Sunday, April 7, 2024

अब वैसी शाम नही होती

अब शाम नही होती...या ऐसे कहें को वैसी शाम  नही होती जैसा की ८०-९० के दशक मे हुआ करती थी...पता  नही ये मेरा भ्रम है की सत्य  सुर्यदेव ता पटल से कुछ धीरे धीरे अस्त होते थे उस समय...और होती थी एक लंबी शाम बच्चो को देर तक खेलने को....मम्मियों और पड़ोस की आंटी की गपशप के लिए..

मुझे ये भी लगता है की तब की शामें कुछ शांत हुआ करती थी .. आप अपने घरौंदों को लौटे पक्षियों का कलरव  सुन सकते थे  ...मोटर गाड़ी की आवाज़ तो गाहे बगाहे ही आती थी....ये शाम ४:०० से ७:०० बजे तक की ही थी...पर काफ़ी लंबी लगा करती  पूरे दिन का सबसे अच्छा समय सबके लिए..

 हर शाम खूबसूरत होती...हमारे मोहल्ले में सब बच्चे मिले के खेला करते...छुपम छुपाई ,बुढ़िया छू और परी-पत्थर ,ऐसे बहूत सारे खेल और भी थे जैसे खो खो, जैसे आमदण्डा....कोई हारता कोई जीत जाता, कोई रूठ जाता तो कोई दाम देके थकने के बाद रोते रोते घर जाता ..सबका एक अलग मज़ा था

ये उस समय की बात है जब  केवल दूरदर्शन हुआ करता था...रंगोली चित्रहार और रंगो के रविवार का..तब आप  हर हफ्ते एक मूवी देखते थे एक लंबे ब्रेक के साथ ...

सारी शामें अलग .... और कभी कभी आती थी एक शाम ..जब पापा घर जल्दी आ जाते...एक शाम जिसका मुझे इंतज़ार होता ...

कभी मैं ..और साथ में कभी मेरा कोई दोस्त लकी रहा तो वो..हम जाते एक लॉन्ग वॉक पर..शहर के बाहर...छोटे मोटे कस्बों को पार करते हुए...
हम पहुंच जाते एक अलग देश...जान्हा दूर दूर तक घर  ना होता...केवल मैदान.. लंबे लंबे घास के मैदान...
और उनके बीच से बहती एक पानी की धारा....जो कन्हि नाले का ..कन्हि नदी का और कन्हि बड़े तालाब का रूप ले लेती....
कई बड़े बड़े चट्टानों के पीछे उछल कूद करती ये बेनामी पानी की धारा.. एकदम छुपी हुई थी....जो आपको तब दिखाई देती जब आप उसके बिल्कुल करीब  पहुंच जाते....हो सकता है मुझे ही उसका लोकल नाम ना पता हो...या उसका कोई नाम ही ना हो ....पर मैंने उसका नया नामकरण किया था  अपने दोस्तों के बीच..."गुप्त नाला" क्योंकि वो एक छिपी हुई धारा थी....

जब भी एक नई शाम मेरा कोई दोस्त हमें जॉइन करता ..मैं उसे उस नाले को दिखाने को काफी उत्सुक होता....किनारे बैठ कर पानी मे पैर डालना....छोटी छोटी मछलियां केकड़े...मेंढक और दूसरे किडो मकोडो को ताकना...एक अलग मज़ा था...

सूरज अपने अवसान की तैयारी कर रहा होता ..और हम दोस्त घास के मैदान मे दौड़ रहे होते....एक बड़े पत्थर पर खड़ा होकर  पानी को छोटे छोटे पत्थरों से टकराते और आगे बढ़ते देखना मुझे तब भी अच्छा लगता था और आज भी..

रास्ते मे पापा  कभी महाभारत की कहानियाँ  सुनाते ...तो कभी कोई पौराणिक कहानी..मुझे अर्जुन,कर्ण,अभिमन्यु  सबके सबके साकार दिखते..
चक्रव्यूह में घिरा वीर अभिमन्यु....अर्जुन के  गांडीव से निकलते तीर..कृष्ण के उंगली मे सुदर्शन....अंगुलिमाल ..अहिल्या....सब के सब साकार दिखते
एकदम ध्यान से कहानियों को सुनते ..उनसे कई सारे प्रश्न करते..उनके उत्तर समझते ..साथ मे शीतल ताजी हवा के झोंके से गले मिलते..हम चलते रहते..घर से निकल कर घर की ओर

जैसे  जैसे सूरज क्षितिज की और प्रस्थान करता हम भी अपने घर की और प्रस्थान करते.. आते आते रास्ते मे आता एक छोटी सी मिठाई की दुकान..जिसमे गिन चुन के आप को मिठाई दिखती....कढ़ाई में गाढ़े होते दूध ..और रंग बदल कर कलाकंद का रूप लेते हुए देखने से उसे
खाने का मज़ा दुगना हो जाता...ज्यादा नही १-२ पीस ही हमें मिला करता ..पर वैसा टेस्ट आज भी किसी मिठाई का नही...पता नही  कलाकंद   का वो टेस्ट कन्हि गुम सा हो गया है....रात ढलने से पहले हम घर पर आ जाते.....जान्हा  सिगड़ी पर बनी सब्जी दाल और गरमागरम माँ के हाथों फुल्के हमरा इंतजार करते......


हैं मेरे पास कुछ पैसे
कोई है जो
मेरे लिए
टाइम मशीन
बना दे
एक

मै फिर से
पापा के कंधों पर
चढ़ जाऊंगा
उंगली थामे
फिर वही
जगह
घूम आउन्गा
और लाऊंगा
 बहुत सी यादें
कहानी
और उस वक्त का टुकड़ा
जिसे
आज के लोग
ना देख पाएंगे
ना समझ पाएंगे

Monday, November 20, 2023

मेरे पुरन मासी का चाँद

 शैम्पू से नहाई
रविवार की
अलसही सुबह सी
कुछ धुली
कुछ उजली
अनसुलझे खुले
बाल
 काजल की
आँखों  पर
हल्की सी रेखा
और तुम हो गई
पुरन मासी का चाँद

 थका सा वक्त
और थका मन
पर तुम्हारी
हल्की सी मुस्कान
फिर
जैसे पौ फटने
पर हो जाती है
एक सुंदर सुबह
बस वैसा ही कर देती हो
सुंदर
तनमन
जीवन

मेरे कई सारे
सुने अनसुने
कहावतों कविताओं की
जिंदा सी तस्वीर हो
 तुम
या फिर
 ऐसे कहूँ क्या
तुम हो एक साकार रूप
सीप मे छिपी मोती का
फूल मे चमकते ओस का
प्रभात की हो लालिमा
शरद पूर्णिमा वाले चाँद
छिटकी चाँदनी
या कह दूं तुम्हें
बरसात की
मेरी पसंदीदा फुहार


जैसे हर पल हर क्षण
बढ़ती है उम्र चुपचाप
वैसे ही
बढ़ रहा है प्रेम
मेरा मेरे
मूक मौन
आप  

फिर से यही कहूँगा
जैसे राम की सीता
बस वैसे
मेरी अमृता

Monday, October 30, 2023

मेरे पापा का गाँव - पार्ट-१

ये हमारे होश सम्हालने के बाद बिहार और अपने पापा के गाँव जाने की पहली यात्रा थी ..उस जगह की जहाँ मेरे पापा ने अपना बचपन बिताया.. हम ३ भाई बहन अपनी किशोरा अवस्था में थे...और उनके बचपन से कई  किस्से-कहानियाँ सुनी थी... कैसे एक बड़े तालाब मे पापा तैराकरते....वो गन्ने के खेत  जहाँ से कोई भी कितने भी गन्ने तोड़ के खा सकता था.......खेतों के पास गन्ने से बनते गुड और सिरे..मिठाई...वो तालाब जिसके सामने ही माँ भवानी का मंदिर था....कैसे गाँव फागुन का रंग होता..होली  ३ दिन तक खेली जाती...एक गाँव से दूसरे गाँव लोगों  में होली का हुड़दंग होता...... कैसे लोग  ज़बरदस्ती भांग वाली मिठाई खिलाते..पापा और  उनके बचपन के दोस्तो के किस्से...वो नहर जिसे पर करके बाढ़ के समय स्कूल जाना होता था... चने बूट से भरे खेत....वो पेड़..वो गिल्ली डंडा का खेल...वो हॉकी..वो आम का बागान..पेड़ो पर  चढ़ना..और कई तरह के गाँव के खेल....एक बड़ा ही  आकर्सन  था हमे....मुझे तो अपने पापा छोटे से ये सारे काम करते दिखते थे....सारे क़िस्सो के दौरान मै उनके बालक रूप को सोंच सोंच के मन मे बड़ा हंसता और खुश होता...

इन सबका एक खाका सा मन मे बन गया था...कल्पनाओ में हम सबने तालाब ..भवानी मंदिर...नहर ...जामुन का पेड़..खेत खलिहान सब देखा था..

इन सबको साकार देखने बड़े उत्साह के साथ हम बस में जा रहे थे....पूरे २४ घंटे की जर्नी थी..रोमांचक....बिहार की सीमा में हम रात को पंहुचे...जो की नक्सल प्रभावित था...और ठीक कुछ दूरी पर हमारी बस खराब हो गई..उस समय बिहार अपने जंगल राज से बदनाम था.. बस हमारी खराब हुई एकदम जंगल  वाले इलाक़े में  और वो भी काली रात. में..हर तरफ अंधेरा...सभी के मन में डर ...लोग आते हुए  ट्रक रुकवा के लिफ्ट ले रहे थे...हम सब भी बस से अपना समान  नीचे ला कर  किसी नेक ट्रक वाले का इंतज़ार करने लगे...चारो तरफ  केवल सुनेपन की आवाज थी..घोर अंधकार ...रोड के उस पर मैने पहली बार इतने सारे जुगनुओ को एक साथ चमकते देखा.....दूर दूर तक सन्नाटा था...रोड पर आते केवल इक्के दुक्के  ट्रक इन सन्नाटो को चीर रहे थे...सबकी जान सांसत मे थी .  पर होइहि सोइ जो राम रचि राखा जपते हुए सब शांत दिखने की कोशिश कर रहे थे...कुछ ही देर मे एक भले से ट्रक ड्राइवर ने हमे लिफ्ट दिया..और हम पंहुच गये ...डेहरी ऑन सोन रेलवे स्टेशन....जहाँ से आगे की यात्रा ट्रेन से होने वाली थी..

ये ९० का दशक था..जब आप अपने  यात्रा के दौरान ..खाने पीने का पूरा सामान साथ ले के चलते थे....पूरी भूनजिया और ठेकुआ....ये ३नो का भरपूर स्टॉक था. और हाथ मे ठेकुआ  लेकर मै रेलवे स्टेशन की न्यारी दुनिया देखने लगा... ..कई सारी रेहाड़िया...छोटे खोमचे...प्लॅटफॉर्म पर अपनी चादर बिछा कर सुस्ताते लोग...ट्रेनो की सिटी और वो अनाउन्स्मेंट ..ट्रेनो की आवाजाही ...हमारी ट्रेन लेट थी..हम सभी प्लॅटफॉर्म पर बेडशीट बिछा कर बैठ गये और पूरी भूनजिया का भोग चालू हुआ......पापा कुछ समान लाने बाहर जा रहे थे साथ मे मै भी हो लिया....ज़्यादा कुछ याद नही पर होटेल वाले लीटी चोखा से मेरा पहला एनकाउंटर था शायद वो ....छोटे से रोड साइड होट्ल में  लिट्टी चोखा प्याज़ चटनी...एक अलग ही स्वाद और फीलिंग ...

ट्रेन से पटना पंहुचे...मामा आगये थे माँ को ननिहाल ले जाने..और आगे की हमारी  यात्रा में बस पापा और हम ३ भाई बहन ही थे..और ये हमारे लिए  और भी मज़े की बात थी...क्यूंकी पापा से हमे  डाट ना के बराबर मिलता था तो पिटाई का कोई ख़ौफ़ ही नही था...खैर ऐसे वैसे कैसे कैसे...हम पंहुच गये ...मेरे पापा के गाँव  आमसरी..सुबह के ५ बजे का समय था.....बस रुकी..हम समान के साथ उतरे..और बस ने हमे हॉर्न के साथ विदा किया.... रोड  पर थे बस पापा  ,दोनो बहन ,मैं और समान....चोरो तरफ और कोई  भी नही... सुबह की शीतल हवा...और सामने थी हमारी कल्पना की उड़ान और उनकी सच्ची तस्वीरें....नहर ..और उस पर बना पुल और खेतो को शृंखला.... जब भी पापा अपना गाँव याद  करते ये दोनो को जिक्र ज़रूर होता....हम सबने अपना समान उठाया..और चल दिए गाँव की ओर..

साथ चल रही पापा के पहचान की हवा..सड़क....मैं पापा की फीलिंग्स को समझ पा रहा था शायद...भोर होने का आरंभ हो चुका था....
आसमान मे लालिमा आने लगी थी....और थोड़े ही देर मे खेतों ,तालाबों ,झाड़ी को पार करते हुए गाँव के घर आने लगे थे.....हम ३नो भाई बहनों ने जो कल्पना की थी उससे काफ़ी अलग था सब....



Friday, June 30, 2023

मेरे पापा बेसटेस्ट

 बात कुछ पुरानी है.. ना ही कथा है ना ही कहानी है....और डरने की बात नहीं ये कविता भी नहीं है...मैं ये अपने लिए लिख रहा  हूँ ताकि वो बिता हुआ पल फिर से जी सकूँ...और आप अगर इसे पढ़  कर मेरे साथ उस पल को जिएं  तो मुझे कोई एतराज भी नहीं है
 

तो बात तब की है जब मैं एक छोटा सा ..होनहार...और अपने पापा का  आग्याकारी बेटा था....कुल जमा सातवीं क्लास मे था...ना ही पूरा किशोर ..और ना ही छोटा बालक....वो नब्बे के दशक का समय था...पापा के पास सेकंड हैंड राजदूत आई.. कुछ समय बाद पापा ने जब महसूस किया की हाथ थोड़ा साफ हो गया है, तो उन्होने एक लॉन्ग राइड का प्लान किया...वैसे वो समय लॉन्ग राइड का नहीं था...आपको कुछ काम निकालना पड़ता था..

हमारा एक छोटा सा हिन्दी मीडियम स्कूल था जिसके कर्ता धर्ता पापा ही थे...कर्ता धर्ता मतलब -प्रिंसिपल, टीचर,-स्टेनो जो भी हो सब का काम वो खुद ही किया करते थे...उस समय शिक्षा विभाग हमारे शहर से कुछ ६० कि.मी. दूर एक दूसरे जिले मे था..पापा ने प्लान बनाया वहां जाने का ..और साथ में मुझे भी ले जाने का ..

 

खैर अगले दिन सुबह हम दोनो निकल गये ...पापा के पेट पर अपने छोटे से हाथ का सुरक्षा घेरा डाले पीछे बैठा मैं दाँये बाँये सिर घुमाता जीवन के इस समय का आनंद ले रहा था....और थोड़े ही देर में हम अपने शहर को छोड कर बाहर निकल लिए...रोड के दोनो तरफ हरे हरे खेत ...गाँव..पेड़..ठंडी हवा...कच्चे पक्के मकान..नाले..तालाब...वो हर चीज़ जो  आँखों  को आकर्षित करती है..

 

पापा रास्ते में पड़ते पेड़ ..फूल ...गाँव .नहर ...रबी की फसल..खरीफ की फसल  सबके बारे मे बताते हुए चल रहे थे...राजदूत की फटफट में मैं आधी बात ही सुन पा रहा था.. मुझे हल्की हल्की भूख लग रही थी...मैने पापा को बोला की भूख लगी है....और पापा समझ गये एक छोटे बच्चे को बाहर निकलने पर जो भूख लगती है, वो घर से लाए रोटी सब्जी से नही भरती.... पापा बोले ..थोड़ी देर में रुकते हैं कन्हि....और करीब ५ कि.मी. चलने पर एक छोटी सी टपरी रोड साइड पर थी..बाहर २ बड़े बड़े गंज रखे थे..एक घड़ा था और साथ में कांच के बड़े से जार में समोसे रखे थे....

 

रोड के इस पार ये तपरी जैसा ढाबा ..और उस पार बह रही थी नहर...सूरज सर पर आने वाला था..पापा ने पूछा क्या है आपके पास बच्चे के लिए....समोसा तो दिख ही रहा था तो उत्तर में दुकानदार ने दोनो गंज के ढक्कन खोल दिए,...एक मे गरमा गरम हरी पीली मटर की चाट थी और दूसरे में  गरम गुलाबजामुन...पापा ने मेरी तरफ देखा ..और मैने बिना समय गंवाए मटर की तरफ ..पापा ने एक प्लेट मटर का ऑर्डर कर दिया..थोड़े ही  ही देर में मेरे हाथ में एक स्टील के पतली सी प्लेट में थी हरी पीली गरमा गरम मटर की पानी वाली चाट....सच कहूँ तो ऐसा टेस्ट कभी भुला नही जा सकता...लाल कलर के प्लास्टिक की कुर्सी....अच्छी ख़ासी धूप...और साथ मे गरम तीखी पानी वाली  चाट ..उस उम्र मे और उस दौर मे इससे ज़्यादा मैं शायद भगवन् से और कुछ मांग भी नहीं सकता था....पर ऐसा सच में नहीं था..कोने में जमीन मे एक गोल्ड स्पॉट(उस समय की एक कोल्ड ड्रिंक) का एक कैरेट बार बार मुझे अपनी और देखने पर मजबूर कर रहा था....हाफ प्लेट चाट खाने के बाद अब मेरा आधा ध्यान चाट पर और आधा ध्यान गोल्ड स्पॉट पर ....ऐसा नही था की मैं अपने पापा से डरता था..और मैं एक गोल्ड स्पॉट लेने नहीं बोल सकता था...शायद ये उस दशक के बच्चों मे एक शर्म थी...या यूँ कहे अनुशासन था..एक झिझक थी.....मैने चाट ख़तम की....पापा से नज़रेचुरा कर ..ठंडी आह के साथ गोल्ड स्पॉट को भरपूर नज़रों से देखा....और वापस जर्नी स्टार्ट करने के लिए रेडी सा हो गया....मैने पापा को बोला चलें अब...पापा मुस्कुरा कर बोले हां  चलते हैं......और फिर दुकानदार को पैसे देते हुए बोले ..ये एक गोल्ड स्पॉट की बोतल भी जोड़ लेना...

 

वो कहते हैं ना..माइ पापा इस बेस्ट...बस मैं जोड़ से वोही चिल्लाना चाहता था....पर मुँह मे फँसी गोल्ड स्पोर्ट बोतल की गर्दन ने ऐसा होने नहीं दिया ...और २-३ सांस में मैंने पूरी बोतल पेट मे उडेल ली....पापा मुझे खड़े मुस्कुराते देखते रहे...ऐसी मुस्कान या तो आप छोटे से बच्चों मे या फिर पोपले मुँह वाले बूढ़ो मे ही देख पाएंगे ..प्योर..निर्मल..सरल...सुंदर..

 

और फिर २-३ किक और पापा की राजदूत फिर स्टार्ट...पेट भर गया था...मन तृप्त था और मैं आसपास की छोड़ इस सोंच मे डूबा था की जेब में पैसे होने पर भी पापा चाट पकौड़ी या पानीपुरी क्यों नही खाते...जैसे आज भी नहीं खाए...और किसी मेले मे भी नही खाते..उल्टे अपने हिस्से की मिठाई हमको बाँट देते हैं....मेरे लिए दुनिया का सबसे बड़ा आश्चर्य था ये...कोई कैसे अपने हिस्से का कलाकंद किसी और को दे सकता है...जब भी वो ऐसा करते तो मैं उनसे कलाकंद ले के  चुपचाप उनको ताकते हुए बस यही दुविधा में रहता था....

 

खैर कई सारे खेत, कुँए, ६० कि.मी. लंबी सड़क को क्रॉस कर हम पहुंचे शिक्षा विभाग....काम बड़ा नहीं था ..हम पहुंचे दुबे जी के पास..उनके कक्ष में...पापा ने उन्हे किया नमस्कार और उनको देख मैने भी हाथ जोड़ दिए..दुबे जी ने १० इंच के स्माइल के साथ पापा को नमस्कार किया और मुझे देख के बोले वाह पाठकजी लड़का तो होनहार है आपका...बस यही से वो मैने होनहार का तमगा लिया जो आपने इस प्रसंग के शुरुआत मे पढ़ा था... दुबे जी ने अपने सहायक को बोला पाठक जी के लिए चाय और बच्चे के लिए रसगुल्ला ले आओ...पापा ने हाथ जोड़ के बोला अरे नहीं दुबे जी...चाय तो रास्ते में ही हो गई..अभी थोड़ी देर पहले....ये फाइल  पर आप साइन बस कर दीजिए...दुबे जी मुस्कुराते हुए बोले...ठीक है पाठक जी जैसा आप बोलें....अपने मातहत को चाय का मना कर दुबे जी बोले  बस बच्चे के लिए रसगुल्ला ले आओ...पापा ने फाइल साइन करवाई...और ५ मिनिट्स इधर उधर की बात कर बोले ...चलता हूं दुबे जी...दुबे जी ने भी हाथ जोड़ नमस्कार कर  विदा दे दिया....

और मैं रसगुल्ले का क्या होगा इस टेंशन मे आ गया..और कुर्सी में ही चिपक कर बैठा रहा ..पापा ने मेरा हाथ अपने हाथ मे ले लिया..मैं बोलना चाहता था..पापा रसगुल्ला....पर चुप रहा..

२०-२५ कदम चल कर मुझसे रहा नही गया और मैंने बोला पापा रसगुल्ला कौन खाएगा....इतना सुनते ही पापा ज़ोर से हँसने लगे और बोले बेटा कोई रसगुल्ला नहीं आने वाला था..ये तो बस फॉरमॅलिटी है..एक औपचारिकता....मेरे लिए ये नया था...की खिलाना नही है पर बोलना ज़रूरी है खा लो... उफ़ ये अजीब दुनिया...

 

खैर बाहर आते आते करीब २ बज गये थे....भूख वापस लग गई थी और ये समोसे वाली भूख नहीं थी....पापा ने बोला खाना खाएगा..मैने हाँ में सर हिलाया ....हम दोनो शिक्षा विभाग के पास मे ही एक होटल में बैठे.. पापा ने बोला २ थाली लगाने..मैं चुपचाप बैठा खाने के आने का इंतज़ार करने लगा.....थोड़ी ही देर में दोनों के सामने प्लास्टिक के टेबल पर २ थाली थी....एकदम कुरकुरी भिंडी..गरमा गरम दाल और चावल...टमाटर धनिया की चटनी प्याज और साथ में पापड़...मेरी याददाश्त में बाहर के खाने का शायद ये पहला अनुभव था....और जीवन के इस पड़ाव तक बेस्ट भी....पेट जीभ और मन तीनो धन्य धन्य बोल रहे थे..और मैं सातवें आसमान मे था..सोंच रहा  था कि अच्छा हुआ  खेलने के चक्कर मे मैने पापा को मना नहीं किया.....खा पीकर हम निकल पड़े ..वापस अपने शहर की ओर....

 

और जैसा मेरे लिए अनएक्सपेक्टेड था...और शायद आप लोग ने गेस किया होगा...जी हाँ...पापा ने घर जाने से पहले अपनी राजदूत रोकी मधु स्वीट्स की दुकान पर ..और मेरे साथ पूरे घर के लिए पैक कराया रसगुल्ला...

 

मैं भी चल रहा हूँ उसी पद चिन्ह पर पापा...सब कहते हैं और मैं भी कहूँगा "मेरे पापा बेसटेस्ट"

Tuesday, June 6, 2023

मिलता नहीं है

एक वीभत्स रेल दुर्घटना ...एक करुणड दृश्य के बाद की कविता...

 

 मिलता नहीं है 

मेरा लड़का!!
वो मिलता ही नहीं!!

और एक नाउम्मीद
बूढ़ा बाप
ढूँढ रहा है 
अपने युवा बेटे का
शव 
की कर सके 
विधिवत क्रियाकर्म
 और कर दे
मुक्ति अपने 
बेटे की
अपनी खुशिओ की
अपने लाठी की
सहारे की

कई सौ मुर्दों से
पटी  हुई है ज़मीन
और 
सबकी ही अपनी 
 करुन कहानी 
इतनी
की सुख जाए 
आँसुओ के समंदर

पूछा किसी ने 
क्या हुआ बाबा
 वो बुदबुदाता रहा 
खोजते हुए 
बस शव
"वो मिलता ही नही"
"वो मिलता ही नही"

एक ऐसी गुहार
बेबसी
 की  देख
आँसुओ की धारा 
बन निकल पड़ी
एक दुखो के एक लावा सी
आँखो से,हृदय से

वेदना तिव्र ऐसी की
मैं रोना चाहता हूँ
चीखकर
कसकर
उस पिता से गले लगकर
 शायद 
 दोनो ही 
सीने मे
 महसूस हो कुछ शांति 
दो पलों की ही सही


 

Sunday, May 14, 2023

मैं जंगल हो जाना चाहता हूँ

मैं जंगल हो जाना चाहता हूँ
जैसे एक नदी
या एक बड़ा सा पेड़
एक चट्टान
या की एक पशु
शिकार या शिकारी
एक उड़ता पंछी
बंदा दो मुझे  बस
 घास का फूल
या फीओर बहा दो
जैसे चलती है वान्हा
ठंडी शीतल हवा

एक पगडंडी
जान्हा से अभी कोई
नील गाय  चीतल
या निकला हो कोई हाथी का
एक परिवारिक झुंड
मैं हो जाना चाहता हूँ
मस्तमौला बंदर
या फिर
एक गिलहरी
कुछ भी कुछ भी
जैसे जंगल का
सूनापन
या फिर एक
सिहरन पैदा करती
दहाड़ चिंघाड़
एक बड़ा सा उँचा पहाड़
बस कुछ भी कैसे भी
मैं बस एक जंगल
हो जाना चाहता हूँ.


Sunday, May 1, 2022

मेरी नन्ही गिलहरी


कभी कभी ऐसा जीवन में ऐसा कुछ अद्भुत हो जाता है की ऐसा लगता है एक स्वप्न चल चल रहा हो. ऐसा ही कुछ मुझे लग रहा था..ऐयरपोर्ट पर अपने इंदौर जाने  के लिए इंडिगो फ्लाइट की बोरडिंग स्टार्ट होने का इंतज़ार करता मैं ..कन्हि दूसरी दुनिया मे गुम ..हाथ मे एक शादी का  कार्ड लिए मैं चुपचाप कॉफ़ी का आनंद उठा रहा था...
मैं अपना परिचय करवा दूं..रोहित कुमार..८० दसक का काफ़ी लोकप्रिय नाम रोहित ..नाम से अगर हीरो जैसे पेर्सनालटी की फीलिंग आई हो तो आप ग़लत बिल्कुल भी ग़लत नही है...एक छोटा मोटा हीरो तो मैं बन ही गया था..
खैर थोड़े ही देर में बोअर्डिंग शुरू होने की हलचल हुई और सब पॅसेंजर विमान की ओर रवाना हुए...और कुछ ही विमान उड़ चला इंदौर के लिए

इंदौर पंहूचते ही मेरे नाम का बोर्ड लिए एक ड्राइवर इंतज़ार करता एग्ज़िट गेट पर खड़ा मिला...मैने अपना परिचय दिया और कार मे बैठ  खिड़की से इंदौर की रास्ते दुकाने निहारता अपने कॉलेज वाले दिन मे लौटने की नाकाम सा कोशिश करने लगा..सब कुछ कभी बदला लगता तो कभी ऐसा लगता की समय वोन्हि २००० मे ही रुका सा है.
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कुछ ४० मिनिट की जर्नी के बाद कार एक बड़े से घर के सामने रुकी...झालर फूल और लाइट से  सजे घर में कुछ अलग ही हंसता  दिख रहा था...मैने अपन परिचय दिया और सामने रखे सोफे पर बैठ कर  इंतज़ार करने लगा ..उसका जिससे मिलने मैं आया था..लगभग १५-२० सालो के बाद ..
मेरे आने से घर मे एक हलचल सी मची थी... सोफे पर बैठा उसके आने का इंतज़ार कर रहा था...मन मे कुछ अलग ही भाव थे..
 

तभी परदा हिला और एक २५ साल की प्यारी सी लड़की बाहर  आकर खड़ी हो गई ...मेरे सामने..
मैं उसके चेहरे को निहारता ..उसमे कुछ खोजने की कोशिश करने लगा..हाँ वोही आँखे ,,,वोही चेहरा..वोही मासूमियत..मैं फुसफुसाया ..."मेरी नन्ही गिलहरी"  ..मेरी आँखो मे पानी सा आने लगा और मैं  पंहुच गया सन २००२ मे
इंदौर ..अन्नपूर्णा कॉलोनी

यादों मे:

तो बात उन दीनो की है जब मैं  कॉलेज मे पढ़ाई कर रहा था..दूर बिहार के एक गाँव से  कंप्यूटर की पढ़ाई करने  के लिए मैने वैष्णव कॉलेज मे अड्मिशन लिया था...पास मे ही एक छोटा एक कमरे का किराए का मकान मेरा बसेरा था....बात मेरे तीसरे सेमेस्टर की है...मैं अपने छोटे मोटे खर्चे चलाने के  लिए एक दो बच्चो को ट्यूशन पढ़ाने लगा था..और सुबह साढ़े नौ बजे वोही से वापस लौट रहा था...वो साल २००२ धार्मिक उन्माद का साल था और बात बात में लोग भड़क उठते थे ...पता नही क्या हुआ..अचानक मुझे कुछ शोर सुनाई दिया और धीरे धीरे शोर बढ़ता चला जा रहा था ..मैं  जिस गली से निकल रहा था  वहाँ कई लोगो के साथ दौड़ने की आवाज़े आने लगी.. मारो मारो की एक साथ कई  कई आवाज़ें और  फिर एकाएक पत्थर चलने लगे..एक दो पत्थर मेरे सामने की गाड़ी मे लगे जिनसे उसके शीशे टूट गये..गुजरात दंगो की कई सारी वीभत्स खबरें  जो मैने पढ़ी थी ..याद आ गई...एक सिहरन सी पूरे शरीर मे दौड़ गई..डरकर मैं  अपने कमरे के लिए दौड़ पड़ा...की तब एक पत्थर मेरे पैर पर लगा...दर्द से कराहता मैं  ताक़त जुटा कर स्पीड से दौड़ने की कोशिश करने लगा ...तभी मैने देखा एक  पास मे ही खड़ी प्यारी सी छोटी से बच्ची के पास एक पत्थर का टुकड़ा गिरा और वो रोने लगी..मैं  इधर उधर देखा..कोई नही दिखा, वो लगभग ५-६ साल की बच्ची अपना स्कूल ड्रेस पहने ..बस्ता लिए खड़ी थी..मैं कुछ सेकेंड रुका...फिर तेज़ी से  आगे बढ़ गया...पर मेरा मन नही माना तो पलट कर देखा ,,वो बच्चि वैसे ही खड़ी काफ़ी ज़ोर से लगी थी..भीड़ और पथराव दोनो ही तेज़ी से बढ़ता जा रहा था..अब ज़्यादा सोन्चने समझने का समय नही था..मैने उसे अपनी गोदी मे उठाया और अपने कमरे के लिए दौड़ लगा दिया...

कुछ १५-से २० मिनिट के बाद मैं कमरे के अंदर  था...और साथ मे थी एक ज़िम्मेदारी...मैने उसे गोद से उतार कर  पास मे रखी कुर्सी खिच कर बैठाया..वो काफ़ी सहमी सी..डरी सी  लगातार रोए जा रही थी...कुछ समझ नही आ रहा था..सुबह के १० बज रहे थे..लड़की अभी भी सिसक रही थी..मैने उससे प्यार से पूछा " चुप हो जाओ बेटा..क्या नाम है तुम्हारा"  २-३ बार पूछने पर उसने रोते हुए मुझे बोला "नि..छी ..था" , मुझे मम्मी के पास जाना है, मुझे बहूत डर लग रहा है"  मैने उसको गोद में उठा लिया..आँसू पौछ के बोला ..हा ज़रूर जाना ..पर थोड़े देर में...तुमने देख ना कितने बदमाश लोग थे बाहर, और कैसे तोड़फोड़ अकर रहे थे सब जगह" उसने हाँ मे सिर हिलाया जैसे मेरी बात समझ गई हो..रोना बंद तो हुआ पर चेहरे पर एक गहरी उदासी थी...

५ मिनिट चुप रहने के बाद  मुझसे पूछा " भैया मुझे भूख लगी है..मैं टिफिन खा लूँ"   मैने हाँ मे सिर हिलाया..
वो चुपचाप बैग से टिफिन निकाल कर खाने लगी..मुझे कुछ समझ नही आ रहा था की मैं क्या करू...मैने उसका स्कूल बैग लिया और
चेक  करने लगा...मुझे उसके बैग से उसका आईडी कार्ड मिल गया " निशिता जोशी- क्लास-१" और साथ मे टेलिफोन नंबर..मुझे खजाने मिलने की जैसे खुशी हुई..चलो कम से कम किसी को निशिता की खबर मिल पाएगी...मैने अपने सामने पीसीओ वाले को आवाज़ दिया और कहा ये दोनो नंबर पर बात करके बता देने की निशिता हमारे पास हैं..आप आकर ले जाएँ....थोड़े देर मे पीसीओ वाला लड़का वापस आया और बोला की एक ही नंबर ने बस काम किया ..जो उसके स्कूल का नंबर था... उनसे बात हो गई है..वो इसके माता पिता को बता देंगे..पर बाहर कलेक्टर ने करफ्यू की घोषणा की है.."
सारे जगह पोलीस है..किसी का बाहर निकलना मुमकिन  नही है...."  

मैं अपना सर पकड़ का बैठ गया..अब क्या करूँ...सोंच ही रहा था की मुझे सुबकने की आवाज़  सुनाई दी...
 निशिता खाते खाते रो रही थी...मैने पूछ क्या हुआ ..क्यूँ रो रही हो....
" मुझे मम्मी पास जाना है..मुझे डर लग रहा है.." मैने उसे अपने गोद मे उठ लिया और कहा...ये भैया मम्मी को फोन पर बात किए हैं..
शाम को तुम घर चले जाना...निशिता चुप तो हो गई..पर बहूत उदास थी...

तभी मेरे रूम की खिड़की पर मुझे एक गिलहरी दिखाई दी....मैने जल्दी से निशिता को पास बुलाया और गिलहरी की ओर अपनी उंगली दिखाई....छोटी सी गिलहरी को देख कर वो उसके चेहरे पर  मुस्कान तैर गई...वो गिलहरी हमारी खिड़की के पास लटकते अमरूद पेड़ पर कूद गई. और अमरूद. खाने लगी ..ये देख निशिता तालि बजा हँसने लगी..

मैने निशिता से पूछा..तुम जानती हो की कौन है ये..
वो बोली हाँ ..गिलहरी...कितनी सुंदर है ना...
मैने कहा.. बिल्कुल तुम्हारे जैसी!
वो मुस्कुराने लगी ..
तभी पी सी ओ वाला लड़का आया और बोला की निशिता के मम्मी पापा का फोन आया था.. कर्फ़्यू मे ढील मिलते ही वो दोनो इस लेने आयंगे
..निशिता को मम्मी पापा शाम को लेने आयंगे सुन कर बड़ा मज़ा आया..
उसे लगने लगा जैसे की उसकी कोई छुट्टी चल रही हो...
मुझे बोली भैया ..चलो हम कुछ खेलते हैं....
मैने पूछा क्या...उसने कहा  गुड़िया से...
मैने कहा मेरे पास कोई गुड़िया नही है...वो आश्चर्य में बोली कोई भी गुड़िया नही ..कोई टॉय नही...
मैने ना में सर हिलाया तो वो बोली ..मैं अपने पापा से बोलूँगी आपको खिलौना देने,,
मैं मुस्कुराने लगा...
फिर उसने पूछ क्या खेलें..मैने कहा छुपन छुपाई..उसने हाँ मे अपना सिर हिलाया..और मैं ज़ोर ज़ोर से काउंट करने लगा ..तभी नन्हे नन्हे कदमो के दौड़ने की आवाज़ आई..और निशिता रूम मे ही बिस्तर के नीचे छिप गई..

हम ऐसे बहूत देर तक खेले..कभी पकरम पकराई...कभी गोलो गोल घूमने का खेल..
दोपहर होने को आई और वो थक गई...और बोली भैया मुझे भूख भी आ रही है और नींद भी...
मैने कहा मैगी खाना है...मैगी का नाम सुनते ही उसकी नींद आँखो से उड़ती दिखी..
मुझे वो बेड पर चढ़ गई और धम्म से मेरे पीठ पर कूद करके बोली --यिप्पीई हाँ खाना है..
मैने एलेक्ट्रिक स्टोव पर मैग्गी बनाई...सारे टाइम वो मेरे और मैग्गी के इर्दगिर्द नाचती रही...
फिर हम दोनो ने मैग्गी खाई...मैग्गी खा कर वो लेट गई...मैने उसके सिर पर थपकीयाँ देने लगा...
थोड़े देर मे ही वो सो गई...

मुझे ये दिन बहूत लंबा लग रहा था...मैं भी उसके पास बैठा बैठा सोने लगा
करीब १-२ घंटे बाद मुझे लगा कोई मुझे हिला रहा है....मैने आँखे खोली तो देखा निशिता मुझे जगा रही थी..
वो बोली भैया देखो देखो ..गिलहरी...गिलहरी...
एक गिलहरी  रूम के  अंदर आकर फँस सी गई थी..और खिड़की के बाहर जाने का रास्ता नही ढूँढ पा रही थी.....
निशिता उसके पीछे पीछे भागने लगी....और मैं दोनो के पीछे पीछे ..हम दोनो ज़ोर ज़ोर से हंस रहे थे...
थोड़ी देर मे गिलहरी ने अपने बाहर जाने का रास्ता खोज लिया..और मैने निशिता को गोद मे उठा लिया..
और मैने पूछा कैसी लगी गिल्लू ..उसने पूछा कौन गिल्लू..मैने कहा इस गिलहरी का नाम मैने रखा है...गिल्लू
वो ताली बजाई बोली ...ये गिल्लू मेरी फ्रेंड है...
पर आपने उसका नाम क्यूँ रखा..नाम तो मम्मी पापा रखते हैं ना..
मैने कहा हाँ..उसके मम्मी पापा ने भी उसका नाम रखा होगा ..और मैं भी उसको पसंद करता हू तो मैने भी उसका नाम रख दिया " गिल्लू"
वो कुछ समझते हुए बोली..अच्छा...
मैने कहा ..मैने तुम्हारा नाम भी रखा है,,,,उसने भौ उठाते पूछा ,अछा क्या नाम?
"मेरी नन्ही गिलहरी"
वो मुस्कुराने लगी.....

शाम होने लगी थी ..मैने कहा ब्रेड खाना है चाय के साथ...और हाँ में सिर हिलने पर मैने चाय बनाते बनाते ब्रेड सेकना चालू किया
और फिर हम दोनो ने बाहर आँगन बैठ अपने घरों  को लौटते पन्छियो को देखते हुए चाय के साथ ब्रेड खाने लगे..
तभी निशिता ने पूछा भैया " ये सारी चिड़िया  कहाँ जा रही है... मैने कहाँ अपने अपने घर...
उसकी आँखे भीगने लगी..बोली मुझे भी अपने घर जाना है..मम्मी पापा कब आयंगे...
मैने उसे सम्हाला और कहा थोड़े ही देर मे.....और फिर उसे कंधे मे बैठा कर घूमने लगा..ऐसा करते ही वो ज़ोर ज़ोर से हँसने लगी...
तभी एक  पुलिस की जीप घर के बाहर आकर रुकी और निशिता की मम्मी की आवाज़ आई... निशु...निशु निशुउऊउ
निशिता मेरे कंधे मे बैठे बैठे चिल्लाने लगी....मम्मी..मम्मी
जैसे ही मैने उसे कंधे से उतारा..वो दौड़ कर अपनी मम्मी के गोद मे चढ़ गई...मैने सारी कहानी उसके मम्मी पापा और पोलीस को सुनाई..
उसके मम्मी पापा ने निशिता को सुरक्षित रखने ..और फिर इतने देर उसका बड़े भाई जैसे ध्यान रखने के लिए मेरा काफ़ी  धन्यवाद दिया ...थोड़ी देर बाद उन्होने वापस घर जाने के लिए कहा..और  फिर निशिता का बैग और टिफिन ले कर जीप में बैठ गये...

उसने जीप से मेरी ओर झाँका...मैने अपना हाथ हिलाया और कहा... "टा टा मेरी नन्ही गिलहरी"...
ये विदाई इतनी तेज़ी से हुई की मुझे कुछ समझ नही आया..सारा घर खाली सा लगने लगा..इन  चन्द घंटो मे ही अपनी नन्ही गिलहरी से इतना जुड़ाव सा हो गया ..ये सोंच मैं खुद सर्प्राइज़ था...सोंच रहा था जाने कैसे भाई और पापा अपनी बहनो और बेटी का विदाई सहन करते होंगे शादी के बाद...

थोड़े दिन हुए ..मैं कॉलेज आने जाने लगा....नन्ही गिलहरी की  यादे धुँधलाने लगी..
सनडे  का दिन था और बैठा मैं खाना बनाने की तैयारी कर रहा था..तभी एक आवाज़ आई -भैया भैया...रोहित भैया..
मैं बाहर आके देखा ..सामने निशिता थी..मेरी नन्ही गिलहरी..वो दौड़ कर मेरी गोद मे आकर चढ़ गई...
साथ मे उसके मम्मी पापा भी थे..उन्होने बताया की वो कुछ सालो क लिए इंदौर से बाहर शिफ्ट हो रहे हैं...और जाने से पहले  सारे अपनो से मिलते जा रहे है..,,उन्होने एक अजनबी को अपनो मे शामिल कर लिया था....हमेशा संपर्क मे रहने का बोल उन्होने मेरे  होम टाउन का अड्रेस लिया..थोड़े देर हम दोनो मूहबोले भाई बहन साथ खेले और फिर वो चले गये,,

वर्तमान:
तभी मेरे पैरो पर उसके हाथो के स्पर्श से मेरी तंद्रा टूटी ..मेरे हाथ ने उसको हृदय से आशीर्वाद दिया..और वो छोटी नन्ही गिलहरी ..
रोहित भैया कहके गले लग गई थी...