Thursday, April 9, 2020

हम ...शायद बेशरम

कभी पढ़ते हुए
देश दुनिया की ख़बरे
इतनी
सरसरी निगाहो से
की सेकंड भी शरमा जाए
समझिए इतना छोटा
जितना मिलता है
कोने मे छपी एक
बड़ी सी छोटी खबर
" मुठभेड़ में शहीद हुए चार जवान" को
समाचार पत्रो के मुख पृष्ट पर


और जो हम नही पढ़ पाते
ना देख पाते
ना ही जान पाते हैं
वो हैं

एक माँ की सिसकियाँ
जो अपने लाल को
ना पहना सकी
चाव से बुना स्वेटर
ना ही खिला पाई
उसके बेटे की मनपसंद
अपने हाथ की खीर और पूडिया
ना गले  लगा सकी
ना ही चूम सकी
उसका माथा

और एक पत्नी की
पथराई आँखे
बहते आँसू
बुझे सपने
एक अधूरा आलिंगन
एक  अधूरा मिलन
अपने बच्चो के आने वाले मासूम प्रश्न
उनके परवरिश की चिंता
सामने कठिन लंबा वैधव्यजीवन

मासूम अबोध संतान
जिनको बोध तो है की
कुछ दुखद हुआ
पर क्या उसे ना
समझ पाने की बेबसी
रोती माँ और दादी
उनका सहमता मन

समंदर
रोके हुए आँसुओ का
बूढ़ा लाचार
बेबस पिता

और चाय की
चुसकीओं के साथ
ऐसे कई न्यूज़
जिनको उनका सही स्पेस
सम्मान भी ना दिला पाए
पढ़ते या स्क्रॉल करते
हम
अक्रम्न्य
शायद बेशरम...

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