मोनू शुक्ला अब पूरे १४ साल के हो चुके थे। ... पर जितनी तेजी से उनकी उम्र बढ़ रही थी, उससे कहीं ज़्यादा तेज़ी से बड़े शुक्ला जी के बाल कम हो रहे थे — और ब्लड प्रेशर बढ़ता जा रहा था।
मोनू के जन्मदिन पर उसने अपनी मीठी बातों और मामा की चमचागिरी से एक सेकेंड हैंड स्कूटर जुगाड़ लिया।
साले साहब के प्यार मे और अपने घर मे शांति की चाहत ,दोनों को बचाने की मजबूरी में शुक्ला जी ने वो स्कूटर मौन स्वीकृति दे दी। ....देखने वाली बात ये थी की उस स्कूटर की नंबर प्लेट के आख़िरी तीन अंक थे — 420।मोनू की शरारतों को अब जैसे नंबर प्लेट से लाइसेंस मिल गया था। मोनू के शैतानी को पंख लग गये ....
थोड़े ही दिनो मे मोहल्ले वालों के दुपहिया मे रिजर्व लगने की गति में काफी तेजी आई थी..... किसी के टैंक से २००–३०० मि.ली. पेट्रोल गायब होने लगा था। मोहल्ले में खुसर-पुसर होने लगी... कोई तो है जो पेट्रोल की ‘रिज़र्व’ को भी बर्बाद कर रहा है!
एक दिन बड़े शुक्ला जी की अर्जेंट मीटिंग थी....सुबह ७ बजे ही हड़बड़ी मे मिश्रा जी नाश्ता वास्ता छोड़ ऑफीस के लिए अपने पुराने मोपेड पर निकल लिए....आधे रास्ते मे मे ही गाड़ी बंद....पेट्रोल वाला काँटा ज़ीरो को छू रहा था.... मिश्रा जी को क्लियर याद था — “ कल ही तो डलवाया था!”
.तो फिर क्या हुआ?
धीरे-धीरे शुक्ला जी को याद आने लगा — कई बार उन्होंने मोनू के हाथ में एक पतला पाइप देखा था। उस वक़्त कुछ खास ध्यान नहीं दिया था, लेकिन अब वो नज़ारा मानो किसी थ्रिलर फिल्म की तरह आँखों के सामने घूम गया।
पसीने से तर-बतर शुक्ला जी, पुराना मोपेड एक किलोमीटर तक पेट्रोल पंप तक खींचते हुए, रास्ते भर अपने समस्त पूर्वजों और भाग्य विधाता को याद करते रहे। गाड़ी तो खींच ही रहे थे, साथ में अपने धैर्य की भी अंतिम परीक्षा ले रहे थे।... ऑफिस पहुँचे तो हाल बेहाल — कपड़े सिकुड़े हुए, प्रेस का नामोनिशान नहीं, मीटिंग में देर से पहुँचे सो अलग। बड़े अफसरों की गहरी निगाहें जैसे उनके आत्मसम्मान को छलनी कर रही थीं।
..नाश्ता तो कर नहीं पाए थे.....पेट कुलबुला रहा था.... दिमाग थकावट और बेइज़्ज़ती से झल्लाया हुआ था..
मन ही मन भीष्म प्रतिज्ञा ली गई.. "आज मोनू का हिसाब होगा!" ...रास्ते भर मोनू की कंबल कुटाई के दिवा स्वप्न देखते हुए शुक्ला जी घर पहुंचे....घर के गेट तक पहुँचते ही, पूरे गुस्से के साथ दहाड़ उठे —"मोनूऊऊऊउ....!!!" लेकिन जवाब आया — "वो तो सुबह ही दोस्तों के साथ पिकनिक चला गया है..." ..बदला अधूरा था....रात के खाने और थकान ने नींद को दुगना कर दिया...मोनू के घर आने के पहले मिश्रजी खर्राटे लेने लगे
सुबह फ्रेश मन से मोनू की तबीयत से कुटाई का प्लान बना शुक्लाजी सो गये ...सुबह उठते ही ब्रश के पहले हाथो मे बाँस की बेंत थी ....और चल दिए मोनू को उठाने....पर पता चला मोनू सुबह कुछ जल्दी ही स्कूल निकल लिया....शुक्ला जी हाथ मल के रह गये.... कुटाई कार्यक्रम को शाम के लिए पोस्टपोन किया गया....
शाम को बड़े उम्मीदों के साथ शुक्ला जी घर लौटे...मन मे जोश था ...सीने मे गुस्सा और बाजुओं मे ताकत थी......मोनू शुक्ला की घर के अंदर से आती आवाज़ देख शुक्ला जी की बाँछे खिल गई.....
जैसे ही घर मे प्रवेश किए......सोफे में मोनू के साथ मामा मामी ..और नाना -नानी सब हलवा खा रहे थे.. शुक्ला जी को देखते ही मोनू की मम्मी ने मुस्कुरा कर उन्हें भी एक प्लेट हलवा थमा दी। ......
शुक्ला जी समझ गए — पूरी कायनात मोनू की सुरक्षा में तैनात है! मन मसोसकर एक कोना पकड़ लिया और हलवा चखने लगे...रेडियो पर बज रहा था:"क्या हुआ तेरा वादा... वो कसम, वो इरादा..."