तो भीया बन गई दीवाली एक दिन वाली ...फोड़ लिए पटाखे और खा लिए बाहर से खरीदी मिठाई....मन हो तो चलो आज तुम्हें 90 के दशक की दीवाली की सैर कराता हूँ।
Rahul Pathak
तो भीया बन गई दीवाली एक दिन वाली ...फोड़ लिए पटाखे और खा लिए बाहर से खरीदी मिठाई....मन हो तो चलो आज तुम्हें 90 के दशक की दीवाली की सैर कराता हूँ।
मैं कलश . कवि कलश... धर्म प्रिय ,न्याय प्रिय ,रणधीर के साथ ज्ञान के साक्षात अवतार प्रभु संभाजी जी महाराज का मित्र..सुनिए हमारी एक छोटी कहानी..
मैने संभाजी को पहली बार देखा जब शिवाजी महराज औरंगजेब के द्वारा दिए शांति प्रस्ताव के छल मे आगरा के किले में नजरबंद थे....शिवाजी महाराज... साक्षात शंभू .... शरीर ऐसा की जैसे स्वयं अर्जुन ..नरश्रेष्ठ. .और संभाजी जैसे भगवान कार्तिकेय..माँ अंबे के त्रिशूल से रचित महाकाव्य के सर्ग जैसे संभाजी..
शिवाजी कैसे भी क़ैद से आज़ाद होने को व्यग्र थे....उनके मन मे इस बारे मे मंथन जारी था...उन्होंने मुझे और मेरे परिचित परमानंद जी को संभाजी के सुरक्षा का दायित्व दिया..शिवाजी जानते थे की शिवाजी और संभाजी दोनो का साथ मे आगरा से निकलना लगभग नामुमकिन था.. अपने गले में कौड़ियों की माला पर हाथ फेरते .. ..संभाजी महाराज से क्षत्रपति ने कहा था..." जल्द मिलेंगे संभा ... ध्यान रखना "
कुछ दिनों के बाद खबर मिली शिवाजी महाराज शाही सेना को चकमा दे मराठा साम्राज्य सकुशल पंहुच गये ... हम सब ने भी सिंह के शावक को भी छिपतेछिपाते कुछ माह में रायगढ़ लौटा दिया....इस बीच संभाजी के साथ बिताए हर पल मेरे लिए धरोहर थे...
कई साल बीत गये...औरंगजेब इस्लाम का सहारा ले मुगल साम्राज्य का विस्तार कर रहा था. .गैर इस्लामिक प्रजा पर प्रतिदिन अत्याचार बढ़ते जा रहे थे.... ..धर्मगुरुओं का निर्ममतापूर्वक हत्या.. जजिया...तलवार के बल पर धर्म परिवर्तन...मंदिरो , मूर्तियों और गर्भगृह का विनाश..हिंद महिलाओं का यौन उत्पीड़न...
अपनी आँखो से मैने मथुरा के मंदिर का विध्वंस देखा....उत्तर मे चारो तरफ त्राहिमाम मचा हुआ था....औरंगजेब के मुगल सिपहसालार हिंदू जनता तलवार की नोक पर विधर्मी बना रहे थे...इस्लाम को ना कहने वालों के लिए बस मृत्यु ही रास्ता थी..
उधर दख्खिन मे शिवाजी मजबूत होते जा रहे थे.. ..एकमात्र हिंदू राष्ट्र का उदय हो रहा था....औरंगजेब के सारे हथकंडे पैंतरे असफल रहे थे...मराठा सेना ने नाक मे दम कर रहा था...मैं भी एक आशा के साथ दख्खिन की तरफ कूच किया
इधरसंभाजी युवराज हो गये थे..लोकप्रिय युवराज जैसे थे युवराज कौशल नंदन श्रीराम... मैने युवराज संभाजी महाराज को देखा जब वह रायगढ़ के समीप एक शिव मंदिर मे बैठे आस पास के गाँव वालो की विनती सुन रहे थे ...एकदम वीरता की सजीव मूर्ति....बलिष्ठ बाहू ...सुदृढ़ सीना...सुकोमल चेहरा..घनी मूँछे ..युवराज ... .मैने आवाज़ लगाई "शंभूऊऊउउ" . .संभाजी ने उठ कर मुझे गले लगा लिया...हमारा भावुक मिलन था कई वर्षो के बाद..
महाराज शिवाजी माँ अंबे की गोद मे लौट चुके थे...अब युवराज नये छत्रपति थे.... संभाजी महराज के नेतृत्व मे मैसूर प्रदेश ,आदिलाबाद ..और कई किले जीत लिए गये ...हर अभियान पर विजय पताका फहराई जा रही थी...महराज संभाजी का यश बढ़ रहा था
शिवाजी से हर बार मत खाए कुटिल औरंगजेब ने एक विशेष अभियान के तहत विशाल सेना मावल खंड के लिए भेजी....अभियान था संभाजी और मराठा साम्राज्य का पतन
धोखा
महराज सवेश्वर के पास एक मंदिर मे अपने कुछ सेनानायकों संग विश्राम कर रहे थे..........मराठा मीरजाफर गणोजी ने घर का भेद दिया था..
राज्य से गद्दारी की थी....सुबह की लाली ही फूटी थी ..और नीरव शांति को भंग करते हुए जोरो की जंग जारी थी. मुगल फौज महाराज संभाजी को घेरे हुई थी....सेनापति म्हलोजी बाबा तलवार से दीवार बने संभू और इख्लास ख़ान की मुगल फौज के बीच खड़े थे....मराठे हर हर महादेव का जयकारा कर रहे थे... साथ मे मुगलिया अल्लाह हू अकबर से गगन गूँज रहा था...म्हलोजी बाबा रणचंडी को अपनी तलवार से मुग़लिया नरमुंडो की आहुति दे रहे थे
मैं शंभूराजे के दाहिने हाथ पर रक्षा पंक्ति मे था....महाराज संभाजी मुगल फौज को गाजर मूली की तरह काट रहे थे....अपने घोड़े चन्द्रावत पर सवार साक्षात काल का रूप बने हुए थे...पर मुगल सेना जैसे टिड्डो का फ़ौज़..ख़तम होने होने का नाम ही ले रही थी... श्वानो मे सिंह फँस गया हो ऐसे ही महराज मुगलों के बीच फँसे हुए थे... मुगल फ़ौज़ के सैनिकों ने हर तरफ से महाराज को घेर लिया..हज़ारो के मुगल सेना से मुट्ठी भर मावले सैनिक जूझ रहे थे...म्हलोजी बाबा का तेग भी सैकड़ों की मुग़लिया तादाद के सामने फीका होता जा रहा था... अनेको वार से घायल महावीर बुजुर्ग सेनापति ने आखिरकार अंबे के चरणों मे अपना स्थान सुरक्षित किया ... एक बान मेरे दाहिने हाथ पर लगा और मैं घायल अपने घोड़े से "महाराज" चीत्कार करता नीचे जा गिरा......म्हलोजी बाबा का दुख खत्म नही हुआ था उस पर "महाराज" की मेरी एक करुण पुकार ने संभाजी तलवार की तेज़ी थोड़ी कम कर दिया..संभुराजे ने अगले पल अपने आपको टिडिदल मे घिरा पाया....तलवार चलाने की जगह भी नही बची थे.. महराज क़ैद मे थे..साथ मे था मैं ..
आज नराधाम औरंगजेब के जीवन का सबसे खुशी का दिन था.... दक्खिन जीतने का स्वप्न जीवंत हो उठा... सारा हिन्दुस्तान उसे इस्लाम के झंडे के नीचे नज़र आने लगा था जिस राह के रोड़ा रहे थे साक्षात शंभू अवतार छत्रपति शिवाजी महाराज और मराठे थे..और थे शिवाजी सुता संभाजी
इख्लास ख़ान अपने मुगल फ़ौज़िया पिता फ़ौजदार मुकर्रब ख़ान संग कैदी संभाजी को ले जल्दी जल्दी निकल पड़ा था कन्हि सुरक्षित दूरी के लिए ताकि अपनी सफलता का जश्न मना सके..... क्यूंकी मावल प्रदेश के सैनिको का डर था...मराठा सेना का छापा वार युद्ध प्रसिद्ध था..शिवाजी के लड़ाके अचानक प्रकट होते और काम करके ऐसे गायब होते की ढूँढे ना मिलते..मुग़लिया सरदार जानता था की मावले अपने महराज के लिए जी जान लगा देंगे
जैसे तैसे महाराज को ले मुगल सेना पहुंच गई बहादुर गढ़ छावनी मे..जान्हा साक्षात था नरपिशाच औरंगजेब जिसने सत्ता के लिए अपने भाइयों और पिता के कत्ल से भी परहेज नही किया था..और अपने धर्म के नाम पर अनगिनत लोगों की हत्या और अंग भंग...महाराज को उनके सबसे बड़े कर्म.."अपने धर्म की रक्षा" के लिए अपने हाथ से वीभत्स मृत्युदंड देने को उतावला था....
उस नीच आलमगीर ने फरमान जारी किया मावले राजवंशी इन "कैदियों" का जुलूस निकाला जाए और बहादुर गढ़ किले तक लाया जाए..महाराज संभाजी और मेरे हाथ बाँध कर और मसखरे जैसे दिखने वाले कपड़े पहना दिए ...चारो तरफ हजारों की भीड़ थी.. जो जोर जोर चिल्ला रहे थे...बहुत से ऐसे थे जिन्होने ने अभी अभी कलमा पढ़ा था...और अपने आप को ज्यादा धर्म प्रेमी दिखाने मे उत्साहित हो कंकड़ और अपशब्दों की बौछार किए हुए थे..शोर से हमारी कान फटे जा रहे थे...काफ़िर को मारो...काफ़िर को खिचो......कई मर्माहत करती गालियाँ......
पहले तो हमे रस्सी से बाँध के पैदल घसीटा गया ..कई बार गिरने जगह जगह से कपड़े फट गये.....जगह जगह शरीर पर खुरचने से रक्त आने लगा था ...कई मन की दूरी हमे घसीटते हुए गये....सारा शरीर छिल गया था फिर भी शक्ति संचित करके हम दोनो फिर खड़े हो उठे.. इस बार बची खुची शक्ति लगाकर शंभुराजे ने रस्सी खींचने वालो को आगे ना बढ़ने में लगा दिया... जब सैनिको से ना देखा की अब ये ऐसे नही हिलेंगे और उन्हे और ज़ोर लगाना होगा तो ....हमे को उठा के ऊँट पर टांग दिया गया....और चारो तरफ से कोडो की वर्षा हो रही थे..हमारे दर्द की सीमा नहीं थी...शरीर का हर अंग रक्त वमन कर रहा था...
जिन शंभू महराज के सामने जनता शीश नवाती थे.. जो शरीर रेशम के वस्त्र और सोने के आभूषण से सुसज्जित रहते थे उसकी ऐसा दुर्दशा देख के मन रो उठा मेरा..महराज ने मुझे रोता देख धीमे आवाज़ मे पूछा .." क्यूँ रोते हो कलश ...क्यूँ .. अपनी शक्ति बचा के रखो कविराज" और ऐसा कहते हुए स्वयं बेसुध हो बैठे...मेरी भी आँखें बंद होने लगी..मूर्छा सी छा गई....लोगों का हुजूम और काफिरों को मारो के नारे के बीच हम आगे बढ़ रहे थे...
सरेआम हमे मार खाते सहते कई घंटे बीत चुके थे.....और दर्द की परकाष्ठा से महराज संग मैं कलश बेहोश हो गये...
हमारी आँखे खुली वापस आलम गीर के दरबार में...सामने मऩहुश औरंगजेब बैठा नमाज़ पढ़ रहा था.... भद्दा चेहरा बूढ़ा परंतु कुटिल ....सामने थे हमारे महराज ...निडर निर्भीक स्वयं शंभू के पुत्र महाराज संभाजी.....शरीर का पोर पोर दर्द से डूबा था...तथापि महाराज ने दरबार, औरंगजेब और सभी सिपहसालारों को अनदेखा करते हुए कहा... कविराज कहो क्या कहते हो हमे इस दरबार मे देख के.....और मेरा कवि मान फुसफुसा उठा..
"राजन तुम हो साँचे ,खूब लड़े तुम जंग,
तेज तुम्हारा देख के भौचक है औरंग"
दरबार चालू हुआ ...सारे दरबार के सामने ...महराज से उनके शाही दरबार के गुप्तचरों के बारे मे...रायगढ़ के खजाने के बारे मे ..पूछा गया..महराज एकदम दृढ़ शिला के जैसे चुपचाप बैठे रहे.....मुझे भी कभी जागीर का लोभ दिया.. कभी सोने चांदी आभूषण के साथ जान बख्शने का लोभ दिया...पर यह शरीर तो अब संभाजी का था...धर्म का था....
अंत मे हमें इस्लाम कबूल करने को कहा गया... महराज का उत्तर सभा के पटाक्षेप के लिए काफ़ी था..
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संभा जी ने गरजते हुए औरंगजेब की आँखो मे आँखे डाल के कहा.... " अधम मुगल सम्राट जीवन के किसी भी क्षण पर मुझे ये मंजूर नही..चाहे तन पर शीश रहे ना रहे... तुम पूरे मुगल राज्य के आभूषण स्वर्ण का प्रस्ताव रखो या फिर आलमगीर तुम खुद क्यूँ ना अपनी पुत्री जिन्तुन्निसा का विवाह ही क्यू ना मुझसे करवा दो.. ये शीश केवल माँ अंबे के चरणों मे ही झुकेगा..इस्लाम कतई मंजूर नही"
आलमगिर का बूढ़ा रक्त काफ़ी देर तक उबलता रहा होगा.....और नतीजा था हमे कालकोठरी....
यातना
हमारा दंड़पत्र आ चुका था.....औरंगजेब का आदेश था वाचाल जिव्हा को काटने का और आंखों की तेज को बुझाने का..... हर दंड महाराज को दो बार भोगना था..क्यूंकी आदेश के अनुसार हर पहला दंड पहले मुझे को मिलना था फिर महाराज को...
सिपहसालार रूहल्ला ख़ान ने आदेश का तामील किया...पत्थर दिल जल्लादों को चुना गया....लोहे की संड़सी और अंगीठी आ गई थी...काले कलूटे हबशी जल्लादों ने मेरा जबड़ा पकड़ा.. पर मैं केवल कवि ही तो नही था..एक लड़ाका भी था....२-३ हबशी के बस का नहीं था....कुछ और जल्लाद आगे बढ़े और मेरा मुँह खोल दिया.....जिव्हा से विदा लेने का समय आ गया ये जान के मैने ज़ोर से अंतिम बार अपने स्वामी को प्रणाम कहा....."स्वामी प्रणाम ......स्वामी प्रणाम.... स्वामी प्रणाम जय भवानी जय चंडी माता" और फिर एक ही झटके मे हबशियों ने मेरी जीभ खिच के ऐसा वार किया की जिभा का टुकड़ा दूर जमीन मे जा गिरा...और २-३ दाँत बाहर आ गये...पूरा शरीर अति वेदना से कांप उठा..मुँह से खून का फ़ौवारा फुट पड़ा ..
महाराज ने बँधे हुए ये दृश्य देखा एक धीमी पुकार लगाई.."कविराज" ऐसा लगा जैसे अपने बाल राजा को दुलार पूर्वक बुला रहे हैं....मैं अधमरा सा होता ज़मीन पर गिर पड़ा
मेरे दर्द का अन्त नहीं था...मुझे अपने महराज का वोही हाल देखना था जो अभी मेरा हुआ था..१०-१५ हबशियों ने महराज को पकड़ ऐसा ज़ोर लगाया की मूह अपने आप खुल आया ..एक हबशी ने संड़सी से जिवहा को पकड़ कर खींचा और फिर ला इलाह चिल्लाते हुए एक ज़ोर का वार किया ...मुझे महाराज के मुख से आवाज तक नही सुनाई दी ..केवल एक रक्त धारा मुँह से बह रही थी....वो मुख जो हर वक्त जग्दम्बे जग्दम्बे का जप करता था.... वोही क्षत्रीय कुलावंतास श्रीमान माहराज हिंदुपद गो ब्राह्मण प्रतिपालक संभाजी महराज का मुख रक्त वमन कर रहा था....ये दृश्य देख मेरी आत्मा भी चीत्कार मारती हुई रो पड़ी...
हमारे दर्द का अंत नहीं था....अब दंड का दूसरा भाग चालू हुआ...सामने गर्म सलाखें लिए जल्लाद को देख मैं समझ गया की अब आँखो की बारी है..समय कम था...मैने संभाजी महाराज के लहूलुहान मुख को निहार का अपने चित्त कोष को भरने लगा......ज्यों ज्यों जल्लाद सलाखें लिए आगे बढ़े मैं अपनी आखे और बड़ी कर महाराज का मुख निहारता गया....चर्र चर्र और कुछ ही पलों मे दोनों सलाखें मेरी आँखों की पुतलियों को भेदते हुए निकल गई...मेरे मुँह कटी हुई जिव्हा के कारण केवल आं आं शब्द फुट पड़ा....
इस बार महाराज की स्पष्ट आवाज़ मेरे कानो मे आई.." मृत्यु से ना डरो कविश्रेष्ठ" .. लगा असीम दर्द मे भी जैसे औषधि के छींटे आ पड़े
आगे होने वाली घटना मेरे कानो ने देखी ...महराज हर दंड दो बार झेल रहे थे...एक बार मेरा दुख ..फिरउन पर खुद बीतता हुआ"
चारो तरफ कोलाहल था पागल नृशंश जनता इस दंड के मज़े ले रही थी..."अल्लाह हू अकबर ....काफ़िर काफ़िर "का नारा सर्वत्र था..
तभी मेरे कानो ने फिर से वही चर्र चर्र की आवाज सुनी....मतलब साफ था की सूर्यबिंब समान संभाजी भोसले महाराज नेत्रहीन हो चुके हैं...ग्राम सलाखें से जलते मांस की गंध मेरे नथुनों मे घुस गये...आं आं कहते महराज का स्वर मेरी पीड़ा को और बढ़ा रहा थे..हमारे नाखून बाल तक उखाड़ लिए गये.... कोलाहल धीरे धीरे शांत हो रहा था..जल्लाद भी हमें सताते सताते शायद थक गये थे...दर्द से हम दोनो की आं आं की निकलती ध्वनि धीर धीरे सब शांत होने लगा...
दर्द से बिलखता मेरा शरीर अपने बचपन से होता हुआ महराज के संग अपनी यादों मे जाने लगा था.......मुझे यकीन था की महराज भी अपने बचपन मे आनी जिजाऊ ,अपनी धाराऊ..आबा साहब.. पत्नी यशुदेवी.. भाई राजाराम ..अपने बालराजा और अपनी बिटिया की यादों मे गुम होंगे..
हम दोनो रह रह कर जिव्हा के अवशिष्ट भाग और जलते नेत्रो मे असीम पीड़ा से व्याकुल थे....मूह से निकलती थी केवल आंआं की आवाज़ से..और उसी आं आं की भाषा मे महराज पीड़ा पर मलहम लगाते और मैं उनके...
क़ैद होने के बाद से हमने अन्न का एक भी दाना नही ग्रहण किया था...हमारे भूखे प्यासे शरीर को ये पीड़ा सहते आठ से नौ दिन हो गये थे...छावनी के कारागार में मुर्गे की बांग से हम दिन का पता चलता...बस आं आं की आवाज़ थी जिसे सुन के हमे पता लगता था की अभी हम जिंदा हैं...
नौंवा दिन उदित हुआ..और आलमगीर नया दंड चालू हुआ...इख्लाख़ ख़ान जल्लादों की नई फ़ौज़ लाया और ज़ोर से चिल्लाया ..
खाल छिल दो इन दोनो काफिरों की.....जैसे कद्दूकस के खोपरा रेता जाता है..वैसे ही हमारे शरीर को कद्दूकस किया जाने लगा..
छुरो से छिलते शरीर से दर्द के कारण आं आं निकलना भी बंद हो गया....हम दोनो अपने वेदना को दबाए अपने खाल खिचवा लिए...पर तभी एक नया आदेश आया...नमक पानी छिड़को इन हराम जादो पर..तांबे की चिलमिचिया हिली और नमक पानी के गरम फुवारों से हमरा शरीर दहल गया.....वापस से दोनों के मूह से आं आं आं की ध्वनि फुट पड़ी...भीषण यातना पूर्ण दंड देख तमाशबीन कोलाहल मचाते रहे. धीरे.. धीरे शोर थम गया...हमारी वेदना बस हम ही जान सकते थे...ऐसी वेदना की मृत्यु भी उस वेदना के आगे मृत्यु भी सुखदायी लगे
उपर आकाश नीला था की काला...अभी दिन था की रात ...हम दोनो बंदी इस समय की सीमा से दूर जा चुके थे...
हमरी आँखे निकालने के बाद चलती यातना का आज १२वाँ दिन था....मेरा अंत नज़दीक था..मेरी वेदना चरम सीमा लाँघ चुकी थी ...बस प्राण छूटने को थे..मैने "प्रणाम... स्वामी को मेरा प्रणाम " कहा बदले मे गले से बस आं आं की आवाज़ फूटी ..महराज ने भी आं आं कहके उत्तर दिए...जैसे कह रहे हों ..ना कविराज मेरे से पहले ना जाना...पर महाराज की ये अंतिम आज्ञा पर मेरा अधिकार नही था..महाराज की लगातार आं आं की आवाज़ लगा मुझे राक रहे थे...पर काल पर मेरा अधिकार ना था...आं आं कहते महराज पता नही मुझसे क्या कहना चाहते थे...आं आं की उनकी लोरी
सुनता मैं जगदम्बिका की गोद मे जा बैठा...
ठीक से याद नही पेर शायद ठीक एक दिन बाद ....मैने देख के मुझे गोद मे लिए माँ अंबे अपने अपने हाथों को फैला ..दूर किसी विशिष्ट के आगमन और स्वागत हेतु जल्दी जल्दी चली जा रहीं हैं.. ..... सामने थे मेरे महराज. मेरे प्रभु...श्रीमंत महाराज छत्रपति संभाजी...अपने कौड़ियों की माला फेरते जगदंबे जगदंबे कहते माँ अंबे की गोद मे आ समाए...
उपसंहार
मराठा सूर्य अस्त तो हुआ पर संभाजी की शहादत के एक लौ से.लोग जागने लगे ..शाही सेना से हिंदू किनारा करने लगे.... इस्लाम परस्त बूढ़े औरंगजेब के हाथ से भारत फिसलने लगा.
ये हमारे होश सम्हालने के बाद बिहार और अपने पापा के गाँव जाने की पहली यात्रा थी ..उस जगह की जहाँ मेरे पापा ने अपना बचपन बिताया.. हम ३ भाई बहन अपनी किशोरा अवस्था में थे...और उनके बचपन से कई किस्से-कहानियाँ सुनी थी... कैसे एक बड़े तालाब मे पापा तैराकरते....वो गन्ने के खेत जहाँ से कोई भी कितने भी गन्ने तोड़ के खा सकता था.......खेतों के पास गन्ने से बनते गुड और सिरे..मिठाई...वो तालाब जिसके सामने ही माँ भवानी का मंदिर था....कैसे गाँव फागुन का रंग होता..होली ३ दिन तक खेली जाती...एक गाँव से दूसरे गाँव लोगों में होली का हुड़दंग होता...... कैसे लोग ज़बरदस्ती भांग वाली मिठाई खिलाते..पापा और उनके बचपन के दोस्तो के किस्से...वो नहर जिसे पर करके बाढ़ के समय स्कूल जाना होता था... चने बूट से भरे खेत....वो पेड़..वो गिल्ली डंडा का खेल...वो हॉकी..वो आम का बागान..पेड़ो पर चढ़ना..और कई तरह के गाँव के खेल....एक बड़ा ही आकर्सन था हमे....मुझे तो अपने पापा छोटे से ये सारे काम करते दिखते थे....सारे क़िस्सो के दौरान मै उनके बालक रूप को सोंच सोंच के मन मे बड़ा हंसता और खुश होता...
इन सबका एक खाका सा मन मे बन गया था...कल्पनाओ में हम सबने तालाब ..भवानी मंदिर...नहर ...जामुन का पेड़..खेत खलिहान सब देखा था..
इन सबको साकार देखने बड़े उत्साह के साथ हम बस में जा रहे थे....पूरे २४ घंटे की जर्नी थी..रोमांचक....बिहार की सीमा में हम रात को पंहुचे...जो की नक्सल प्रभावित था...और ठीक कुछ दूरी पर हमारी बस खराब हो गई..उस समय बिहार अपने जंगल राज से बदनाम था.. बस हमारी खराब हुई एकदम जंगल वाले इलाक़े में और वो भी काली रात. में..हर तरफ अंधेरा...सभी के मन में डर ...लोग आते हुए ट्रक रुकवा के लिफ्ट ले रहे थे...हम सब भी बस से अपना समान नीचे ला कर किसी नेक ट्रक वाले का इंतज़ार करने लगे...चारो तरफ केवल सुनेपन की आवाज थी..घोर अंधकार ...रोड के उस पर मैने पहली बार इतने सारे जुगनुओ को एक साथ चमकते देखा.....दूर दूर तक सन्नाटा था...रोड पर आते केवल इक्के दुक्के ट्रक इन सन्नाटो को चीर रहे थे...सबकी जान सांसत मे थी . पर होइहि सोइ जो राम रचि राखा जपते हुए सब शांत दिखने की कोशिश कर रहे थे...कुछ ही देर मे एक भले से ट्रक ड्राइवर ने हमे लिफ्ट दिया..और हम पंहुच गये ...डेहरी ऑन सोन रेलवे स्टेशन....जहाँ से आगे की यात्रा ट्रेन से होने वाली थी..
ये ९० का दशक था..जब आप अपने यात्रा के दौरान ..खाने पीने का पूरा सामान साथ ले के चलते थे....पूरी भूनजिया और ठेकुआ....ये ३नो का भरपूर स्टॉक था. और हाथ मे ठेकुआ लेकर मै रेलवे स्टेशन की न्यारी दुनिया देखने लगा... ..कई सारी रेहाड़िया...छोटे खोमचे...प्लॅटफॉर्म पर अपनी चादर बिछा कर सुस्ताते लोग...ट्रेनो की सिटी और वो अनाउन्स्मेंट ..ट्रेनो की आवाजाही ...हमारी ट्रेन लेट थी..हम सभी प्लॅटफॉर्म पर बेडशीट बिछा कर बैठ गये और पूरी भूनजिया का भोग चालू हुआ......पापा कुछ समान लाने बाहर जा रहे थे साथ मे मै भी हो लिया....ज़्यादा कुछ याद नही पर होटेल वाले लीटी चोखा से मेरा पहला एनकाउंटर था शायद वो ....छोटे से रोड साइड होट्ल में लिट्टी चोखा प्याज़ चटनी...एक अलग ही स्वाद और फीलिंग ...
ट्रेन से पटना पंहुचे...मामा आगये थे माँ को ननिहाल ले जाने..और आगे की हमारी यात्रा में बस पापा और हम ३ भाई बहन ही थे..और ये हमारे लिए और भी मज़े की बात थी...क्यूंकी पापा से हमे डाट ना के बराबर मिलता था तो पिटाई का कोई ख़ौफ़ ही नही था...खैर ऐसे वैसे कैसे कैसे...हम पंहुच गये ...मेरे पापा के गाँव आमसरी..सुबह के ५ बजे का समय था.....बस रुकी..हम समान के साथ उतरे..और बस ने हमे हॉर्न के साथ विदा किया.... रोड पर थे बस पापा ,दोनो बहन ,मैं और समान....चोरो तरफ और कोई भी नही... सुबह की शीतल हवा...और सामने थी हमारी कल्पना की उड़ान और उनकी सच्ची तस्वीरें....नहर ..और उस पर बना पुल और खेतो को शृंखला.... जब भी पापा अपना गाँव याद करते ये दोनो को जिक्र ज़रूर होता....हम सबने अपना समान उठाया..और चल दिए गाँव की ओर..
साथ चल रही पापा के पहचान की हवा..सड़क....मैं पापा की फीलिंग्स को समझ पा रहा था शायद...भोर होने का आरंभ हो चुका था....
आसमान मे लालिमा आने लगी थी....और थोड़े ही देर मे खेतों ,तालाबों ,झाड़ी को पार करते हुए गाँव के घर आने लगे थे.....हम ३नो भाई बहनों ने जो कल्पना की थी उससे काफ़ी अलग था सब....
बात कुछ पुरानी है.. ना ही कथा है ना ही कहानी है....और डरने की बात नहीं ये कविता भी नहीं है...मैं ये अपने लिए लिख रहा हूँ ताकि वो बिता हुआ पल फिर से जी सकूँ...और आप अगर इसे पढ़ कर मेरे साथ उस पल को जिएं तो मुझे कोई एतराज भी नहीं है
तो बात तब की है जब मैं एक छोटा सा ..होनहार...और अपने पापा का आग्याकारी बेटा था....कुल जमा सातवीं क्लास मे था...ना ही पूरा किशोर ..और ना ही छोटा बालक....वो नब्बे के दशक का समय था...पापा के पास सेकंड हैंड राजदूत आई.. कुछ समय बाद पापा ने जब महसूस किया की हाथ थोड़ा साफ हो गया है, तो उन्होने एक लॉन्ग राइड का प्लान किया...वैसे वो समय लॉन्ग राइड का नहीं था...आपको कुछ काम निकालना पड़ता था..
हमारा एक छोटा सा हिन्दी मीडियम स्कूल था जिसके कर्ता धर्ता पापा ही थे...कर्ता धर्ता मतलब -प्रिंसिपल, टीचर,-स्टेनो जो भी हो सब का काम वो खुद ही किया करते थे...उस समय शिक्षा विभाग हमारे शहर से कुछ ६० कि.मी. दूर एक दूसरे जिले मे था..पापा ने प्लान बनाया वहां जाने का ..और साथ में मुझे भी ले जाने का ..
खैर अगले दिन सुबह हम दोनो निकल गये ...पापा के पेट पर अपने छोटे से हाथ का सुरक्षा घेरा डाले पीछे बैठा मैं दाँये बाँये सिर घुमाता जीवन के इस समय का आनंद ले रहा था....और थोड़े ही देर में हम अपने शहर को छोड कर बाहर निकल लिए...रोड के दोनो तरफ हरे हरे खेत ...गाँव..पेड़..ठंडी हवा...कच्चे पक्के मकान..नाले..तालाब...वो हर चीज़ जो आँखों को आकर्षित करती है..
पापा रास्ते में पड़ते पेड़ ..फूल ...गाँव .नहर ...रबी की फसल..खरीफ की फसल सबके बारे मे बताते हुए चल रहे थे...राजदूत की फटफट में मैं आधी बात ही सुन पा रहा था.. मुझे हल्की हल्की भूख लग रही थी...मैने पापा को बोला की भूख लगी है....और पापा समझ गये एक छोटे बच्चे को बाहर निकलने पर जो भूख लगती है, वो घर से लाए रोटी सब्जी से नही भरती.... पापा बोले ..थोड़ी देर में रुकते हैं कन्हि....और करीब ५ कि.मी. चलने पर एक छोटी सी टपरी रोड साइड पर थी..बाहर २ बड़े बड़े गंज रखे थे..एक घड़ा था और साथ में कांच के बड़े से जार में समोसे रखे थे....
रोड के इस पार ये तपरी जैसा ढाबा ..और उस पार बह रही थी नहर...सूरज सर पर आने वाला था..पापा ने पूछा क्या है आपके पास बच्चे के लिए....समोसा तो दिख ही रहा था तो उत्तर में दुकानदार ने दोनो गंज के ढक्कन खोल दिए,...एक मे गरमा गरम हरी पीली मटर की चाट थी और दूसरे में गरम गुलाबजामुन...पापा ने मेरी तरफ देखा ..और मैने बिना समय गंवाए मटर की तरफ ..पापा ने एक प्लेट मटर का ऑर्डर कर दिया..थोड़े ही ही देर में मेरे हाथ में एक स्टील के पतली सी प्लेट में थी हरी पीली गरमा गरम मटर की पानी वाली चाट....सच कहूँ तो ऐसा टेस्ट कभी भुला नही जा सकता...लाल कलर के प्लास्टिक की कुर्सी....अच्छी ख़ासी धूप...और साथ मे गरम तीखी पानी वाली चाट ..उस उम्र मे और उस दौर मे इससे ज़्यादा मैं शायद भगवन् से और कुछ मांग भी नहीं सकता था....पर ऐसा सच में नहीं था..कोने में जमीन मे एक गोल्ड स्पॉट(उस समय की एक कोल्ड ड्रिंक) का एक कैरेट बार बार मुझे अपनी और देखने पर मजबूर कर रहा था....हाफ प्लेट चाट खाने के बाद अब मेरा आधा ध्यान चाट पर और आधा ध्यान गोल्ड स्पॉट पर ....ऐसा नही था की मैं अपने पापा से डरता था..और मैं एक गोल्ड स्पॉट लेने नहीं बोल सकता था...शायद ये उस दशक के बच्चों मे एक शर्म थी...या यूँ कहे अनुशासन था..एक झिझक थी.....मैने चाट ख़तम की....पापा से नज़रेचुरा कर ..ठंडी आह के साथ गोल्ड स्पॉट को भरपूर नज़रों से देखा....और वापस जर्नी स्टार्ट करने के लिए रेडी सा हो गया....मैने पापा को बोला चलें अब...पापा मुस्कुरा कर बोले हां चलते हैं......और फिर दुकानदार को पैसे देते हुए बोले ..ये एक गोल्ड स्पॉट की बोतल भी जोड़ लेना...
वो कहते हैं ना..माइ पापा इस बेस्ट...बस मैं जोड़ से वोही चिल्लाना चाहता था....पर मुँह मे फँसी गोल्ड स्पोर्ट बोतल की गर्दन ने ऐसा होने नहीं दिया ...और २-३ सांस में मैंने पूरी बोतल पेट मे उडेल ली....पापा मुझे खड़े मुस्कुराते देखते रहे...ऐसी मुस्कान या तो आप छोटे से बच्चों मे या फिर पोपले मुँह वाले बूढ़ो मे ही देख पाएंगे ..प्योर..निर्मल..सरल...सुंदर..
और फिर २-३ किक और पापा की राजदूत फिर स्टार्ट...पेट भर गया था...मन तृप्त था और मैं आसपास की छोड़ इस सोंच मे डूबा था की जेब में पैसे होने पर भी पापा चाट पकौड़ी या पानीपुरी क्यों नही खाते...जैसे आज भी नहीं खाए...और किसी मेले मे भी नही खाते..उल्टे अपने हिस्से की मिठाई हमको बाँट देते हैं....मेरे लिए दुनिया का सबसे बड़ा आश्चर्य था ये...कोई कैसे अपने हिस्से का कलाकंद किसी और को दे सकता है...जब भी वो ऐसा करते तो मैं उनसे कलाकंद ले के चुपचाप उनको ताकते हुए बस यही दुविधा में रहता था....
खैर कई सारे खेत, कुँए, ६० कि.मी. लंबी सड़क को क्रॉस कर हम पहुंचे शिक्षा विभाग....काम बड़ा नहीं था ..हम पहुंचे दुबे जी के पास..उनके कक्ष में...पापा ने उन्हे किया नमस्कार और उनको देख मैने भी हाथ जोड़ दिए..दुबे जी ने १० इंच के स्माइल के साथ पापा को नमस्कार किया और मुझे देख के बोले वाह पाठकजी लड़का तो होनहार है आपका...बस यही से वो मैने होनहार का तमगा लिया जो आपने इस प्रसंग के शुरुआत मे पढ़ा था... दुबे जी ने अपने सहायक को बोला पाठक जी के लिए चाय और बच्चे के लिए रसगुल्ला ले आओ...पापा ने हाथ जोड़ के बोला अरे नहीं दुबे जी...चाय तो रास्ते में ही हो गई..अभी थोड़ी देर पहले....ये फाइल पर आप साइन बस कर दीजिए...दुबे जी मुस्कुराते हुए बोले...ठीक है पाठक जी जैसा आप बोलें....अपने मातहत को चाय का मना कर दुबे जी बोले बस बच्चे के लिए रसगुल्ला ले आओ...पापा ने फाइल साइन करवाई...और ५ मिनिट्स इधर उधर की बात कर बोले ...चलता हूं दुबे जी...दुबे जी ने भी हाथ जोड़ नमस्कार कर विदा दे दिया....
और मैं रसगुल्ले का क्या होगा इस टेंशन मे आ गया..और कुर्सी में ही चिपक कर बैठा रहा ..पापा ने मेरा हाथ अपने हाथ मे ले लिया..मैं बोलना चाहता था..पापा रसगुल्ला....पर चुप रहा..
२०-२५ कदम चल कर मुझसे रहा नही गया और मैंने बोला पापा रसगुल्ला कौन खाएगा....इतना सुनते ही पापा ज़ोर से हँसने लगे और बोले बेटा कोई रसगुल्ला नहीं आने वाला था..ये तो बस फॉरमॅलिटी है..एक औपचारिकता....मेरे लिए ये नया था...की खिलाना नही है पर बोलना ज़रूरी है खा लो... उफ़ ये अजीब दुनिया...
खैर बाहर आते आते करीब २ बज गये थे....भूख वापस लग गई थी और ये समोसे वाली भूख नहीं थी....पापा ने बोला खाना खाएगा..मैने हाँ में सर हिलाया ....हम दोनो शिक्षा विभाग के पास मे ही एक होटल में बैठे.. पापा ने बोला २ थाली लगाने..मैं चुपचाप बैठा खाने के आने का इंतज़ार करने लगा.....थोड़ी ही देर में दोनों के सामने प्लास्टिक के टेबल पर २ थाली थी....एकदम कुरकुरी भिंडी..गरमा गरम दाल और चावल...टमाटर धनिया की चटनी प्याज और साथ में पापड़...मेरी याददाश्त में बाहर के खाने का शायद ये पहला अनुभव था....और जीवन के इस पड़ाव तक बेस्ट भी....पेट जीभ और मन तीनो धन्य धन्य बोल रहे थे..और मैं सातवें आसमान मे था..सोंच रहा था कि अच्छा हुआ खेलने के चक्कर मे मैने पापा को मना नहीं किया.....खा पीकर हम निकल पड़े ..वापस अपने शहर की ओर....
और जैसा मेरे लिए अनएक्सपेक्टेड था...और शायद आप लोग ने गेस किया होगा...जी हाँ...पापा ने घर जाने से पहले अपनी राजदूत रोकी मधु स्वीट्स की दुकान पर ..और मेरे साथ पूरे घर के लिए पैक कराया रसगुल्ला...
मैं भी चल रहा हूँ उसी पद चिन्ह पर पापा...सब कहते हैं और मैं भी कहूँगा "मेरे पापा बेसटेस्ट"