Tuesday, July 22, 2025

मोनू शुक्ला -2

 जैसे-जैसे मोनू शुक्ला बड़े हो रहे थे, उनके भीतर एक बात बिल्कुल स्पष्ट होती जा रही थी —

"इन लक्षणों के साथ तो जल्दी ही अपने पैरों पर खड़ा होना पड़ेगा!" 

 ..अब बात ये थी कि उम्र केवल 12 साल थी —न कोई नौकरी देता, न ही पैसे कमाने का कोई और तरीका मालूम था..

 घर से पैसा चुराना – वो तो मोनू शुक्ला के "अवधूत सिद्धांतों" के खिलाफ था।पर जेब खर्च चाहिए था, और कल से ही चाहिए था।

..तो मोनू ने सोचा कि सीधा रास्ता अपनाया जाए –पापा के सामने खड़े होकर बोले:"पापा, हर महीने कुछ जेब खर्च चाहिए।

अब 80-90 के दशक के हर क्लासिक पापा की तरह, शुक्ला जी ने भी जवाब में एक पूरा आर्थिक भाषण दे डाला...घर के खर्चे..बच्चों को पालने के खर्चे..और महंगाई मे परिवार को इतने कम वेतन मे चलाने का भाषण ...जैसे जैसे भाषण अपने अंत की ओर चला..मोनू शुक्ला उदास होते चले गये

इस तरह किला फतह करने के बाद शुक्ला जी मन ही मन अपने आप को दाद दे रहे थे.... लेकिन वो भूल गए थे कि उन्होंने मोनू शुक्ला को जन्म दिया है –  ....

  सिर्फ एक हफ़्ते बाद – राम जाने कौन से गुप्त स्रोतों से –मोनू अपने पापा की सैलरी का एकदम सटीक आंकड़ा निकाल लाया।  

  शुक्ला जी सकते में आ गए... खून तो खौला नहीं, पर दिल ज़रूर काँप गया।

"ऐसी दिलेरी? ऐसा दुस्साहस?   खैर मोनू शुक्ला जीत गये...

मौन रूप से २० रुपय महीना मोनू शुक्ला का जेबखर्च तय हुआ.......

कुछ दिनो तक तो ये २० रुपय मोनू को ठीक लगे पर जैसा की मैने बताया  बालक का मन बढ़ रहा था.....

एक शाम दरवाज़े की घंटी बजी।

शुक्ला जी ने द्वार खोला, आगंतुकों को नमस्कार किया और आने का कारण पूछा।उत्तर मिला:"हमारी मोनू जी से मुलाकात हुई थी... वो पूछ रहे थे कि घर का रेट क्या होगा?"यह सुनकर शुक्ला जी कुछ क्षणों तक जड़वत खड़े रहे।

फिर दोनों को विदा किया।दरवाज़ा बंद कर गला साफ़ किया और पूरे मोहल्ले में गूंजती आवाज़ में पुकारा:"मोऽऽऽनूऽऽऽ... ओ मोनूऽऽऽ!"मोनू शुक्ला १४ के हो गये थे..

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