Sunday, May 1, 2022

मेरी नन्ही गिलहरी


कभी कभी ऐसा जीवन में ऐसा कुछ अद्भुत हो जाता है की ऐसा लगता है एक स्वप्न चल चल रहा हो. ऐसा ही कुछ मुझे लग रहा था..ऐयरपोर्ट पर अपने इंदौर जाने  के लिए इंडिगो फ्लाइट की बोरडिंग स्टार्ट होने का इंतज़ार करता मैं ..कन्हि दूसरी दुनिया मे गुम ..हाथ मे एक शादी का  कार्ड लिए मैं चुपचाप कॉफ़ी का आनंद उठा रहा था...
मैं अपना परिचय करवा दूं..रोहित कुमार..८० दसक का काफ़ी लोकप्रिय नाम रोहित ..नाम से अगर हीरो जैसे पेर्सनालटी की फीलिंग आई हो तो आप ग़लत बिल्कुल भी ग़लत नही है...एक छोटा मोटा हीरो तो मैं बन ही गया था..
खैर थोड़े ही देर में बोअर्डिंग शुरू होने की हलचल हुई और सब पॅसेंजर विमान की ओर रवाना हुए...और कुछ ही विमान उड़ चला इंदौर के लिए

इंदौर पंहूचते ही मेरे नाम का बोर्ड लिए एक ड्राइवर इंतज़ार करता एग्ज़िट गेट पर खड़ा मिला...मैने अपना परिचय दिया और कार मे बैठ  खिड़की से इंदौर की रास्ते दुकाने निहारता अपने कॉलेज वाले दिन मे लौटने की नाकाम सा कोशिश करने लगा..सब कुछ कभी बदला लगता तो कभी ऐसा लगता की समय वोन्हि २००० मे ही रुका सा है.
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कुछ ४० मिनिट की जर्नी के बाद कार एक बड़े से घर के सामने रुकी...झालर फूल और लाइट से  सजे घर में कुछ अलग ही हंसता  दिख रहा था...मैने अपन परिचय दिया और सामने रखे सोफे पर बैठ कर  इंतज़ार करने लगा ..उसका जिससे मिलने मैं आया था..लगभग १५-२० सालो के बाद ..
मेरे आने से घर मे एक हलचल सी मची थी... सोफे पर बैठा उसके आने का इंतज़ार कर रहा था...मन मे कुछ अलग ही भाव थे..
 

तभी परदा हिला और एक २५ साल की प्यारी सी लड़की बाहर  आकर खड़ी हो गई ...मेरे सामने..
मैं उसके चेहरे को निहारता ..उसमे कुछ खोजने की कोशिश करने लगा..हाँ वोही आँखे ,,,वोही चेहरा..वोही मासूमियत..मैं फुसफुसाया ..."मेरी नन्ही गिलहरी"  ..मेरी आँखो मे पानी सा आने लगा और मैं  पंहुच गया सन २००२ मे
इंदौर ..अन्नपूर्णा कॉलोनी

यादों मे:

तो बात उन दीनो की है जब मैं  कॉलेज मे पढ़ाई कर रहा था..दूर बिहार के एक गाँव से  कंप्यूटर की पढ़ाई करने  के लिए मैने वैष्णव कॉलेज मे अड्मिशन लिया था...पास मे ही एक छोटा एक कमरे का किराए का मकान मेरा बसेरा था....बात मेरे तीसरे सेमेस्टर की है...मैं अपने छोटे मोटे खर्चे चलाने के  लिए एक दो बच्चो को ट्यूशन पढ़ाने लगा था..और सुबह साढ़े नौ बजे वोही से वापस लौट रहा था...वो साल २००२ धार्मिक उन्माद का साल था और बात बात में लोग भड़क उठते थे ...पता नही क्या हुआ..अचानक मुझे कुछ शोर सुनाई दिया और धीरे धीरे शोर बढ़ता चला जा रहा था ..मैं  जिस गली से निकल रहा था  वहाँ कई लोगो के साथ दौड़ने की आवाज़े आने लगी.. मारो मारो की एक साथ कई  कई आवाज़ें और  फिर एकाएक पत्थर चलने लगे..एक दो पत्थर मेरे सामने की गाड़ी मे लगे जिनसे उसके शीशे टूट गये..गुजरात दंगो की कई सारी वीभत्स खबरें  जो मैने पढ़ी थी ..याद आ गई...एक सिहरन सी पूरे शरीर मे दौड़ गई..डरकर मैं  अपने कमरे के लिए दौड़ पड़ा...की तब एक पत्थर मेरे पैर पर लगा...दर्द से कराहता मैं  ताक़त जुटा कर स्पीड से दौड़ने की कोशिश करने लगा ...तभी मैने देखा एक  पास मे ही खड़ी प्यारी सी छोटी से बच्ची के पास एक पत्थर का टुकड़ा गिरा और वो रोने लगी..मैं  इधर उधर देखा..कोई नही दिखा, वो लगभग ५-६ साल की बच्ची अपना स्कूल ड्रेस पहने ..बस्ता लिए खड़ी थी..मैं कुछ सेकेंड रुका...फिर तेज़ी से  आगे बढ़ गया...पर मेरा मन नही माना तो पलट कर देखा ,,वो बच्चि वैसे ही खड़ी काफ़ी ज़ोर से लगी थी..भीड़ और पथराव दोनो ही तेज़ी से बढ़ता जा रहा था..अब ज़्यादा सोन्चने समझने का समय नही था..मैने उसे अपनी गोदी मे उठाया और अपने कमरे के लिए दौड़ लगा दिया...

कुछ १५-से २० मिनिट के बाद मैं कमरे के अंदर  था...और साथ मे थी एक ज़िम्मेदारी...मैने उसे गोद से उतार कर  पास मे रखी कुर्सी खिच कर बैठाया..वो काफ़ी सहमी सी..डरी सी  लगातार रोए जा रही थी...कुछ समझ नही आ रहा था..सुबह के १० बज रहे थे..लड़की अभी भी सिसक रही थी..मैने उससे प्यार से पूछा " चुप हो जाओ बेटा..क्या नाम है तुम्हारा"  २-३ बार पूछने पर उसने रोते हुए मुझे बोला "नि..छी ..था" , मुझे मम्मी के पास जाना है, मुझे बहूत डर लग रहा है"  मैने उसको गोद में उठा लिया..आँसू पौछ के बोला ..हा ज़रूर जाना ..पर थोड़े देर में...तुमने देख ना कितने बदमाश लोग थे बाहर, और कैसे तोड़फोड़ अकर रहे थे सब जगह" उसने हाँ मे सिर हिलाया जैसे मेरी बात समझ गई हो..रोना बंद तो हुआ पर चेहरे पर एक गहरी उदासी थी...

५ मिनिट चुप रहने के बाद  मुझसे पूछा " भैया मुझे भूख लगी है..मैं टिफिन खा लूँ"   मैने हाँ मे सिर हिलाया..
वो चुपचाप बैग से टिफिन निकाल कर खाने लगी..मुझे कुछ समझ नही आ रहा था की मैं क्या करू...मैने उसका स्कूल बैग लिया और
चेक  करने लगा...मुझे उसके बैग से उसका आईडी कार्ड मिल गया " निशिता जोशी- क्लास-१" और साथ मे टेलिफोन नंबर..मुझे खजाने मिलने की जैसे खुशी हुई..चलो कम से कम किसी को निशिता की खबर मिल पाएगी...मैने अपने सामने पीसीओ वाले को आवाज़ दिया और कहा ये दोनो नंबर पर बात करके बता देने की निशिता हमारे पास हैं..आप आकर ले जाएँ....थोड़े देर मे पीसीओ वाला लड़का वापस आया और बोला की एक ही नंबर ने बस काम किया ..जो उसके स्कूल का नंबर था... उनसे बात हो गई है..वो इसके माता पिता को बता देंगे..पर बाहर कलेक्टर ने करफ्यू की घोषणा की है.."
सारे जगह पोलीस है..किसी का बाहर निकलना मुमकिन  नही है...."  

मैं अपना सर पकड़ का बैठ गया..अब क्या करूँ...सोंच ही रहा था की मुझे सुबकने की आवाज़  सुनाई दी...
 निशिता खाते खाते रो रही थी...मैने पूछ क्या हुआ ..क्यूँ रो रही हो....
" मुझे मम्मी पास जाना है..मुझे डर लग रहा है.." मैने उसे अपने गोद मे उठ लिया और कहा...ये भैया मम्मी को फोन पर बात किए हैं..
शाम को तुम घर चले जाना...निशिता चुप तो हो गई..पर बहूत उदास थी...

तभी मेरे रूम की खिड़की पर मुझे एक गिलहरी दिखाई दी....मैने जल्दी से निशिता को पास बुलाया और गिलहरी की ओर अपनी उंगली दिखाई....छोटी सी गिलहरी को देख कर वो उसके चेहरे पर  मुस्कान तैर गई...वो गिलहरी हमारी खिड़की के पास लटकते अमरूद पेड़ पर कूद गई. और अमरूद. खाने लगी ..ये देख निशिता तालि बजा हँसने लगी..

मैने निशिता से पूछा..तुम जानती हो की कौन है ये..
वो बोली हाँ ..गिलहरी...कितनी सुंदर है ना...
मैने कहा.. बिल्कुल तुम्हारे जैसी!
वो मुस्कुराने लगी ..
तभी पी सी ओ वाला लड़का आया और बोला की निशिता के मम्मी पापा का फोन आया था.. कर्फ़्यू मे ढील मिलते ही वो दोनो इस लेने आयंगे
..निशिता को मम्मी पापा शाम को लेने आयंगे सुन कर बड़ा मज़ा आया..
उसे लगने लगा जैसे की उसकी कोई छुट्टी चल रही हो...
मुझे बोली भैया ..चलो हम कुछ खेलते हैं....
मैने पूछा क्या...उसने कहा  गुड़िया से...
मैने कहा मेरे पास कोई गुड़िया नही है...वो आश्चर्य में बोली कोई भी गुड़िया नही ..कोई टॉय नही...
मैने ना में सर हिलाया तो वो बोली ..मैं अपने पापा से बोलूँगी आपको खिलौना देने,,
मैं मुस्कुराने लगा...
फिर उसने पूछ क्या खेलें..मैने कहा छुपन छुपाई..उसने हाँ मे अपना सिर हिलाया..और मैं ज़ोर ज़ोर से काउंट करने लगा ..तभी नन्हे नन्हे कदमो के दौड़ने की आवाज़ आई..और निशिता रूम मे ही बिस्तर के नीचे छिप गई..

हम ऐसे बहूत देर तक खेले..कभी पकरम पकराई...कभी गोलो गोल घूमने का खेल..
दोपहर होने को आई और वो थक गई...और बोली भैया मुझे भूख भी आ रही है और नींद भी...
मैने कहा मैगी खाना है...मैगी का नाम सुनते ही उसकी नींद आँखो से उड़ती दिखी..
मुझे वो बेड पर चढ़ गई और धम्म से मेरे पीठ पर कूद करके बोली --यिप्पीई हाँ खाना है..
मैने एलेक्ट्रिक स्टोव पर मैग्गी बनाई...सारे टाइम वो मेरे और मैग्गी के इर्दगिर्द नाचती रही...
फिर हम दोनो ने मैग्गी खाई...मैग्गी खा कर वो लेट गई...मैने उसके सिर पर थपकीयाँ देने लगा...
थोड़े देर मे ही वो सो गई...

मुझे ये दिन बहूत लंबा लग रहा था...मैं भी उसके पास बैठा बैठा सोने लगा
करीब १-२ घंटे बाद मुझे लगा कोई मुझे हिला रहा है....मैने आँखे खोली तो देखा निशिता मुझे जगा रही थी..
वो बोली भैया देखो देखो ..गिलहरी...गिलहरी...
एक गिलहरी  रूम के  अंदर आकर फँस सी गई थी..और खिड़की के बाहर जाने का रास्ता नही ढूँढ पा रही थी.....
निशिता उसके पीछे पीछे भागने लगी....और मैं दोनो के पीछे पीछे ..हम दोनो ज़ोर ज़ोर से हंस रहे थे...
थोड़ी देर मे गिलहरी ने अपने बाहर जाने का रास्ता खोज लिया..और मैने निशिता को गोद मे उठा लिया..
और मैने पूछा कैसी लगी गिल्लू ..उसने पूछा कौन गिल्लू..मैने कहा इस गिलहरी का नाम मैने रखा है...गिल्लू
वो ताली बजाई बोली ...ये गिल्लू मेरी फ्रेंड है...
पर आपने उसका नाम क्यूँ रखा..नाम तो मम्मी पापा रखते हैं ना..
मैने कहा हाँ..उसके मम्मी पापा ने भी उसका नाम रखा होगा ..और मैं भी उसको पसंद करता हू तो मैने भी उसका नाम रख दिया " गिल्लू"
वो कुछ समझते हुए बोली..अच्छा...
मैने कहा ..मैने तुम्हारा नाम भी रखा है,,,,उसने भौ उठाते पूछा ,अछा क्या नाम?
"मेरी नन्ही गिलहरी"
वो मुस्कुराने लगी.....

शाम होने लगी थी ..मैने कहा ब्रेड खाना है चाय के साथ...और हाँ में सिर हिलने पर मैने चाय बनाते बनाते ब्रेड सेकना चालू किया
और फिर हम दोनो ने बाहर आँगन बैठ अपने घरों  को लौटते पन्छियो को देखते हुए चाय के साथ ब्रेड खाने लगे..
तभी निशिता ने पूछा भैया " ये सारी चिड़िया  कहाँ जा रही है... मैने कहाँ अपने अपने घर...
उसकी आँखे भीगने लगी..बोली मुझे भी अपने घर जाना है..मम्मी पापा कब आयंगे...
मैने उसे सम्हाला और कहा थोड़े ही देर मे.....और फिर उसे कंधे मे बैठा कर घूमने लगा..ऐसा करते ही वो ज़ोर ज़ोर से हँसने लगी...
तभी एक  पुलिस की जीप घर के बाहर आकर रुकी और निशिता की मम्मी की आवाज़ आई... निशु...निशु निशुउऊउ
निशिता मेरे कंधे मे बैठे बैठे चिल्लाने लगी....मम्मी..मम्मी
जैसे ही मैने उसे कंधे से उतारा..वो दौड़ कर अपनी मम्मी के गोद मे चढ़ गई...मैने सारी कहानी उसके मम्मी पापा और पोलीस को सुनाई..
उसके मम्मी पापा ने निशिता को सुरक्षित रखने ..और फिर इतने देर उसका बड़े भाई जैसे ध्यान रखने के लिए मेरा काफ़ी  धन्यवाद दिया ...थोड़ी देर बाद उन्होने वापस घर जाने के लिए कहा..और  फिर निशिता का बैग और टिफिन ले कर जीप में बैठ गये...

उसने जीप से मेरी ओर झाँका...मैने अपना हाथ हिलाया और कहा... "टा टा मेरी नन्ही गिलहरी"...
ये विदाई इतनी तेज़ी से हुई की मुझे कुछ समझ नही आया..सारा घर खाली सा लगने लगा..इन  चन्द घंटो मे ही अपनी नन्ही गिलहरी से इतना जुड़ाव सा हो गया ..ये सोंच मैं खुद सर्प्राइज़ था...सोंच रहा था जाने कैसे भाई और पापा अपनी बहनो और बेटी का विदाई सहन करते होंगे शादी के बाद...

थोड़े दिन हुए ..मैं कॉलेज आने जाने लगा....नन्ही गिलहरी की  यादे धुँधलाने लगी..
सनडे  का दिन था और बैठा मैं खाना बनाने की तैयारी कर रहा था..तभी एक आवाज़ आई -भैया भैया...रोहित भैया..
मैं बाहर आके देखा ..सामने निशिता थी..मेरी नन्ही गिलहरी..वो दौड़ कर मेरी गोद मे आकर चढ़ गई...
साथ मे उसके मम्मी पापा भी थे..उन्होने बताया की वो कुछ सालो क लिए इंदौर से बाहर शिफ्ट हो रहे हैं...और जाने से पहले  सारे अपनो से मिलते जा रहे है..,,उन्होने एक अजनबी को अपनो मे शामिल कर लिया था....हमेशा संपर्क मे रहने का बोल उन्होने मेरे  होम टाउन का अड्रेस लिया..थोड़े देर हम दोनो मूहबोले भाई बहन साथ खेले और फिर वो चले गये,,

वर्तमान:
तभी मेरे पैरो पर उसके हाथो के स्पर्श से मेरी तंद्रा टूटी ..मेरे हाथ ने उसको हृदय से आशीर्वाद दिया..और वो छोटी नन्ही गिलहरी ..
रोहित भैया कहके गले लग गई थी...

19 comments:

  1. Bahut emotional karne wali story hai.....very touchy...

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  2. बेहतरीन रचना !! भावपूर्ण.. मर्मस्पर्शी कहानी!!👏👏👌🏻👌🏻

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  3. This is brilliant

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  4. Very emotional, bohot hi khas rachna.

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  5. Bahut sundar 👌👌👌👌🌷🌷🌸👐👐

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  6. Very nice attempt..really emotional 😀

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  7. असीम शुभकामनाए!
    *नि:स्वार्थ प्रेम एक अलौकिक आनंद देता है!!*

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  8. हृदयस्पर्शी रचना👌👌
    "नि:स्वार्थ प्रेम अलौकिक आनंद प्रदान करता है !"
    असीम शुभकामनाएं💐

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  9. Nicely written. Hope to read your book one day. Congratulations!!

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  10. Bahot hi shandaar Jiju👌👌

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  11. बेहतरीन लेख राहुलजी

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  12. Great story Rahul sir, manjula mam ne suggest Kiya tha, great choice of worda

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  13. Shandaar. Waiting for more.👌👌👌

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  14. Big round of applause!!

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  15. Excellent experience of traveling life has been narrated like a renowned story writer. I am proud of my bhanje for your hidden skills of creative attitude and behavior o with people who are near to you is really awesome and it shows your bona-fide intentions to other people without selfishness. It is really rare experience whatsoever he's been done by you I congrate you for your creativity. I pray to God for bright future creation..thanks a lot.

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  16. Ek ek shabd motiyo ki tarah piro kar itni umda kahani likhne k liye aap sach me badhai k patra hain rahul bhaiya. ❤️❤️

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