Tuesday, July 22, 2025

मोनू शुक्ला-3

 मोनू शुक्ला अब पूरे १४ साल के हो चुके थे।   ...  पर जितनी तेजी से उनकी उम्र बढ़ रही थी, उससे कहीं ज़्यादा तेज़ी से बड़े शुक्ला जी के बाल कम हो रहे थे — और ब्लड प्रेशर बढ़ता जा रहा था। 


  मोनू के जन्मदिन पर उसने अपनी मीठी बातों और मामा की चमचागिरी से एक सेकेंड हैंड स्कूटर जुगाड़ लिया।  

 साले साहब के प्यार मे और अपने घर मे शांति की चाहत ,दोनों को बचाने की मजबूरी में शुक्ला जी ने वो स्कूटर मौन स्वीकृति दे दी।  ....देखने वाली बात ये थी की  उस स्कूटर की नंबर प्लेट के आख़िरी तीन अंक थे — 420।मोनू की शरारतों को अब जैसे नंबर प्लेट से लाइसेंस मिल गया था। मोनू  के शैतानी को पंख लग गये ....


थोड़े ही दिनो मे मोहल्ले वालों के दुपहिया मे रिजर्व लगने की गति में काफी तेजी आई थी..... किसी के टैंक से २००–३०० मि.ली. पेट्रोल गायब होने लगा था।   मोहल्ले में खुसर-पुसर होने लगी... कोई तो है जो पेट्रोल की ‘रिज़र्व’ को भी बर्बाद कर रहा है!


एक दिन बड़े शुक्ला जी की अर्जेंट मीटिंग थी....सुबह ७ बजे ही हड़बड़ी मे मिश्रा जी नाश्ता वास्ता छोड़ ऑफीस के लिए अपने पुराने मोपेड पर निकल लिए....आधे रास्ते मे मे ही गाड़ी बंद....पेट्रोल वाला काँटा ज़ीरो को छू रहा था.... मिश्रा जी को क्लियर याद था — “ कल ही तो डलवाया था!” 

.तो फिर क्या हुआ?


धीरे-धीरे शुक्ला जी को याद आने लगा — कई बार उन्होंने मोनू के हाथ में एक पतला पाइप देखा था। उस वक़्त कुछ खास ध्यान नहीं दिया था, लेकिन अब वो नज़ारा मानो किसी थ्रिलर फिल्म की तरह आँखों के सामने घूम गया।


पसीने से तर-बतर शुक्ला जी, पुराना मोपेड एक किलोमीटर तक पेट्रोल पंप तक खींचते हुए, रास्ते भर अपने समस्त पूर्वजों और भाग्य विधाता को याद करते रहे। गाड़ी तो खींच ही रहे थे, साथ में अपने धैर्य की भी अंतिम परीक्षा ले रहे थे।... ऑफिस पहुँचे तो हाल बेहाल — कपड़े सिकुड़े हुए, प्रेस का नामोनिशान नहीं, मीटिंग में देर से पहुँचे सो अलग। बड़े अफसरों की गहरी निगाहें जैसे उनके आत्मसम्मान को छलनी कर रही थीं। 


 ..नाश्ता तो कर नहीं पाए थे.....पेट कुलबुला रहा था.... दिमाग थकावट और बेइज़्ज़ती से झल्लाया हुआ   था..

  मन ही मन भीष्म प्रतिज्ञा ली गई.. "आज मोनू का हिसाब होगा!"  ...रास्ते भर मोनू की कंबल कुटाई  के दिवा स्वप्न देखते हुए शुक्ला जी घर पहुंचे....घर के गेट तक पहुँचते ही, पूरे गुस्से के साथ दहाड़ उठे —"मोनूऊऊऊउ....!!!"  लेकिन जवाब आया — "वो तो सुबह ही दोस्तों के साथ पिकनिक चला गया है..."  ..बदला अधूरा था....रात के खाने और थकान ने नींद को दुगना कर दिया...मोनू के घर आने के पहले मिश्रजी खर्राटे लेने लगे

सुबह फ्रेश मन से मोनू की तबीयत से कुटाई का प्लान बना शुक्लाजी सो गये ...सुबह उठते ही ब्रश के पहले हाथो मे  बाँस की बेंत थी  ....और चल दिए मोनू को उठाने....पर पता चला मोनू सुबह कुछ जल्दी ही स्कूल निकल लिया....शुक्ला जी हाथ मल के रह गये.... कुटाई कार्यक्रम को शाम के लिए पोस्टपोन किया गया....

शाम को  बड़े  उम्मीदों के साथ शुक्ला जी घर लौटे...मन मे जोश था ...सीने मे गुस्सा और बाजुओं मे ताकत थी......मोनू शुक्ला की घर के अंदर से आती आवाज़ देख शुक्ला जी की बाँछे खिल गई.....

जैसे ही घर मे प्रवेश किए......सोफे में मोनू के साथ मामा मामी ..और नाना -नानी सब हलवा खा रहे थे.. शुक्ला जी को देखते ही मोनू की मम्मी ने मुस्कुरा कर उन्हें भी एक प्लेट हलवा थमा दी। ......

शुक्ला  जी समझ गए — पूरी कायनात मोनू की सुरक्षा में तैनात है! मन मसोसकर एक कोना पकड़ लिया और हलवा चखने लगे...रेडियो पर बज रहा था:"क्या हुआ तेरा वादा... वो कसम, वो इरादा..."

मोनू शुक्ला -2

 जैसे-जैसे मोनू शुक्ला बड़े हो रहे थे, उनके भीतर एक बात बिल्कुल स्पष्ट होती जा रही थी —

"इन लक्षणों के साथ तो जल्दी ही अपने पैरों पर खड़ा होना पड़ेगा!" 

 ..अब बात ये थी कि उम्र केवल 12 साल थी —न कोई नौकरी देता, न ही पैसे कमाने का कोई और तरीका मालूम था..

 घर से पैसा चुराना – वो तो मोनू शुक्ला के "अवधूत सिद्धांतों" के खिलाफ था।पर जेब खर्च चाहिए था, और कल से ही चाहिए था।

..तो मोनू ने सोचा कि सीधा रास्ता अपनाया जाए –पापा के सामने खड़े होकर बोले:"पापा, हर महीने कुछ जेब खर्च चाहिए।

अब 80-90 के दशक के हर क्लासिक पापा की तरह, शुक्ला जी ने भी जवाब में एक पूरा आर्थिक भाषण दे डाला...घर के खर्चे..बच्चों को पालने के खर्चे..और महंगाई मे परिवार को इतने कम वेतन मे चलाने का भाषण ...जैसे जैसे भाषण अपने अंत की ओर चला..मोनू शुक्ला उदास होते चले गये

इस तरह किला फतह करने के बाद शुक्ला जी मन ही मन अपने आप को दाद दे रहे थे.... लेकिन वो भूल गए थे कि उन्होंने मोनू शुक्ला को जन्म दिया है –  ....

  सिर्फ एक हफ़्ते बाद – राम जाने कौन से गुप्त स्रोतों से –मोनू अपने पापा की सैलरी का एकदम सटीक आंकड़ा निकाल लाया।  

  शुक्ला जी सकते में आ गए... खून तो खौला नहीं, पर दिल ज़रूर काँप गया।

"ऐसी दिलेरी? ऐसा दुस्साहस?   खैर मोनू शुक्ला जीत गये...

मौन रूप से २० रुपय महीना मोनू शुक्ला का जेबखर्च तय हुआ.......

कुछ दिनो तक तो ये २० रुपय मोनू को ठीक लगे पर जैसा की मैने बताया  बालक का मन बढ़ रहा था.....

एक शाम दरवाज़े की घंटी बजी।

शुक्ला जी ने द्वार खोला, आगंतुकों को नमस्कार किया और आने का कारण पूछा।उत्तर मिला:"हमारी मोनू जी से मुलाकात हुई थी... वो पूछ रहे थे कि घर का रेट क्या होगा?"यह सुनकर शुक्ला जी कुछ क्षणों तक जड़वत खड़े रहे।

फिर दोनों को विदा किया।दरवाज़ा बंद कर गला साफ़ किया और पूरे मोहल्ले में गूंजती आवाज़ में पुकारा:"मोऽऽऽनूऽऽऽ... ओ मोनूऽऽऽ!"मोनू शुक्ला १४ के हो गये थे..

मोनू शुक्ला - 1

 सन १९८१..... जुलाई का महीना था...अंतरिक्ष में ग्रह नक्षत्र की चाल मे भारी परिवर्तन हो रहा था..... काली रात थी..भयंकर बारिश और आंधी हो रही थी.....लोगों मे घबराहट थी....आम जनता परेशान थी..सब को लग रहा था की कुछ तो बड़ा होने वाला है....और हुआ भी...जी हाँ...इंदौर के एक कोने में  शुक्ला परिवार मे प्रकट हुए...मोनू शुक्ला...

पिताजी शिक्षा विभाग मे अधिकारी...एकदम सरल सहज ....माताजी सुघड़ गृहणी.....

जैसे जैसे मोनू शुक्ला  बड़े हो रहे थे उनका बाल्य काल का उत्पात देख लोग समझ नहीं पा रहे थे की इतने सरल परिवार में ये एक  असुर कैसे भया...बहूत दिनो बाद कोई पुराने रिश्तेदार आए घर और बोले तो कमल कांत शुक्ला की कॉपी है...तब पता चला की भैया मोनू शुक्ला अपने दादाजी पर गये थे....उनकी कहानी फिर कभी...

दिन कट रहे थे ....मोहल्ले वाले मोनू शुक्ला को बड़ा होते देख रहे थे... शुक्लाजी के घर के बगल में गुप्ता परिवार था...सबसे बड़े गुप्ता जी ७० साल के रिटायर्ड बैंकर थे....मोहल्ले के बच्चों के बड़े दुश्मन.....मोनू और टीम जब भी गली क्रिकेट खेलती और ग़लती से बॉल गुप्तजी के द्वार पर आई तो उसका शहीद होना पक्का था...बड़े गुप्ता  का यही एक मात्र दिन भर का टाइम पास था....

मोनू शुक्ला बहुत समय से  गुप्ता जी से खार खाए बैठे थे...उमर ९-१० साल थी..शरीर कमजोर था....पर बदला तो बदला होवे है..

मोनू ने अपने बीते 2-3 सालों की गाढ़ी कमाई — कुल जमा 40-50 रुपये — एक ही रात में होम कर दी। ये पैसे कई नेक कामों में लग सकते थे... जैसे कैंडी, कॉमिक्स, या माचिस से पटाखा उड़ाना।

पर नहीं — मोनू ने चुना एक उच्च उद्देश्य।

रात करीब 9 बजे, मोहल्ले से गुजरते बैंड वालों को रोककर, अपनी पूरी पूंजी उनके हवाले कर दी — बस एक ही दरख्वास्त  के साथ:

"रघुपति राघव राजा राम" की धुन १० -१५ मिनट नॉन स्टॉप गुप्ता जी के घर के सामने जमकर बजाना है!’"

...मोहल्ले वालों को लगा गुप्ता जी अल्लाह को प्यारे हो गये.....कुछ अति संवेदनशील महिलाओं ने रोने का कार्यक्रम चालू कर दिया.....मोहल्ले वाले बड़े गुप्ता के घर के सामने सफेद कपड़े मे जमा ही हो रहे थे की अपने बैंक मे कस्टमरों को देते हुए सीखी सारी गलियों का बैंड वालो  पर प्रयोग करते हुए गुप्ता जी गुस्से मे काँपते दिखे....बैंड वाले फुर्र हो गये....

मोहल्ले वाले दुखी हो लौट गये...वो सब दुखी गुप्ताजी के जिंदा रह जाने से थे या फिर पूरी-बूँदी ना मिल पाने के कारण....ये राम ही जाने...

खैर बात तो खुलनी थी और खुली भी....मोनू शुक्ला के बदमाशी का ये नया स्तर था.....मोनू शुक्ला के सरल पापा अपने भविष्य की चिंता मे थे...

मोनू शुक्ला का जवान हो रहे थे.....