Friday, November 12, 2010

तुम बड़ी ड्रामेबाज हो

इस कविता के समस्त पात्र काल्पनिक एवम् सत्य है......ये कविता निजी नही...
अपितु सभी की जिंदगी मे सामान्यता घटित होने वाली है......

रोकती हो मुझे
हर पल
हर वक़्त
फिर अकेले मे
खुद ही आ कर
गले लग जाती
क्यों?
कोई जवाब नही है ना!
सच मे तुम कितनी बड़ी ड्रामेबाज हो.

कहती हो
की तुमसे प्यार नही करता
तुम्हारी
कोई बात नही सुनता
और जब फिर
चुपचाप
करता हू प्यार
तो छिटक कर भाग जाती हो
कहते हुए---पागल
सच तुम कितनी बड़ी ड्रामेबाज हो.

देखता हू
जब सब के सामने
तुम्हे
तो आँखे तरेर कर
धमकाती हो
और करते ही मेरे
आँखे नीचे
अपनी सहेली को
के साथ
खिलखिलाती हो
जानता हू सबकुछ
दिखाती हो की दीवाना है तुम्हारा
और जब मै कहता हू यही बात
तो कह कर - झूठे
क्यों मुस्कुराती हो
सच मे तुम कितनी बड़ी ड्रामेबाज हो.

देखती  हो कनखियो
से मुझे
फिर आँखो से पास बुलाती
 आने पर
पूछती हो --क्या है
कहो..
जनता हू
क्या सुनना चाहती हो
और जब कहता हू
कानो मे तुम्हारे
वही बात
तो कहती हुई ---धत
शर्मा जाती हो...
सच मे तुम कितनी बड़ी ड्रामेबाज हो.

कहती हो मुझे हर वक़्त
नौटंकी
तो तुम क्या हो..
जो
बिन बात रूठती हो
फिर आप ही मान जाती हो
हंसते-२ रोती हो
रोते-2 हँसती हो
ना-ना करके ही
मेरी बाते
मान जाती हो
बच्चो जैसे
ज़िद करी हो
तो कभी
बडो जैसे समझाती हो
ये बिल्कुल सच है जाना
की तुम बहुत बड़ी ड्रामेबाज हो.

2 comments:

  1. Graduation ki to Likh Diye...... Post Graduation ki Likhne se tumm Darte ho na.....Tumm Rahul Kitne DrameBaaz.... ho na......!!!! Great Bhai....!!! Lekin abhi tak Apni Sabse acchi Rachna Likhi hi nahi.....!!! Me Jo Nahi Mila....:-)...

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  2. Mere Post Graduation ka pyar to tum hi the vivek.....per GAY per kavita nahi likhi jati..hehehe..love u bro :D

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