मोनू शुक्ला किस्मत के धनी थे शुक्ला जी को ये बात स्पष्ट हो चली थी...पर दिल मानने को तैयार ना था...
या ऐसा कहे एक ज़िद सी आ चुकी थी...."मोनू का बाप हूँ मैं" ये बार बार दोहरा अपने सारे दुखों का बदला लेने
शुक्ला जी कमर कसे हुए थे....जैसे तैसे शुक्ला जी ने हलवा गटका....एक नज़र सोफे पर दौड़ाई ..और चल दिए अपने रूम में आराम करने
वैसे इन सब घटनाओं का मोनू को पता तो ना था..पर हल्का हल्का आभास था..कुछ तो गड़बड़ है.....शुक्ला जी के चेहरे की रंगत, उनकी आँखों का उतार-चढ़ाव देखकर मोनू महाराज बेचैन रहने लगे थे।
नाना नानी मामा ..फिर प्यारी सी मामी...मोनू ने चारों को ऐसा फंसाया की ४ दिन का ट्रिप १० दिन मे बदल गया....उधर शुक्ला जी पनीर, प्रवाल, मिठाई और दूध-दही के खर्च से और दुखी हो रहे थे.... समय बड़ा ही अजब खिलाड़ी है—क्रोध का लावा कब पिघलकर मोम हो गया, शुक्ला जी भी न समझ ...प्यारे से शुक्ला जी अपने दुख और बदले को त्याग दिए थे..
.वैसे भी शुक्ला जी को पता नही था की आगे हालत और कठिन हैं...
मोनू को प्यार हो गया था....नाम था प्रिया बिड़ला......उस समय में लड़को को बिड़ला कपूर मल्होत्रा जैसे सरनेम की लड़कियाँ
परियों जैसे होती थी...मतलब किस्से कहानियों मे....पर जैसा मोनू का भाग्य था....मोनू की क्लास मे थी ....और सबसे बड़ी बात ये थी
की प्रिया को मोनू पसंद थे...हम केवल पसंद कहेंगे ...क्यूंकी लड़की के दिल का हाल जानना मुश्किल ही नही नामुमकिन है..... प्रिया अपने क्लास मे लड़कों मे सिर्फ़ मोनू से बात करती..बात क्या करती मोनू की बातों और शरारतों पर खिलखिला कर हँसती.....
१४ के होते हुए मोनू ..हार्मोनल चेंजेस के लपेटे मे थे..... मोनू भाई ने कन्हि पढ़ा था...हँसी तो फँसी ...ये उनका खुद को समझने का अंदाज था....
सोने पर सुहागा ये भी था की प्रिया का घर भी २-३ मोहल्ले छोड़कर ही था.... टीवी पर नया नया गाना आया था..
" घर से निकलते ही ..कुछ दूर चलते ही" मोनू खुद को गिटार लिए ये गाना उसके गली गाने का दिवा स्वप्न में खोए रहते ...
एक दिन बातों बातों मे मोनू के प्रिया के जनमदिन का पता लग गया था......12 अक्टूबर ....बस फिर क्या था—चॉकलेट, ग्रीटिंग कार्ड और टेडी बियर लेने की ठान ली।लेकिन दुकान पहुँच कर मालूम हुआ कि इन तीनों गिफ्ट लेने के लिए तो "लोन" लेना पड़ेगा।
.
जैसा पैदा होते ही मोनू के चला आ रहा था......किस्मत तो अच्छी थी ही ..समय भी मोनू महाराज के साथ था....
नाना नानी मामा मामी.....सब को अलग अलग पॉलिश लगा मोनू ने अच्छी खासी रकम लपेट ली.....चॉकलेट ग्रिटिंग कार्ड और टेडी के साथ एक छोटे केक का भी जुगाड़ हो गया था.....
१२ अक्टूबर
"जिसका मुझे था इंतज़ार ..जिसके लिए दिल था बेकरार ..वो घड़ी आ गई आ गई" सुबह से जब ये गाना जब तीसरी बार बजा तो शुक्ला जी थोड़े चिंतित हो गये....उन्होंने दिमाग के सारे कोने खंगाल डाले—मिसेज़ शुक्ला का जन्मदिन? शादी की सालगिरह? साले साहब का बर्थडे? मामी जी का? पर कुछ समझ न आया। ...यूँ कहे के पूरा डेटाबेस स्कॅन कर लिया....पर समझ ना आया की आज के दिन क्या खास है......जब कुछ ना याद आया तो ज़ोर से हवा मे सबके लिए प्रश्न छोड़ा...." भाई आज कोई खास दिन है क्या" .....मोनू ने फट से गाना बंद किया ...और सरक लिए स्कूल के लिए..
आज शुक्ला जी की होने वाली बहू का जन्मदिन था..पर शुक्ला जी अनभीज्ञ रह गये 😓 ...
आज हवा मे अलग महक थी..फ़िज़ा कुछ गुलाबी थी....मोनू शुक्ला आज खुशी में क्लास में लेट हो गये ..जैसे ही अपने क्लास मे एंट्री लिए वैसे ही क्लास टीचर "महकुआ सर"(इनके बारे में भी बताया जाएगा) सामने दिखे....गुस्से में मोनू से बोले ..आइए आइए शुक्ला जी..बारात रेडी है "... क्लास हँसी से गूँज उठी।
प्रिया भी खिलखिलाकर हँसी...सब कुछ इग्नोर करते हुए मोनू ने अपनी सीट ग्रहण की....जैसे तैसे पीरियड बीत रहे थे..मोनू शुक्ला से लंच ब्रेक का वेट नही हो रहा था..खैर लंच ब्रेक होना था ..हुआ..मोनू को "हैप्पी बर्थ डे प्रिया बोलना था"..बोले भी
.पर बस एक छोटा-सा "थैंक्यू" मिला और फुल स्टॉप।
मोनू शुक्ला आगे क्या करें समझ नही पा रहे थे.....स्कूल बैग मे अपने हाथों से लिखा ग्रीटिंग कार्ड, डेरी मिल्क, टेडी और पिघलता हुआ केक..सब टेंशन दे रहे थे..
छुट्टी की घंटी बजते तक मोनू शुक्ला को लगा एक सदी बीत गई....खैर स्कूल के बाहर मोड़ पर मोनू ने प्रिया को आवाज़ लगाई.....जैसे ही प्रिया रुकी..."हैप्पी बर्थडे टू यू ..हैप्पी बर्थडे टू यू डियर प्रिया " का गाना गाते हुए उन्होने सब समान प्रिया के सुपुर्द कर दिया.....और कुछ सोचने का मौका दिए वहाँ से लप्पा हो लिए......कुछ १० कदम ही चले थे तो एक मोनू मोनू की प्यार भर आवाज़ सुनाई दी...पर वो प्रिया की आवाज़ तो नही थी...शरमाते हुए जैसे ही मोनू शुक्ला थैंक्स के साथ कुछ सुर प्यार भरे शब्द सुनने को मुड़े....सामने थे पिताश्री..शुक्ला जी.....😱
मेरी बाते
राहुल पाठक की डायरी के पन्ने ........
Sunday, September 14, 2025
मोनू शुक्ला- ४
Tuesday, July 22, 2025
मोनू शुक्ला-3
मोनू शुक्ला अब पूरे १४ साल के हो चुके थे। ... पर जितनी तेजी से उनकी उम्र बढ़ रही थी, उससे कहीं ज़्यादा तेज़ी से बड़े शुक्ला जी के बाल कम हो रहे थे — और ब्लड प्रेशर बढ़ता जा रहा था।
मोनू के जन्मदिन पर उसने अपनी मीठी बातों और मामा की चमचागिरी से एक सेकेंड हैंड स्कूटर जुगाड़ लिया।
साले साहब के प्यार मे और अपने घर मे शांति की चाहत ,दोनों को बचाने की मजबूरी में शुक्ला जी ने वो स्कूटर मौन स्वीकृति दे दी। ....देखने वाली बात ये थी की उस स्कूटर की नंबर प्लेट के आख़िरी तीन अंक थे — 420।मोनू की शरारतों को अब जैसे नंबर प्लेट से लाइसेंस मिल गया था। मोनू के शैतानी को पंख लग गये ....
थोड़े ही दिनो मे मोहल्ले वालों के दुपहिया मे रिजर्व लगने की गति में काफी तेजी आई थी..... किसी के टैंक से २००–३०० मि.ली. पेट्रोल गायब होने लगा था। मोहल्ले में खुसर-पुसर होने लगी... कोई तो है जो पेट्रोल की ‘रिज़र्व’ को भी बर्बाद कर रहा है!
एक दिन बड़े शुक्ला जी की अर्जेंट मीटिंग थी....सुबह ७ बजे ही हड़बड़ी मे मिश्रा जी नाश्ता वास्ता छोड़ ऑफीस के लिए अपने पुराने मोपेड पर निकल लिए....आधे रास्ते मे मे ही गाड़ी बंद....पेट्रोल वाला काँटा ज़ीरो को छू रहा था.... मिश्रा जी को क्लियर याद था — “ कल ही तो डलवाया था!”
.तो फिर क्या हुआ?
धीरे-धीरे शुक्ला जी को याद आने लगा — कई बार उन्होंने मोनू के हाथ में एक पतला पाइप देखा था। उस वक़्त कुछ खास ध्यान नहीं दिया था, लेकिन अब वो नज़ारा मानो किसी थ्रिलर फिल्म की तरह आँखों के सामने घूम गया।
पसीने से तर-बतर शुक्ला जी, पुराना मोपेड एक किलोमीटर तक पेट्रोल पंप तक खींचते हुए, रास्ते भर अपने समस्त पूर्वजों और भाग्य विधाता को याद करते रहे। गाड़ी तो खींच ही रहे थे, साथ में अपने धैर्य की भी अंतिम परीक्षा ले रहे थे।... ऑफिस पहुँचे तो हाल बेहाल — कपड़े सिकुड़े हुए, प्रेस का नामोनिशान नहीं, मीटिंग में देर से पहुँचे सो अलग। बड़े अफसरों की गहरी निगाहें जैसे उनके आत्मसम्मान को छलनी कर रही थीं।
..नाश्ता तो कर नहीं पाए थे.....पेट कुलबुला रहा था.... दिमाग थकावट और बेइज़्ज़ती से झल्लाया हुआ था..
मन ही मन भीष्म प्रतिज्ञा ली गई.. "आज मोनू का हिसाब होगा!" ...रास्ते भर मोनू की कंबल कुटाई के दिवा स्वप्न देखते हुए शुक्ला जी घर पहुंचे....घर के गेट तक पहुँचते ही, पूरे गुस्से के साथ दहाड़ उठे —"मोनूऊऊऊउ....!!!" लेकिन जवाब आया — "वो तो सुबह ही दोस्तों के साथ पिकनिक चला गया है..." ..बदला अधूरा था....रात के खाने और थकान ने नींद को दुगना कर दिया...मोनू के घर आने के पहले मिश्रजी खर्राटे लेने लगे
सुबह फ्रेश मन से मोनू की तबीयत से कुटाई का प्लान बना शुक्लाजी सो गये ...सुबह उठते ही ब्रश के पहले हाथो मे बाँस की बेंत थी ....और चल दिए मोनू को उठाने....पर पता चला मोनू सुबह कुछ जल्दी ही स्कूल निकल लिया....शुक्ला जी हाथ मल के रह गये.... कुटाई कार्यक्रम को शाम के लिए पोस्टपोन किया गया....
शाम को बड़े उम्मीदों के साथ शुक्ला जी घर लौटे...मन मे जोश था ...सीने मे गुस्सा और बाजुओं मे ताकत थी......मोनू शुक्ला की घर के अंदर से आती आवाज़ देख शुक्ला जी की बाँछे खिल गई.....
जैसे ही घर मे प्रवेश किए......सोफे में मोनू के साथ मामा मामी ..और नाना -नानी सब हलवा खा रहे थे.. शुक्ला जी को देखते ही मोनू की मम्मी ने मुस्कुरा कर उन्हें भी एक प्लेट हलवा थमा दी। ......
शुक्ला जी समझ गए — पूरी कायनात मोनू की सुरक्षा में तैनात है! मन मसोसकर एक कोना पकड़ लिया और हलवा चखने लगे...रेडियो पर बज रहा था:"क्या हुआ तेरा वादा... वो कसम, वो इरादा..."
मोनू शुक्ला -2
जैसे-जैसे मोनू शुक्ला बड़े हो रहे थे, उनके भीतर एक बात बिल्कुल स्पष्ट होती जा रही थी —
"इन लक्षणों के साथ तो जल्दी ही अपने पैरों पर खड़ा होना पड़ेगा!"
..अब बात ये थी कि उम्र केवल 12 साल थी —न कोई नौकरी देता, न ही पैसे कमाने का कोई और तरीका मालूम था..
घर से पैसा चुराना – वो तो मोनू शुक्ला के "अवधूत सिद्धांतों" के खिलाफ था।पर जेब खर्च चाहिए था, और कल से ही चाहिए था।
..तो मोनू ने सोचा कि सीधा रास्ता अपनाया जाए –पापा के सामने खड़े होकर बोले:"पापा, हर महीने कुछ जेब खर्च चाहिए।
अब 80-90 के दशक के हर क्लासिक पापा की तरह, शुक्ला जी ने भी जवाब में एक पूरा आर्थिक भाषण दे डाला...घर के खर्चे..बच्चों को पालने के खर्चे..और महंगाई मे परिवार को इतने कम वेतन मे चलाने का भाषण ...जैसे जैसे भाषण अपने अंत की ओर चला..मोनू शुक्ला उदास होते चले गये
इस तरह किला फतह करने के बाद शुक्ला जी मन ही मन अपने आप को दाद दे रहे थे.... लेकिन वो भूल गए थे कि उन्होंने मोनू शुक्ला को जन्म दिया है – ....
सिर्फ एक हफ़्ते बाद – राम जाने कौन से गुप्त स्रोतों से –मोनू अपने पापा की सैलरी का एकदम सटीक आंकड़ा निकाल लाया।
शुक्ला जी सकते में आ गए... खून तो खौला नहीं, पर दिल ज़रूर काँप गया।
"ऐसी दिलेरी? ऐसा दुस्साहस? खैर मोनू शुक्ला जीत गये...
मौन रूप से २० रुपय महीना मोनू शुक्ला का जेबखर्च तय हुआ.......
कुछ दिनो तक तो ये २० रुपय मोनू को ठीक लगे पर जैसा की मैने बताया बालक का मन बढ़ रहा था.....
एक शाम दरवाज़े की घंटी बजी।
शुक्ला जी ने द्वार खोला, आगंतुकों को नमस्कार किया और आने का कारण पूछा।उत्तर मिला:"हमारी मोनू जी से मुलाकात हुई थी... वो पूछ रहे थे कि घर का रेट क्या होगा?"यह सुनकर शुक्ला जी कुछ क्षणों तक जड़वत खड़े रहे।
फिर दोनों को विदा किया।दरवाज़ा बंद कर गला साफ़ किया और पूरे मोहल्ले में गूंजती आवाज़ में पुकारा:"मोऽऽऽनूऽऽऽ... ओ मोनूऽऽऽ!"मोनू शुक्ला १४ के हो गये थे..
मोनू शुक्ला - 1
सन १९८१..... जुलाई का महीना था...अंतरिक्ष में ग्रह नक्षत्र की चाल मे भारी परिवर्तन हो रहा था..... काली रात थी..भयंकर बारिश और आंधी हो रही थी.....लोगों मे घबराहट थी....आम जनता परेशान थी..सब को लग रहा था की कुछ तो बड़ा होने वाला है....और हुआ भी...जी हाँ...इंदौर के एक कोने में शुक्ला परिवार मे प्रकट हुए...मोनू शुक्ला...
पिताजी शिक्षा विभाग मे अधिकारी...एकदम सरल सहज ....माताजी सुघड़ गृहणी.....
जैसे जैसे मोनू शुक्ला बड़े हो रहे थे उनका बाल्य काल का उत्पात देख लोग समझ नहीं पा रहे थे की इतने सरल परिवार में ये एक असुर कैसे भया...बहूत दिनो बाद कोई पुराने रिश्तेदार आए घर और बोले तो कमल कांत शुक्ला की कॉपी है...तब पता चला की भैया मोनू शुक्ला अपने दादाजी पर गये थे....उनकी कहानी फिर कभी...
दिन कट रहे थे ....मोहल्ले वाले मोनू शुक्ला को बड़ा होते देख रहे थे... शुक्लाजी के घर के बगल में गुप्ता परिवार था...सबसे बड़े गुप्ता जी ७० साल के रिटायर्ड बैंकर थे....मोहल्ले के बच्चों के बड़े दुश्मन.....मोनू और टीम जब भी गली क्रिकेट खेलती और ग़लती से बॉल गुप्तजी के द्वार पर आई तो उसका शहीद होना पक्का था...बड़े गुप्ता का यही एक मात्र दिन भर का टाइम पास था....
मोनू शुक्ला बहुत समय से गुप्ता जी से खार खाए बैठे थे...उमर ९-१० साल थी..शरीर कमजोर था....पर बदला तो बदला होवे है..
मोनू ने अपने बीते 2-3 सालों की गाढ़ी कमाई — कुल जमा 40-50 रुपये — एक ही रात में होम कर दी। ये पैसे कई नेक कामों में लग सकते थे... जैसे कैंडी, कॉमिक्स, या माचिस से पटाखा उड़ाना।
पर नहीं — मोनू ने चुना एक उच्च उद्देश्य।
रात करीब 9 बजे, मोहल्ले से गुजरते बैंड वालों को रोककर, अपनी पूरी पूंजी उनके हवाले कर दी — बस एक ही दरख्वास्त के साथ:
"रघुपति राघव राजा राम" की धुन १० -१५ मिनट नॉन स्टॉप गुप्ता जी के घर के सामने जमकर बजाना है!’"
...मोहल्ले वालों को लगा गुप्ता जी अल्लाह को प्यारे हो गये.....कुछ अति संवेदनशील महिलाओं ने रोने का कार्यक्रम चालू कर दिया.....मोहल्ले वाले बड़े गुप्ता के घर के सामने सफेद कपड़े मे जमा ही हो रहे थे की अपने बैंक मे कस्टमरों को देते हुए सीखी सारी गलियों का बैंड वालो पर प्रयोग करते हुए गुप्ता जी गुस्से मे काँपते दिखे....बैंड वाले फुर्र हो गये....
मोहल्ले वाले दुखी हो लौट गये...वो सब दुखी गुप्ताजी के जिंदा रह जाने से थे या फिर पूरी-बूँदी ना मिल पाने के कारण....ये राम ही जाने...
खैर बात तो खुलनी थी और खुली भी....मोनू शुक्ला के बदमाशी का ये नया स्तर था.....मोनू शुक्ला के सरल पापा अपने भविष्य की चिंता मे थे...
मोनू शुक्ला का जवान हो रहे थे.....
Thursday, June 26, 2025
कीका: महाराणा
जब अधिकांश राजपूत राजाओं ने अकबर के दर से मुग़लिया झंडे के नीचे अपना राज्य सौंप दिया..मेवाड़ बस एक अपवाद था..
अकबर के लिए ये प्रतिष्ठा का प्रश्न बन चुका था.....उसने बार-बार असफल कूटनीतिक प्रयास किए, अपने घाघ दरबारी जलाल ख़ान खोर्ची, फिर मानसिंह ,और उसके विफलता के बाद मानसिंह के पिता भगवानदास कछवाहा......महाराणा किसी भी तरह से झाँसे मे ना आए.... तो अकबर ने पुनः मुग़लिया सैन्यबल की विशाल शक्ति का प्रयोग कर मेवाड़ को अपने शासन मे लाने निर्णय लिया। वह यह भूल गया था कि मेवाड़ केवल भूगोल नहीं था — वह एक विचार था, जो बप्पा रावल, खुमाण, राणा सांगा जैसे महावीरों की परंपरा से संचित था।
राजपूतो का गौरव मेवाड़ बहूत ही सीमित भूभाग मे शेष रह गया था.....बप्पा रावल का शौर्य , और राणा सांगा के बाहुबल की धार से संचित मेवाड़ अब महाराणा उदयसिंह की दुर्बल रणनीति के कारण संघर्षशील थी...प्रजाजन और सैनिकों मे वैसा उत्साह नही था....मुगलों के डर से हर दिन जिए जा रहे थे...मेवाड़ और राजपूत एक नये नायक की प्रतीक्षा मे थे....९ मई १५४९ राजमाता जैवन्ताबाई के गर्भ ना केवल उनके प्रतीक्षा का अंत हुआ...बल्कि संपूर्ण भारत को कई सदियों का एक नायक...सिसोदिया कुलनायक...महानायक...महाराणा मिला....जब जन्म हुआ बालक प्रताप का...जो आज भी हमारे रक्त और हृदय में महाराणा प्रताप के नाम से हैं.....
हल्दीघाटी का युद्ध.....
अकबर ने अपने सबसे भरोसेमंद राजपूत सेनापति राजा मानसिंह को सेना की अगुवाई दी। मानसिंह की सेना में घुड़सवार, हाथी, तोपखाने, और असंख्य पैदल सैनिकों की भरमार थी। दूसरी ओर, राणा प्रताप के पास सीमित संसाधन, पर असीम शौर्य था।
किशोरावस्था से ही छोटे छोटे युद्ध का संचालन करते हुए..मेवाड़ के प्रजाजन में आशा जगाते हुए प्रताप बड़े हो रहे थे....ना केवल मेवाड़ प्रजा में अपितु वनवासी भिलो में भी अपने निश्छल प्रेम और मिलनसार व्यवहार से प्रताप अत्यंत ही लोक प्रिय थे...वनवासी भील प्रेम में उन्हे कीका अर्थात पुत्र कह के बुलाते थे....कुलीन पट रानीमाँ और लोकप्रियता के कारण भावियुवराज भी थे...
तीरंदाजी,तलवारबाजी मे वैसे तो उनका कोई सानी नही था...पर जब भाला की बात आती थी तो पृथ्वी पर उनके जैसा कोई दूज़ा न था....
सूर्य अस्ताचल की ओर बढ़ रहा था। हल्दीघाटी की घाटियों में हल्की-सी वीरानी छाई थी। अकबर का सेनापति—कुलघाती मानसिंह—अपने शिविर में बैठा मेवाड़ और महाराणा प्रताप को बंदी बनाने के स्वप्न में लीन था।
उधर, महाराणा प्रताप अपनी राजपूती सेना के साथ पर्वतीय आड़ों में घात लगाए बैठे थे। जहाँ मानसिंह को अनेक युद्धों का अनुभव था, वहीं प्रताप के पास थी—राजपूती शौर्य, निष्ठा और बलिदान की परंपरा। उसका साहस अनुभव से नहीं, आत्मबल से उपजा था।
मुगलिया सेना मैदान की ओर से धीरे-धीरे चढ़ाई कर रही थी, और मेवाड़ी वीर चट्टानों पर ज्यों-के-त्यों स्थिर खड़े थे। राणा का स्पष्ट आदेश था—*“युद्ध हमारी शर्तों पर होगा, हमारे समय पर और हमारे स्थान पर।”*
मेवाड़ी सामंत और युवा राजपूत, सामने शत्रु को देख, रक्त में उबाल लिए चुपचाप प्रतीक्षा कर रहे थे। उनका क्रोध दबा हुआ ज्वालामुखी था—जो कभी भी फट सकता था।
उनके हृदय में आज भी वह दुःस्वप्न जीवित था, जब चित्तौड़ की दुर्ग विजय के पश्चात अकबर ने 30,000 निर्दोष नागरिकों की हत्या का आदेश दिया था। न तो पकड़े गए थे, न ही राजकोष मिला था, बस शह और मात का वह अमानवीय दाग पीछे छूट गया था।
आज भी वह रक्तरंजित स्मृति मेवाड़ी युवाओं को हर रात बेचैन कर देती थी।
एक युवा राजपूत सामंत, जिसकी आँखों में अपने नगरवासियों की बलिदानी छवि तैर रही थी, का धैर्य टूट गया।
उसने जब सामने मुग़लिया झंडा देखा, तो उसकी आँखों में लपटें भड़क उठीं।
"अब और प्रतीक्षा नहीं!" वह गरजा।
और अपनी टुकड़ी सहित वो शेर की भाँति मैदान की ओर झपटा—जैसे एक गरजता सिंह दल भेड़ियों के झुंड पर धावा बोल दे।
हल्दीघाटी की घाटियाँ थर्रा उठीं।
घोड़े हिनहिनाए, तलवारें चमकीं, भाले और बाण गगन चीरने लगे।मुग़लिया सेना सहम गई थी।
उस एक वीर की हुँकार से पूरे युद्ध का रुख बदल गया।एक-एक कर मेवाड़ी टुकड़ियाँ पहाड़ों से उतर आईं।
घोड़े, पैदल सैनिक, हाथी—सब युद्ध में कूद पड़े।चारों ओर तलवारें चमकने लगीं, भाले चलने लगे, तीरों की वर्षा होने लगी।
मुग़लिया सेना सहम गई थी।
ग़लती हो चुकी थी,अब युद्ध टालना संभव नहीं - राणा स्वयं पीछे नहीं रह सकते थे।
फिर सिंह ने भी सिंहनाद ...
कालों का काल- महाकाल , मेवाड़ का महावीर—महाराणा प्रताप स्वयं हल्दीघाटी की रणभूमि में चेतक पर सवार होकर उतर चुके थे।
एकलिंग नाथ की जय..हर हर महादेव.....का मेवाडी उद्घोष
अल्लाह हू अकबर का मुग़लिया घोष.....हल्दी घाटी की हवओ में तैर रहा था....
रजपूती तलवारे मुग़लिया सेना की ऐसे काट रही थी जैसे किसान खेतो से पके धान की बालियां उतार रहा हो..
इतने युद्ध लड़ने वाला मानसिंह भी हतप्रभ था.... रणभूमि के हर कोने में प्रताप थे....जहाँ नजर जाए वहाँ चेतक और महाराणा
राणा प्रताप की भाला या स्वयं प्रताप की बिजली सी चमकती तलवार थी.... सीमित संख्या की मेवाडी सेना असीमित मुग़लिया सेना से लोहा ले रही थी...प्रताप के सामने आने वाला हर योद्धा अपना जीवन का अंतिम चेहरा देख सीधे रणचंडी की यज्ञ मे खुद की आहुति दे रहा था...प्रताप की तलवार और भाले के सम्मुख नरमुंडों का पहाड़ पड़ा हुआ था...
मानसिंह इस अभियान के पूर्व जब अकबर का संधिपत्र लाया था ,तब महाराणा ने बस उसे एक सेनापति सा सम्मान दिया पर मुगलों से संबंध रखने के कारण भोज मे सम्मिलित ना हो तिरिस्कृत किया.....मानसिंह के मन मे तिरस्कार और अपमान की ज्वाला धधक रही थी....
..हाथी के हौदे मे छुपे मानसिंह ने महाराणा की और कूच किया... रजपूती प्रेम और मेवाड़ सम्मान की ज्वाला लिए जब महाराणा ने मानसिंह को अपनी ओर आता देखा तोतो मानो वर्षों का धैर्य बिखर गया
चेतक की रफ़्तार बाज से भी तेज हो गई.....और पल भर मे राणा के चेतक का टाप मानसिंह के हाथी की माथे पर था..
ऐसा साहस, ऐसा घोड़ा, ऐसा योद्धा —ना कभी मुग़लों ने देखा था,ना सुना था।.....
हौदे मे बैठा मानसिंह हिल गया उपर से नीचे तक...पल भर बाद जब आँखे खुली तो हाथी को रणभूमि से भागता पाया..महावत का रक्त तो प्रताप के भाले ने पी लिया था.....मानसिंह के सुरक्षा दस्ते ने
राणा के हमले को सम्हाला...चेतक की गति और .राणा का महाकौशल देखते बनता था...राणा की तलवार और भाला शत्रु के लहू से हल्दी घाटी की पीली मिट्टी लाल कर रहे थे....
राणा मानसिंह का मस्तक से अपनी प्यास बुझाना चाहते थे......चेतक फिर से मानसिंह के हाथी पर हमले को तैयार था....पर इस बार हाथी पर बँधी तलवार से चेतक घायल हुआ..और थोड़ा काम मानसिंह के सुरक्षा दस्ते ने किया.... चेतक की गति कम हुई..
युद्ध आरंभ हुए पहर बीत चुका था और अब मेवाडी सामंतों को समझ मे आने लगा की क्यूँ महाराणा शत्रुदल से पर्वतीय क्षेत्र मे ही लड़ने का आदेश दिए थे.....
संख्या शौर्य पर भारी पड़ने लगी.....एक एक रजपूती वीर कई मुग़लिया सैनिक से लड़ रहा था......और वीरगति को प्राप्त हो रहा था....
इसी बीच घायल चेतक और फिर महाराणा भी इसी क्रम मे घायल हो गये..... मेवाडी वीर झाला मान ने जैसे ही ये दृश्य देखा...वह दौड़ पड़ा महाराणा की ओर....और फिर महाराणा का क्षत्र और पताका अपने हाथ ले लिया....घायल महाराणा बस ये देखते रह गये....
मेवाडी सुरक्षा दल राणा को सुरक्षित स्थान पर ले जाने लगा....इधर झाला ने ऐसा कौशल दिखलाया की मुगल सेना उन्हे राणा के धोके में उलझ कर रह गई....लड़ते लड़ते झाला वीरगति को प्राप्त हुए...
उधर राणा सुरक्षित अपने दुर्ग तक पंहुच गये और साथ थे मुगलों की तरफ जा मिले उनके छोटे भाई शक्ति सिंह.. घायल राणा को देख शक्ति सिंह का सिसोदिया रक्त खौल गया..आँखे खुली तो भातृ प्रेम जाग गया.....राणा घायल थे...सैनिकों का मनोबल हतोत्साहित था.... गोगुन्दा के कुछ किले सहित कुछ और इलाके मुगल सेना ने कब्ज़े मे लिए...
हल्दीघाटी यूँ तो देखने मे भले ही मुगलिया जीत लगे ..पर ऐसा नही था....
युद्ध एक मकसद से लड़ा जाता है..जो जब तक पूरा ना हो उसे जीत नही माना जाता....राणा का हाथ ना लगने से मेवाड़ के मुगल सलतनत मे मिलने का उद्देश्य पूरा ना हो सका था...मानसिंग लौटा तो ना उसका ऐसा स्वागत हुआ जैसा हर बार उसके युद्ध के लौटने पर होता था बल्कि २ साल के लिए राजदरबार मे प्रवेश निषेध का दंड मिला...
कुछ किले और जो चौकियाँ राणा से छीन गई थी.....राणा और उनकी सेना ने उन पर फिर से कब्जा कर लिया....
अकबर ने इतने असफल प्रयासों के बाद फिर अपने अनेक सिपहसालार भेजे शाहबाज ख़ान के नेतृत्व में..अब तक महाराणा निपुण हो चुके थे.....कुछ किले देकर मुगल सेनानायक को जीत अहसास दिलाया जाता और फिर अपने छापामार अभियान से ऐसा खौफनाक अंजाम देते की मुगल सेना की रूहें तक कांप उठती और वो किले - थाने छोड़ उल्टे पैर भाग जाते...
बहलोल खान की चौकी दिवेर में थी .. बहलोल खान 7.8 इंच लंबा राक्षस था जो एक भी लड़ाई नहीं हारा था ..शरिस ऐसा की घोड़ा छोटा लगता ..अतिभयानक....पर आमने सामने की लड़ाई मे महाराणा प्रताप ने एक ही तलवार के वार से बहलोल खान को घोड़े सहित काटा डाला...मुगल सेना के मान मे उस चमकती तलवार का खौफ फिर कभी सोना ना सका...
अकबर ने मेवाड़ की तरफ देखना बंद कर दिया....और धीरे धीरे महाराणा और भी शक्तिशाली होते गये और अपने सारे किलों पर पुनः अधिकार कर मेवाड़ पर शासन किया....
" जब याद करूँ थारो महाराणा मान अभिमानी हो जावे है"
Friday, November 8, 2024
हमारी दीपावली
तो भीया बन गई दीवाली एक दिन वाली ...फोड़ लिए पटाखे और खा लिए बाहर से खरीदी मिठाई....मन हो तो चलो आज तुम्हें 90 के दशक की दीवाली की सैर कराता हूँ।
Rahul Pathak
Saturday, August 17, 2024
छावा : संभाजी जी
मैं कलश . कवि कलश... धर्म प्रिय ,न्याय प्रिय ,रणधीर के साथ ज्ञान के साक्षात अवतार प्रभु संभाजी जी महाराज का मित्र..सुनिए हमारी एक छोटी कहानी..
मैने संभाजी को पहली बार देखा जब शिवाजी महराज औरंगजेब के द्वारा दिए शांति प्रस्ताव के छल मे आगरा के किले में नजरबंद थे....शिवाजी महाराज... साक्षात शंभू .... शरीर ऐसा की जैसे स्वयं अर्जुन ..नरश्रेष्ठ. .और संभाजी जैसे भगवान कार्तिकेय..माँ अंबे के त्रिशूल से रचित महाकाव्य के सर्ग जैसे संभाजी..
शिवाजी कैसे भी क़ैद से आज़ाद होने को व्यग्र थे....उनके मन मे इस बारे मे मंथन जारी था...उन्होंने मुझे और मेरे परिचित परमानंद जी को संभाजी के सुरक्षा का दायित्व दिया..शिवाजी जानते थे की शिवाजी और संभाजी दोनो का साथ मे आगरा से निकलना लगभग नामुमकिन था.. अपने गले में कौड़ियों की माला पर हाथ फेरते .. ..संभाजी महाराज से क्षत्रपति ने कहा था..." जल्द मिलेंगे संभा ... ध्यान रखना "
कुछ दिनों के बाद खबर मिली शिवाजी महाराज शाही सेना को चकमा दे मराठा साम्राज्य सकुशल पंहुच गये ... हम सब ने भी सिंह के शावक को भी छिपतेछिपाते कुछ माह में रायगढ़ लौटा दिया....इस बीच संभाजी के साथ बिताए हर पल मेरे लिए धरोहर थे...
कई साल बीत गये...औरंगजेब इस्लाम का सहारा ले मुगल साम्राज्य का विस्तार कर रहा था. .गैर इस्लामिक प्रजा पर प्रतिदिन अत्याचार बढ़ते जा रहे थे.... ..धर्मगुरुओं का निर्ममतापूर्वक हत्या.. जजिया...तलवार के बल पर धर्म परिवर्तन...मंदिरो , मूर्तियों और गर्भगृह का विनाश..हिंद महिलाओं का यौन उत्पीड़न...
अपनी आँखो से मैने मथुरा के मंदिर का विध्वंस देखा....उत्तर मे चारो तरफ त्राहिमाम मचा हुआ था....औरंगजेब के मुगल सिपहसालार हिंदू जनता तलवार की नोक पर विधर्मी बना रहे थे...इस्लाम को ना कहने वालों के लिए बस मृत्यु ही रास्ता थी..
उधर दख्खिन मे शिवाजी मजबूत होते जा रहे थे.. ..एकमात्र हिंदू राष्ट्र का उदय हो रहा था....औरंगजेब के सारे हथकंडे पैंतरे असफल रहे थे...मराठा सेना ने नाक मे दम कर रहा था...मैं भी एक आशा के साथ दख्खिन की तरफ कूच किया
इधरसंभाजी युवराज हो गये थे..लोकप्रिय युवराज जैसे थे युवराज कौशल नंदन श्रीराम... मैने युवराज संभाजी महाराज को देखा जब वह रायगढ़ के समीप एक शिव मंदिर मे बैठे आस पास के गाँव वालो की विनती सुन रहे थे ...एकदम वीरता की सजीव मूर्ति....बलिष्ठ बाहू ...सुदृढ़ सीना...सुकोमल चेहरा..घनी मूँछे ..युवराज ... .मैने आवाज़ लगाई "शंभूऊऊउउ" . .संभाजी ने उठ कर मुझे गले लगा लिया...हमारा भावुक मिलन था कई वर्षो के बाद..
महाराज शिवाजी माँ अंबे की गोद मे लौट चुके थे...अब युवराज नये छत्रपति थे.... संभाजी महराज के नेतृत्व मे मैसूर प्रदेश ,आदिलाबाद ..और कई किले जीत लिए गये ...हर अभियान पर विजय पताका फहराई जा रही थी...महराज संभाजी का यश बढ़ रहा था
शिवाजी से हर बार मत खाए कुटिल औरंगजेब ने एक विशेष अभियान के तहत विशाल सेना मावल खंड के लिए भेजी....अभियान था संभाजी और मराठा साम्राज्य का पतन
धोखा
महराज सवेश्वर के पास एक मंदिर मे अपने कुछ सेनानायकों संग विश्राम कर रहे थे..........मराठा मीरजाफर गणोजी ने घर का भेद दिया था..
राज्य से गद्दारी की थी....सुबह की लाली ही फूटी थी ..और नीरव शांति को भंग करते हुए जोरो की जंग जारी थी. मुगल फौज महाराज संभाजी को घेरे हुई थी....सेनापति म्हलोजी बाबा तलवार से दीवार बने संभू और इख्लास ख़ान की मुगल फौज के बीच खड़े थे....मराठे हर हर महादेव का जयकारा कर रहे थे... साथ मे मुगलिया अल्लाह हू अकबर से गगन गूँज रहा था...म्हलोजी बाबा रणचंडी को अपनी तलवार से मुग़लिया नरमुंडो की आहुति दे रहे थे
मैं शंभूराजे के दाहिने हाथ पर रक्षा पंक्ति मे था....महाराज संभाजी मुगल फौज को गाजर मूली की तरह काट रहे थे....अपने घोड़े चन्द्रावत पर सवार साक्षात काल का रूप बने हुए थे...पर मुगल सेना जैसे टिड्डो का फ़ौज़..ख़तम होने होने का नाम ही ले रही थी... श्वानो मे सिंह फँस गया हो ऐसे ही महराज मुगलों के बीच फँसे हुए थे... मुगल फ़ौज़ के सैनिकों ने हर तरफ से महाराज को घेर लिया..हज़ारो के मुगल सेना से मुट्ठी भर मावले सैनिक जूझ रहे थे...म्हलोजी बाबा का तेग भी सैकड़ों की मुग़लिया तादाद के सामने फीका होता जा रहा था... अनेको वार से घायल महावीर बुजुर्ग सेनापति ने आखिरकार अंबे के चरणों मे अपना स्थान सुरक्षित किया ... एक बान मेरे दाहिने हाथ पर लगा और मैं घायल अपने घोड़े से "महाराज" चीत्कार करता नीचे जा गिरा......म्हलोजी बाबा का दुख खत्म नही हुआ था उस पर "महाराज" की मेरी एक करुण पुकार ने संभाजी तलवार की तेज़ी थोड़ी कम कर दिया..संभुराजे ने अगले पल अपने आपको टिडिदल मे घिरा पाया....तलवार चलाने की जगह भी नही बची थे.. महराज क़ैद मे थे..साथ मे था मैं ..
आज नराधाम औरंगजेब के जीवन का सबसे खुशी का दिन था.... दक्खिन जीतने का स्वप्न जीवंत हो उठा... सारा हिन्दुस्तान उसे इस्लाम के झंडे के नीचे नज़र आने लगा था जिस राह के रोड़ा रहे थे साक्षात शंभू अवतार छत्रपति शिवाजी महाराज और मराठे थे..और थे शिवाजी सुता संभाजी
इख्लास ख़ान अपने मुगल फ़ौज़िया पिता फ़ौजदार मुकर्रब ख़ान संग कैदी संभाजी को ले जल्दी जल्दी निकल पड़ा था कन्हि सुरक्षित दूरी के लिए ताकि अपनी सफलता का जश्न मना सके..... क्यूंकी मावल प्रदेश के सैनिको का डर था...मराठा सेना का छापा वार युद्ध प्रसिद्ध था..शिवाजी के लड़ाके अचानक प्रकट होते और काम करके ऐसे गायब होते की ढूँढे ना मिलते..मुग़लिया सरदार जानता था की मावले अपने महराज के लिए जी जान लगा देंगे
जैसे तैसे महाराज को ले मुगल सेना पहुंच गई बहादुर गढ़ छावनी मे..जान्हा साक्षात था नरपिशाच औरंगजेब जिसने सत्ता के लिए अपने भाइयों और पिता के कत्ल से भी परहेज नही किया था..और अपने धर्म के नाम पर अनगिनत लोगों की हत्या और अंग भंग...महाराज को उनके सबसे बड़े कर्म.."अपने धर्म की रक्षा" के लिए अपने हाथ से वीभत्स मृत्युदंड देने को उतावला था....
उस नीच आलमगीर ने फरमान जारी किया मावले राजवंशी इन "कैदियों" का जुलूस निकाला जाए और बहादुर गढ़ किले तक लाया जाए..महाराज संभाजी और मेरे हाथ बाँध कर और मसखरे जैसे दिखने वाले कपड़े पहना दिए ...चारो तरफ हजारों की भीड़ थी.. जो जोर जोर चिल्ला रहे थे...बहुत से ऐसे थे जिन्होने ने अभी अभी कलमा पढ़ा था...और अपने आप को ज्यादा धर्म प्रेमी दिखाने मे उत्साहित हो कंकड़ और अपशब्दों की बौछार किए हुए थे..शोर से हमारी कान फटे जा रहे थे...काफ़िर को मारो...काफ़िर को खिचो......कई मर्माहत करती गालियाँ......
पहले तो हमे रस्सी से बाँध के पैदल घसीटा गया ..कई बार गिरने जगह जगह से कपड़े फट गये.....जगह जगह शरीर पर खुरचने से रक्त आने लगा था ...कई मन की दूरी हमे घसीटते हुए गये....सारा शरीर छिल गया था फिर भी शक्ति संचित करके हम दोनो फिर खड़े हो उठे.. इस बार बची खुची शक्ति लगाकर शंभुराजे ने रस्सी खींचने वालो को आगे ना बढ़ने में लगा दिया... जब सैनिको से ना देखा की अब ये ऐसे नही हिलेंगे और उन्हे और ज़ोर लगाना होगा तो ....हमे को उठा के ऊँट पर टांग दिया गया....और चारो तरफ से कोडो की वर्षा हो रही थे..हमारे दर्द की सीमा नहीं थी...शरीर का हर अंग रक्त वमन कर रहा था...
जिन शंभू महराज के सामने जनता शीश नवाती थे.. जो शरीर रेशम के वस्त्र और सोने के आभूषण से सुसज्जित रहते थे उसकी ऐसा दुर्दशा देख के मन रो उठा मेरा..महराज ने मुझे रोता देख धीमे आवाज़ मे पूछा .." क्यूँ रोते हो कलश ...क्यूँ .. अपनी शक्ति बचा के रखो कविराज" और ऐसा कहते हुए स्वयं बेसुध हो बैठे...मेरी भी आँखें बंद होने लगी..मूर्छा सी छा गई....लोगों का हुजूम और काफिरों को मारो के नारे के बीच हम आगे बढ़ रहे थे...
सरेआम हमे मार खाते सहते कई घंटे बीत चुके थे.....और दर्द की परकाष्ठा से महराज संग मैं कलश बेहोश हो गये...
हमारी आँखे खुली वापस आलम गीर के दरबार में...सामने मऩहुश औरंगजेब बैठा नमाज़ पढ़ रहा था.... भद्दा चेहरा बूढ़ा परंतु कुटिल ....सामने थे हमारे महराज ...निडर निर्भीक स्वयं शंभू के पुत्र महाराज संभाजी.....शरीर का पोर पोर दर्द से डूबा था...तथापि महाराज ने दरबार, औरंगजेब और सभी सिपहसालारों को अनदेखा करते हुए कहा... कविराज कहो क्या कहते हो हमे इस दरबार मे देख के.....और मेरा कवि मान फुसफुसा उठा..
"राजन तुम हो साँचे ,खूब लड़े तुम जंग,
तेज तुम्हारा देख के भौचक है औरंग"
दरबार चालू हुआ ...सारे दरबार के सामने ...महराज से उनके शाही दरबार के गुप्तचरों के बारे मे...रायगढ़ के खजाने के बारे मे ..पूछा गया..महराज एकदम दृढ़ शिला के जैसे चुपचाप बैठे रहे.....मुझे भी कभी जागीर का लोभ दिया.. कभी सोने चांदी आभूषण के साथ जान बख्शने का लोभ दिया...पर यह शरीर तो अब संभाजी का था...धर्म का था....
अंत मे हमें इस्लाम कबूल करने को कहा गया... महराज का उत्तर सभा के पटाक्षेप के लिए काफ़ी था..
.
संभा जी ने गरजते हुए औरंगजेब की आँखो मे आँखे डाल के कहा.... " अधम मुगल सम्राट जीवन के किसी भी क्षण पर मुझे ये मंजूर नही..चाहे तन पर शीश रहे ना रहे... तुम पूरे मुगल राज्य के आभूषण स्वर्ण का प्रस्ताव रखो या फिर आलमगीर तुम खुद क्यूँ ना अपनी पुत्री जिन्तुन्निसा का विवाह ही क्यू ना मुझसे करवा दो.. ये शीश केवल माँ अंबे के चरणों मे ही झुकेगा..इस्लाम कतई मंजूर नही"
आलमगिर का बूढ़ा रक्त काफ़ी देर तक उबलता रहा होगा.....और नतीजा था हमे कालकोठरी....
यातना
हमारा दंड़पत्र आ चुका था.....औरंगजेब का आदेश था वाचाल जिव्हा को काटने का और आंखों की तेज को बुझाने का..... हर दंड महाराज को दो बार भोगना था..क्यूंकी आदेश के अनुसार हर पहला दंड पहले मुझे को मिलना था फिर महाराज को...
सिपहसालार रूहल्ला ख़ान ने आदेश का तामील किया...पत्थर दिल जल्लादों को चुना गया....लोहे की संड़सी और अंगीठी आ गई थी...काले कलूटे हबशी जल्लादों ने मेरा जबड़ा पकड़ा.. पर मैं केवल कवि ही तो नही था..एक लड़ाका भी था....२-३ हबशी के बस का नहीं था....कुछ और जल्लाद आगे बढ़े और मेरा मुँह खोल दिया.....जिव्हा से विदा लेने का समय आ गया ये जान के मैने ज़ोर से अंतिम बार अपने स्वामी को प्रणाम कहा....."स्वामी प्रणाम ......स्वामी प्रणाम.... स्वामी प्रणाम जय भवानी जय चंडी माता" और फिर एक ही झटके मे हबशियों ने मेरी जीभ खिच के ऐसा वार किया की जिभा का टुकड़ा दूर जमीन मे जा गिरा...और २-३ दाँत बाहर आ गये...पूरा शरीर अति वेदना से कांप उठा..मुँह से खून का फ़ौवारा फुट पड़ा ..
महाराज ने बँधे हुए ये दृश्य देखा एक धीमी पुकार लगाई.."कविराज" ऐसा लगा जैसे अपने बाल राजा को दुलार पूर्वक बुला रहे हैं....मैं अधमरा सा होता ज़मीन पर गिर पड़ा
मेरे दर्द का अन्त नहीं था...मुझे अपने महराज का वोही हाल देखना था जो अभी मेरा हुआ था..१०-१५ हबशियों ने महराज को पकड़ ऐसा ज़ोर लगाया की मूह अपने आप खुल आया ..एक हबशी ने संड़सी से जिवहा को पकड़ कर खींचा और फिर ला इलाह चिल्लाते हुए एक ज़ोर का वार किया ...मुझे महाराज के मुख से आवाज तक नही सुनाई दी ..केवल एक रक्त धारा मुँह से बह रही थी....वो मुख जो हर वक्त जग्दम्बे जग्दम्बे का जप करता था.... वोही क्षत्रीय कुलावंतास श्रीमान माहराज हिंदुपद गो ब्राह्मण प्रतिपालक संभाजी महराज का मुख रक्त वमन कर रहा था....ये दृश्य देख मेरी आत्मा भी चीत्कार मारती हुई रो पड़ी...
हमारे दर्द का अंत नहीं था....अब दंड का दूसरा भाग चालू हुआ...सामने गर्म सलाखें लिए जल्लाद को देख मैं समझ गया की अब आँखो की बारी है..समय कम था...मैने संभाजी महाराज के लहूलुहान मुख को निहार का अपने चित्त कोष को भरने लगा......ज्यों ज्यों जल्लाद सलाखें लिए आगे बढ़े मैं अपनी आखे और बड़ी कर महाराज का मुख निहारता गया....चर्र चर्र और कुछ ही पलों मे दोनों सलाखें मेरी आँखों की पुतलियों को भेदते हुए निकल गई...मेरे मुँह कटी हुई जिव्हा के कारण केवल आं आं शब्द फुट पड़ा....
इस बार महाराज की स्पष्ट आवाज़ मेरे कानो मे आई.." मृत्यु से ना डरो कविश्रेष्ठ" .. लगा असीम दर्द मे भी जैसे औषधि के छींटे आ पड़े
आगे होने वाली घटना मेरे कानो ने देखी ...महराज हर दंड दो बार झेल रहे थे...एक बार मेरा दुख ..फिरउन पर खुद बीतता हुआ"
चारो तरफ कोलाहल था पागल नृशंश जनता इस दंड के मज़े ले रही थी..."अल्लाह हू अकबर ....काफ़िर काफ़िर "का नारा सर्वत्र था..
तभी मेरे कानो ने फिर से वही चर्र चर्र की आवाज सुनी....मतलब साफ था की सूर्यबिंब समान संभाजी भोसले महाराज नेत्रहीन हो चुके हैं...ग्राम सलाखें से जलते मांस की गंध मेरे नथुनों मे घुस गये...आं आं कहते महराज का स्वर मेरी पीड़ा को और बढ़ा रहा थे..हमारे नाखून बाल तक उखाड़ लिए गये.... कोलाहल धीरे धीरे शांत हो रहा था..जल्लाद भी हमें सताते सताते शायद थक गये थे...दर्द से हम दोनो की आं आं की निकलती ध्वनि धीर धीरे सब शांत होने लगा...
दर्द से बिलखता मेरा शरीर अपने बचपन से होता हुआ महराज के संग अपनी यादों मे जाने लगा था.......मुझे यकीन था की महराज भी अपने बचपन मे आनी जिजाऊ ,अपनी धाराऊ..आबा साहब.. पत्नी यशुदेवी.. भाई राजाराम ..अपने बालराजा और अपनी बिटिया की यादों मे गुम होंगे..
हम दोनो रह रह कर जिव्हा के अवशिष्ट भाग और जलते नेत्रो मे असीम पीड़ा से व्याकुल थे....मूह से निकलती थी केवल आंआं की आवाज़ से..और उसी आं आं की भाषा मे महराज पीड़ा पर मलहम लगाते और मैं उनके...
क़ैद होने के बाद से हमने अन्न का एक भी दाना नही ग्रहण किया था...हमारे भूखे प्यासे शरीर को ये पीड़ा सहते आठ से नौ दिन हो गये थे...छावनी के कारागार में मुर्गे की बांग से हम दिन का पता चलता...बस आं आं की आवाज़ थी जिसे सुन के हमे पता लगता था की अभी हम जिंदा हैं...
नौंवा दिन उदित हुआ..और आलमगीर नया दंड चालू हुआ...इख्लाख़ ख़ान जल्लादों की नई फ़ौज़ लाया और ज़ोर से चिल्लाया ..
खाल छिल दो इन दोनो काफिरों की.....जैसे कद्दूकस के खोपरा रेता जाता है..वैसे ही हमारे शरीर को कद्दूकस किया जाने लगा..
छुरो से छिलते शरीर से दर्द के कारण आं आं निकलना भी बंद हो गया....हम दोनो अपने वेदना को दबाए अपने खाल खिचवा लिए...पर तभी एक नया आदेश आया...नमक पानी छिड़को इन हराम जादो पर..तांबे की चिलमिचिया हिली और नमक पानी के गरम फुवारों से हमरा शरीर दहल गया.....वापस से दोनों के मूह से आं आं आं की ध्वनि फुट पड़ी...भीषण यातना पूर्ण दंड देख तमाशबीन कोलाहल मचाते रहे. धीरे.. धीरे शोर थम गया...हमारी वेदना बस हम ही जान सकते थे...ऐसी वेदना की मृत्यु भी उस वेदना के आगे मृत्यु भी सुखदायी लगे
उपर आकाश नीला था की काला...अभी दिन था की रात ...हम दोनो बंदी इस समय की सीमा से दूर जा चुके थे...
हमरी आँखे निकालने के बाद चलती यातना का आज १२वाँ दिन था....मेरा अंत नज़दीक था..मेरी वेदना चरम सीमा लाँघ चुकी थी ...बस प्राण छूटने को थे..मैने "प्रणाम... स्वामी को मेरा प्रणाम " कहा बदले मे गले से बस आं आं की आवाज़ फूटी ..महराज ने भी आं आं कहके उत्तर दिए...जैसे कह रहे हों ..ना कविराज मेरे से पहले ना जाना...पर महाराज की ये अंतिम आज्ञा पर मेरा अधिकार नही था..महाराज की लगातार आं आं की आवाज़ लगा मुझे राक रहे थे...पर काल पर मेरा अधिकार ना था...आं आं कहते महराज पता नही मुझसे क्या कहना चाहते थे...आं आं की उनकी लोरी
सुनता मैं जगदम्बिका की गोद मे जा बैठा...
ठीक से याद नही पेर शायद ठीक एक दिन बाद ....मैने देख के मुझे गोद मे लिए माँ अंबे अपने अपने हाथों को फैला ..दूर किसी विशिष्ट के आगमन और स्वागत हेतु जल्दी जल्दी चली जा रहीं हैं.. ..... सामने थे मेरे महराज. मेरे प्रभु...श्रीमंत महाराज छत्रपति संभाजी...अपने कौड़ियों की माला फेरते जगदंबे जगदंबे कहते माँ अंबे की गोद मे आ समाए...
उपसंहार
मराठा सूर्य अस्त तो हुआ पर संभाजी की शहादत के एक लौ से.लोग जागने लगे ..शाही सेना से हिंदू किनारा करने लगे.... इस्लाम परस्त बूढ़े औरंगजेब के हाथ से भारत फिसलने लगा.