15 साल हो गये ...घर गये......अपने शहर गये भिलाई के पास 1 छोटा सा शहर वरदा ..
मेरी नज़र मे दुनिया का सबसे खूबसूरत शहर...जॅन्हा जन्मा..जॅन्हा खेल कर बड़ा हुआ...
जिसकी गंध मेरे तन मे बसी हुई है....स्टेशन पर उतरते हुए...करीब 20 साल पीछे चला जाता हूँ....
ना जाने क्यों कुछ अजीब सा लग रहा है...1 खुशी भी है.अपने शहर मे आने की...और दर्द भी..
मैं घर जा रहा हू..ऐसे घर जॅन्हा कोई ना होगा.......वॅन्हा पहुच कर खुश होना है या रोना है...
समझ नही पा रहा
यादो के साथ बहता मैं अपने घर की ओर जाता जा रहा हूँ की टेक्सी वाले की आवाज़ से ...वर्तमान मे आता हूँ
साब किधर जाना है...यान्हा से..ये है एंपी नगर.
मैं उसे रास्ता बताने लगता हू....दिल मे कुछ धुकधुकी सी हो रही...
आखिकार आ ही जाता है......मेरा घर...ताला लगा हुआ घर... कोई नही रहता..
पिछली बार करीब 15 साल पहले जब आया था....तो पापा लेने स्टेशन आए थे..
गाड़ी के घर के रुकते ही देखा माँ बाहर थी...
और जैसे ही मैं पैर पर झुका...आपने गले से लगा लिया था...
आँखो मे नमी आ जाती है...माँ कॅन्हा हो...वापस आ जाओ ना..देखो मैं लौटा हू...मिलना है..
माँ .....तेरे गले लगना है....
तभी हवा का 1 ठंडा झोंका....आता है...और मेरी रुलाई सी छूट पड़ती है....
ताला खोल के अंदर देखते हुए कैसा लग रहा है शब्दो मे बता पाना मुस्किल है...
बिल्कुल खाली .....जैसे निर्वात....कोई समान नही..बस 1 दरी बिछी है सामने..जान्हा शायद हमारी पुरानी बाई
का बेटा सोता है.....मेरे दिमाग़ मे 15 साल पुराना घर घूमने लगता है...वो पलंग..कॅलंडर..शोकेस..टीवी..
सोफा..सब के सब जैसे वैसे के वैसे है..लगता है जैसे...
अभी ही दीदी आके कहेगी.."ले भाई चाय पी..जब तक नहाने का पानी गरम कर रही हू..."
छुटकी आ के पैर छुएगी और कहेगी...भाई मेरे लिए क्या लाया...और मैं जैसे ही
उसके लिए लाया ---- कुर्ता,जीन्स दूँगा मेरे गले लग जाएगी......
पर नही.....सब आपने-2 घर है...यान्हा तो बस एक ख़ालीपन है........
पल भर को तो ऐसा लगता है...जैसे घर की दीवारे मेरी तरफ बढ़ रही है.....
जैसे मुझे दबा देना चाहती है.
समेट लेना चाहती हो अपने इतिहास मे....मैं डर सा जाता हू.....पर तभी ध्यान आता है...
इस गहर की 1-2 ईएंट...मेरे पापा की मेहनत का पसीना है...उनकी यादे है इसमे..कुछ नही है...
पापा ही बसे है जैसे...
सीडियो चढ़ता छत पर जाता हू..जान्हा बचपन मे स्केटिंग किया करता था.....
लग रहा था की ज़मीन पर लोट जाउ..सिने लग जाउ अपने घर के...
समा लूँ सब कुछ पुराना अपने रूह मे......
....कैसे भी पुराने दिन आ जाए.....
माँ मुझे खाना खाने को पुकारे..."बेटा नीचे आजा, खाना बन गया है"
और फिर दीदी को बोले "जा पकड़ के ला तेरे भाई को....."
पर उपर के कमरे की चाभी नही......
नीचे आता हूँ...और नये कमरे(इसका ना हम तीनो भाई बहन ने रखा था जो बाद मे नया बना था)..
जान्हा हम 3नो भाई बहन सोया करते थे......रतजगा करते थे....बदमाशयिओ की प्लानिंग प्लॉटिंग करते थे..
जान्हा छोटे से जोक पर हम इतना हंसा करते थे......की माँ की नींद उचट जाती और हम सब पर चिल्लाति..
सोते हो तुम तीनो की आउँ मैं...ये शब्द कानो मे गूँज रहे हैं.....
हल्का अंधेरा है यान्हा..सीलन की गंध है और....कुछ बॉटले फीकी है...शायद कच्चे शराब की है....
मितलि सी आती है....ऐसा नही की मैं पीता नही..1-2 बार देसी भी पी है..
ना जाने क्यों फिर भी....इस घर मे ऐसी बोतल आएगी कभी ना सोनचा था.....
पूरा खाली घर...कोई समान नही....कानो मे सन्न्न...कुछ आवाज़ आ रही है......
लंबी दूरी से थकान सी है......सोने को जी कर रहा है.....
नहाने के लिए टॉवेल निकलता हूँ. बाथरूम का फर्श टूटा हुआ है.....
शावर मे जंग लग गया है......पर पानी आ रहा है....नहा के..पूजा कमरे की बदता हू तो कदम
ठिठक से जाए है...माँ-पापा के जाने के बाद...भगवान ने भी अपने कमरा छोड़ दिया है....
पर कुछ निशान है अब भी..दीवार पर सिंदूर लगा है...उसी सिंदूर को भगवान मान के पूजा करता हू....
फिर सामने कमरे की दरी पर चादर बिछाकर....धोती....जो पापा ने मुझे 15 साल पहले आते हुए दी थी..
ओढ़ कर सो जाता हू.....
करीब शाम के 5 बजे आँख खुली.....ठंड का दिन है..सूरज डूब सा गया है...
इन 15 सालो मे पहली बार सुकून की नींद....सोया तो ऐसा महशुस हो रहा था...
की जैसे माँ की लोरिया कानो मे गूँज रही है....
आख़िर अपना घर अपना ही होता है...
जारी............
1 No.
ReplyDeleteSuperrrrrrrrrrrrrrrrrrrr
kitna sochte hai bhaiya jo itni marmik story ready kar lete hai.
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