरक्षा घेरा डाले पीछे बैठा मैं दाँये बाँये सिर घुमाता जीवन के इस समय का आनंद ले रहा था....और थोड़े ही देर में हम अपने शहर को छोड कर बाहर निकल लिए...रोड के दोनो तरफ हरे हरे खेत ...गाँव..पेड़..ठंडी हवा...कच्चे पक्के मकान..नाले..तालाब...वो हर चीज़ जो  आँखों  को आकर्षित करती है..

 

पापा रास्ते में पड़ते पेड़ ..फूल ...गाँव .नहर ...रबी की फसल..खरीफ की फसल  सबके बारे मे बताते हुए चल रहे थे...राजदूत की फटफट में मैं आधी बात ही सुन पा रहा था.. मुझे हल्की हल्की भूख लग रही थी...मैने पापा को बोला की भूख लगी है....और पापा समझ गये एक छोटे बच्चे को बाहर निकलने पर जो भूख लगती है, वो घर से लाए रोटी सब्जी से नही भरती.... पापा बोले ..थोड़ी देर में रुकते हैं कन्हि....और करीब ५ कि.मी. चलने पर एक छोटी सी टपरी रोड साइड पर थी..बाहर २ बड़े बड़े गंज रखे थे..एक घड़ा था और साथ में कांच के बड़े से जार में समोसे रखे थे....

 

रोड के इस पार ये तपरी जैसा ढाबा ..और उस पार बह रही थी नहर...सूरज सर पर आने वाला था..पापा ने पूछा क्या है आपके पास बच्चे के लिए....समोसा तो दिख ही रहा था तो उत्तर में दुकानदार ने दोनो गंज के ढक्कन खोल दिए,...एक मे गरमा गरम हरी पीली मटर की चाट थी और दूसरे में  गरम गुलाबजामुन...पापा ने मेरी तरफ देखा ..और मैने बिना समय गंवाए मटर की तरफ ..पापा ने एक प्लेट मटर का ऑर्डर कर दिया..थोड़े ही  ही देर में मेरे हाथ में एक स्टील के पतली सी प्लेट में थी हरी पीली गरमा गरम मटर की पानी वाली चाट....सच कहूँ तो ऐसा टेस्ट कभी भुला नही जा सकता...लाल कलर के प्लास्टिक की कुर्सी....अच्छी ख़ासी धूप...और साथ मे गरम तीखी पानी वाली  चाट ..उस उम्र मे और उस दौर मे इससे ज़्यादा मैं शायद भगवन् से और कुछ मांग भी नहीं सकता था....पर ऐसा सच में नहीं था..कोने में जमीन मे एक गोल्ड स्पॉट(उस समय की एक कोल्ड ड्रिंक) का एक कैरेट बार बार मुझे अपनी और देखने पर मजबूर कर रहा था....हाफ प्लेट चाट खाने के बाद अब मेरा आधा ध्यान चाट पर और आधा ध्यान गोल्ड स्पॉट पर ....ऐसा नही था की मैं अपने पापा से डरता था..और मैं एक गोल्ड स्पॉट लेने नहीं बोल सकता था...शायद ये उस दशक के बच्चों मे एक शर्म थी...या यूँ कहे अनुशासन था..एक झिझक थी.....मैने चाट ख़तम की....पापा से नज़रेचुरा कर ..ठंडी आह के साथ गोल्ड स्पॉट को भरपूर नज़रों से देखा....और वापस जर्नी स्टार्ट करने के लिए रेडी सा हो गया....मैने पापा को बोला चलें अब...पापा मुस्कुरा कर बोले हां  चलते हैं......और फिर दुकानदार को पैसे देते हुए बोले ..ये एक गोल्ड स्पॉट की बोतल भी जोड़ लेना...

 

वो कहते हैं ना..माइ पापा इस बेस्ट...बस मैं जोड़ से वोही चिल्लाना चाहता था....पर मुँह मे फँसी गोल्ड स्पोर्ट बोतल की गर्दन ने ऐसा होने नहीं दिया ...और २-३ सांस में मैंने पूरी बोतल पेट मे उडेल ली....पापा मुझे खड़े मुस्कुराते देखते रहे...ऐसी मुस्कान या तो आप छोटे से बच्चों मे या फिर पोपले मुँह वाले बूढ़ो मे ही देख पाएंगे ..प्योर..निर्मल..सरल...सुंदर..

 

और फिर २-३ किक और पापा की राजदूत फिर स्टार्ट...पेट भर गया था...मन तृप्त था और मैं आसपास की छोड़ इस सोंच मे डूबा था की जेब में पैसे होने पर भी पापा चाट पकौड़ी या पानीपुरी क्यों नही खाते...जैसे आज भी नहीं खाए...और किसी मेले मे भी नही खाते..उल्टे अपने हिस्से की मिठाई हमको बाँट देते हैं....मेरे लिए दुनिया का सबसे बड़ा आश्चर्य था ये...कोई कैसे अपने हिस्से का कलाकंद किसी और को दे सकता है...जब भी वो ऐसा करते तो मैं उनसे कलाकंद ले के  चुपचाप उनको ताकते हुए बस यही दुविधा में रहता था....

 

खैर कई सारे खेत, कुँए, ६० कि.मी. लंबी सड़क को क्रॉस कर हम पहुंचे शिक्षा विभाग....काम बड़ा नहीं था ..हम पहुंचे दुबे जी के पास..उनके कक्ष में...पापा ने उन्हे किया नमस्कार और उनको देख मैने भी हाथ जोड़ दिए..दुबे जी ने १० इंच के स्माइल के साथ पापा को नमस्कार किया और मुझे देख के बोले वाह पाठकजी लड़का तो होनहार है आपका...बस यही से वो मैने होनहार का तमगा लिया जो आपने इस प्रसंग के शुरुआत मे पढ़ा था... दुबे जी ने अपने सहायक को बोला पाठक जी के लिए चाय और बच्चे के लिए रसगुल्ला ले आओ...पापा ने हाथ जोड़ के बोला अरे नहीं दुबे जी...चाय तो रास्ते में ही हो गई..अभी थोड़ी देर पहले....ये फाइल  पर आप साइन बस कर दीजिए...दुबे जी मुस्कुराते हुए बोले...ठीक है पाठक जी जैसा आप बोलें....अपने मातहत को चाय का मना कर दुबे जी बोले  बस बच्चे के लिए रसगुल्ला ले आओ...पापा ने फाइल साइन करवाई...और ५ मिनिट्स इधर उधर की बात कर बोले ...चलता हूं दुबे जी...दुबे जी ने भी हाथ जोड़ नमस्कार कर  विदा दे दिया....

और मैं रसगुल्ले का क्या होगा इस टेंशन मे आ गया..और कुर्सी में ही चिपक कर बैठा रहा ..पापा ने मेरा हाथ अपने हाथ मे ले लिया..मैं बोलना चाहता था..पापा रसगुल्ला....पर चुप रहा..

२०-२५ कदम चल कर मुझसे रहा नही गया और मैंने बोला पापा रसगुल्ला कौन खाएगा....इतना सुनते ही पापा ज़ोर से हँसने लगे और बोले बेटा कोई रसगुल्ला नहीं आने वाला था..ये तो बस फॉरमॅलिटी है..एक औपचारिकता....मेरे लिए ये नया था...की खिलाना नही है पर बोलना ज़रूरी है खा लो... उफ़ ये अजीब दुनिया...

 

खैर बाहर आते आते करीब २ बज गये थे....भूख वापस लग गई थी और ये समोसे वाली भूख नहीं थी....पापा ने बोला खाना खाएगा..मैने हाँ में सर हिलाया ....हम दोनो शिक्षा विभाग के पास मे ही एक होटल में बैठे.. पापा ने बोला २ थाली लगाने..मैं चुपचाप बैठा खाने के आने का इंतज़ार करने लगा.....थोड़ी ही देर में दोनों के सामने प्लास्टिक के टेबल पर २ थाली थी....एकदम कुरकुरी भिंडी..गरमा गरम दाल और चावल...टमाटर धनिया की चटनी प्याज और साथ में पापड़...मेरी याददाश्त में बाहर के खाने का शायद ये पहला अनुभव था....और जीवन के इस पड़ाव तक बेस्ट भी....पेट जीभ और मन तीनो धन्य धन्य बोल रहे थे..और मैं सातवें आसमान मे था..सोंच रहा  था कि अच्छा हुआ  खेलने के चक्कर मे मैने पापा को मना नहीं किया.....खा पीकर हम निकल पड़े ..वापस अपने शहर की ओर....

 

और जैसा मेरे लिए अनएक्सपेक्टेड था...और शायद आप लोग ने गेस किया होगा...जी हाँ...पापा ने घर जाने से पहले अपनी राजदूत रोकी मधु स्वीट्स की दुकान पर ..और मेरे साथ पूरे घर के लिए पैक कराया रसगुल्ला...

 

मैं भी चल रहा हूँ उसी पद चिन्ह पर पापा...सब कहते हैं और मैं भी कहूँगा "मेरे पापा बेसटेस्ट"

Tuesday, June 6, 2023

मिलता नहीं है

एक वीभत्स रेल दुर्घटना ...एक करुणड दृश्य के बाद की कविता...

 

 मिलता नहीं है 

मेरा लड़का!!
वो मिलता ही नहीं!!

और एक नाउम्मीद
बूढ़ा बाप
ढूँढ रहा है 
अपने युवा बेटे का
शव 
की कर सके 
विधिवत क्रियाकर्म
 और कर दे
मुक्ति अपने 
बेटे की
अपनी खुशिओ की
अपने लाठी की
सहारे की

कई सौ मुर्दों से
पटी  हुई है ज़मीन
और 
सबकी ही अपनी 
 करुन कहानी 
इतनी
की सुख जाए 
आँसुओ के समंदर

पूछा किसी ने 
क्या हुआ बाबा
 वो बुदबुदाता रहा 
खोजते हुए 
बस शव
"वो मिलता ही नही"
"वो मिलता ही नही"

एक ऐसी गुहार
बेबसी
 की  देख
आँसुओ की धारा 
बन निकल पड़ी
एक दुखो के एक लावा सी
आँखो से,हृदय से

वेदना तिव्र ऐसी की
मैं रोना चाहता हूँ
चीखकर
कसकर
उस पिता से गले लगकर
 शायद 
 दोनो ही 
सीने मे
 महसूस हो कुछ शांति 
दो पलों की ही सही


 

Sunday, May 14, 2023

मैं जंगल हो जाना चाहता हूँ

मैं जंगल हो जाना चाहता हूँ
जैसे एक नदी
या एक बड़ा सा पेड़
एक चट्टान
या की एक पशु
शिकार या शिकारी
एक उड़ता पंछी
बंदा दो मुझे  बस
 घास का फूल
या फीओर बहा दो
जैसे चलती है वान्हा
ठंडी शीतल हवा

एक पगडंडी
जान्हा से अभी कोई
नील गाय  चीतल
या निकला हो कोई हाथी का
एक परिवारिक झुंड
मैं हो जाना चाहता हूँ
मस्तमौला बंदर
या फिर
एक गिलहरी
कुछ भी कुछ भी
जैसे जंगल का
सूनापन
या फिर एक
सिहरन पैदा करती
दहाड़ चिंघाड़
एक बड़ा सा उँचा पहाड़
बस कुछ भी कैसे भी
मैं बस एक जंगल
हो जाना चाहता हूँ.