सन १९८१..... जुलाई का महीना था...अंतरिक्ष में ग्रह नक्षत्र की चाल मे भारी परिवर्तन हो रहा था..... काली रात थी..भयंकर बारिश और आंधी हो रही थी.....लोगों मे घबराहट थी....आम जनता परेशान थी..सब को लग रहा था की कुछ तो बड़ा होने वाला है....और हुआ भी...जी हाँ...इंदौर के एक कोने में शुक्ला परिवार मे प्रकट हुए...मोनू शुक्ला...
पिताजी शिक्षा विभाग मे अधिकारी...एकदम सरल सहज ....माताजी सुघड़ गृहणी.....
जैसे जैसे मोनू शुक्ला बड़े हो रहे थे उनका बाल्य काल का उत्पात देख लोग समझ नहीं पा रहे थे की इतने सरल परिवार में ये एक असुर कैसे भया...बहूत दिनो बाद कोई पुराने रिश्तेदार आए घर और बोले तो कमल कांत शुक्ला की कॉपी है...तब पता चला की भैया मोनू शुक्ला अपने दादाजी पर गये थे....उनकी कहानी फिर कभी...
दिन कट रहे थे ....मोहल्ले वाले मोनू शुक्ला को बड़ा होते देख रहे थे... शुक्लाजी के घर के बगल में गुप्ता परिवार था...सबसे बड़े गुप्ता जी ७० साल के रिटायर्ड बैंकर थे....मोहल्ले के बच्चों के बड़े दुश्मन.....मोनू और टीम जब भी गली क्रिकेट खेलती और ग़लती से बॉल गुप्तजी के द्वार पर आई तो उसका शहीद होना पक्का था...बड़े गुप्ता का यही एक मात्र दिन भर का टाइम पास था....
मोनू शुक्ला बहुत समय से गुप्ता जी से खार खाए बैठे थे...उमर ९-१० साल थी..शरीर कमजोर था....पर बदला तो बदला होवे है..
मोनू ने अपने बीते 2-3 सालों की गाढ़ी कमाई — कुल जमा 40-50 रुपये — एक ही रात में होम कर दी। ये पैसे कई नेक कामों में लग सकते थे... जैसे कैंडी, कॉमिक्स, या माचिस से पटाखा उड़ाना।
पर नहीं — मोनू ने चुना एक उच्च उद्देश्य।
रात करीब 9 बजे, मोहल्ले से गुजरते बैंड वालों को रोककर, अपनी पूरी पूंजी उनके हवाले कर दी — बस एक ही दरख्वास्त के साथ:
"रघुपति राघव राजा राम" की धुन १० -१५ मिनट नॉन स्टॉप गुप्ता जी के घर के सामने जमकर बजाना है!’"
...मोहल्ले वालों को लगा गुप्ता जी अल्लाह को प्यारे हो गये.....कुछ अति संवेदनशील महिलाओं ने रोने का कार्यक्रम चालू कर दिया.....मोहल्ले वाले बड़े गुप्ता के घर के सामने सफेद कपड़े मे जमा ही हो रहे थे की अपने बैंक मे कस्टमरों को देते हुए सीखी सारी गलियों का बैंड वालो पर प्रयोग करते हुए गुप्ता जी गुस्से मे काँपते दिखे....बैंड वाले फुर्र हो गये....
मोहल्ले वाले दुखी हो लौट गये...वो सब दुखी गुप्ताजी के जिंदा रह जाने से थे या फिर पूरी-बूँदी ना मिल पाने के कारण....ये राम ही जाने...
खैर बात तो खुलनी थी और खुली भी....मोनू शुक्ला के बदमाशी का ये नया स्तर था.....मोनू शुक्ला के सरल पापा अपने भविष्य की चिंता मे थे...
मोनू शुक्ला का जवान हो रहे थे.....
Bahot hi badhiya! - Megha
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