मुंबई ट्रेन धमाके के बाद की फुटेज देखने के बाद रची पंक्तिया...या आप दिल का दर्द कह ले....
बस भगवान से यही प्राथना है की कसाब जैसे दरिंदो को जितना जल्दी हो सके.....मृत्युदंड मिले
एक धमाका ,
बॉम्ब...
और ख़तम हो गई दुनिया...
सचमुच ....
मैं वन्हि था
एक बहन की
जो उतरी थी पानी लेने
प्लॅटफॉर्म पर
और सुनी वही आवाज़...
बॉंम्म्ममममममम
रोटी हुई ढूँढ रही है भाई को
जानते हुए भी की
साबूत ना ही मिल पाए..
और मिल गया
हाथ-
भाई का ही है..
घड़ी कर रही है अब भी.
टिक-टिक
जो बर्थडे पर दी थी उसने..
भाई को..
एक कर रही है इंतजार
अपने उनके
ऑफीस से लौटने का
बेसब्री से
मिलन का
लो बॉंम्म्ममम
और वह तो वॅन्हा पहुचा ही नही....
लौटेगा कैसे...
क्या होगा जब
खबर मिलेगी उसे
सोंच ता हूँ तो
बस याद आने लगती है
गुप्त जी की पंक्तिया
"बहू विधि विलाप प्रलाप वह
करने लगी उस शोक मे
निज पति वियोग समान दुख
होता नही इस लोक मे"
मौत से बहुत डरता था मै ....
बहुत..
बहुत ज्यदा....
क्योंकि बहुत मेहनत से
मुझ बुढ़ापे की आस को
पाला था उन्होने...
बाबूजी माँ...
सबकी की खुशियाँ मुझमे थी..
पर देखो मर ही गया मै
देख रो रहा हूँ
खड़ा हो
घर के आँगन मे...
रोटी माँ को
बुझे हुए 2 आँखे
दूर कँहि
खोए
टकटकी लगाए पिता को
जो शायद
मुसीबतो की टोह ले रहे है
जो आने वाली है
मेरे बाद
मेरी परिवार
मेरी पत्नी बचो पर
अपनी ना सुनी जा सकने वाली
दूसरी दुनिया की
आवाज़ मे कह रहा हूँ--
बाबूजी देखो
रो रहा हू मै
आँसू गिर रहे है मेरे
मै आपका बेटा
इस छोटी सी जिंदगी मे
नही
बदल पाया कुछ भी
जो सोंचा था
बचपन मे
मां मत रो
तुझे रोता देख
मै मर भी नही पा रहा
माँ अब भी गूँज रही है
मेरे कानो मे
उस विशफोट की
वो आवाज़ बॉम्ब्ब्ब्ब्ब्बबब
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