Monday, October 24, 2011

तेरे नाम


एक बात
तेरे साथ
तेरे ख्वाब
मेरे साथ
एक रात
तेरे साथ
मेरी दीपावली


एक गीत
तेरे संग
एक प्रीत
तेरे संग
हर एक रंग
तेरे संग
मेरी होली

एक हँसी
तेरे नाम
एक खुशी
तेरे नाम
एक चाँद
तेरे नाम
मेरी ईद

Thursday, August 18, 2011

जिंदा हूँ मैं


 मेरे जेब मे थे
बस १० रुपय
और तूने चुकाया था
१०० रुपय का वो उधार
जो तूने कभी लिया ही नही
मेरे जेब मे थे
बस १० रुपय
और तूने ज़िद करके
पानी पूरी खाया था
और दोनों
ही बार मैने तुझे
बड़ी वाली गाली दी थी

कई बार पिए हम
साथ में
तेरी कॉलेज वाली
के बर्थ डे पर
तेरी पहली वाली की शादी पर
तेरे कॅंपस प्लेसमेंट पर
साला रात भर पीते
दिन भर औंकते
उनसे बढ़ कर आज भी
कोई पल नही
आज भी कोई पार्टी नही
सच मे भाई......

जिंदगी के बहुत सारे
पल अमर कर दिए
विल्स गोल्डफ्लेक
के धुओं मे...
तेरे साथ...
गुमटीयों मे

मेरी उससे भी ज़्यादा
तू ही याद आता है मुझे

साला जब पी के बोलता है तू
आई लव यू ब्रो
जब टल्ली मे बोलता है
आई मिस यू ब्रो
लगता है की
जिंदा हूँ मैं

Saturday, August 13, 2011

चाहिए एक और जे. पी.

देश के विकास का
विधान हमको चाहिए
भ्रष्टाचार के लिए मौत
का प्रावधान
हमको चाहिए
देश का लूटा
हर एक समान
हमको चाहिए

काले धन की पाई पाई
का हिसाब हमको चाहिए
फाँसी पर लटकते
अफ़ज़ल कसाब हमको चाहिए
हाँ चाहिए कश्मीर एकछत्र
सिंध पंजाब पूरा चाहिए

देश मे राष्ट्रीयता की
एक आँधी
हमको चाहिए
हाँ चाहिए एक और जे. पी.
मोहन वाला गाँधी
हमको चाहिये.....

Sunday, July 31, 2011

बिटिया

बहुत दिनों बाद
भीगी थी ये आँखे
तेरे आने की खुशी में
तुझे देख कर
तू मेरी नन्ही परी

मेरा दिल गाता  था
जब तू किलकती
मुस्कुराती
मेरी आँखे भर जाती थी
जब अपने नन्हे हान्थो से
मेरी मूँछे नाक छूती
गाल सहलाती

जब घुटनो के बल
चलती,
मेरे पास आती
मेरी गोद में खेलती
सोती समाती
मुझे बातें करती
तुतलाती

तू लता सी
बढ़ती
फ्राक से
सलवार कमीज़ तक
पल में पहुचती

बदलते रिश्ते
तू बनती माँ मेरी

ना जाने कैसे
मेरे ज़ज्बात समझ जाती
ना जाने कैसे
मेरी  हर बात समझ जाती

मेरे हर पल का
हिसाब रखती
शायद अपनी एक आँख
मेरे पास रखती
हर गम दर्द मिट जाता
जब मेरे माथे पर हाथ धरती

मुझे थपकीयाँ देती
सांत्वना देती
राह सुझाती
जीना सिखाती
गाड़ी धीरे चलाने को कहती
वक़्त पर घर आने को कहती

माँ  तेरे जाने के बाद
सब कहते थे
इस जनम में
वापस लौट के ना आएगी तू
पर देख आख़िर तुझे मैने
पा लिया इसी जिंदगी मे दुबारा
मेरी बिटिया
मेरी माँ


Wednesday, July 27, 2011

वो दिन भी कितने अच्छे थे

वो दिन भी कितने अच्छे थे
जब हम छोटे बच्चे थे
छोटी सी निकर में
हम सब गलियों घुमा करते थे...

हम अपने दोस्तो से
जब कत्ति मीठी करते थे,
उनसे दुश्मन जैसे लड़ते थे.
.जिन के बिन हम 2 पल भी
नही रह सकते थे....

जब उँचे उँचे झाड़ो पर
हम झट से चढ़ जाया करते थे..
डर लगने पर..
मौत से क्या डरना
गाया करते थे...

जब हाथ में गन लेकर
हम हेलो अल्फ़ा बीटा करते थे..
और ना दिखने वाले दुश्मन को
तिस्कियाओं तिस्कियाओं कर
मारा करते थे....

वो चित्रहार के दिन थे..
वो मोगली सबको प्यारा था..
वो कंचे तारे जैसे थे
गोविंदा सारे जान्हा से न्यारा था...

जब नानी के यान्हा का
का हलवा बहुत ही खास था..
जब फलो का राजा जाम था..
और पीपल मे चुड़ाइलो का वास था

जब पापा के बाजार से आते ही
हमारे चेहरे खिल जाया करते थे
वो मुच्हर अंकल टॉफ़ी देते थे
जिनसे हम सबे जीयादा डरते थे.

वो स्कूलओ के दिन थे
वो भूतो के कहानी वाली राते थी.
दोस्तों की शामे थी..
और 100 झूठ वाली बाते थी..

वो दिन भी कितने अच्छे थे
जब हम छोटे बच्चे थे
जब बड़े भिया के साथ
हम मैच खेलने जाया करते थे..
20-20 के उस मैच  वे बस
हमसे फीलडिंग करवाया करते थे..

Continue...............

Thursday, June 9, 2011

प्रश्न

धरती पर होने वाली सबसे घृणितअपराध के लिए मृत्य दंड के प्रावधान
 का आव्हान करते हुए एक प्रश्न के रूप मे रची व्यथा.....


http://kavita.hindyugm.com/2007/10/blog-post_08.html


चार-पाँच कुत्ते
दरिंदे

एक मासूम सी बिल्ली को
घेरकर झपटते
नोचते-खसोटते
रात के सन्नाटे को चीरती
करूण चीखें

हिचकी लेती आवाज
आँसू से भरी आँखें
टूटती हर साँस
जैसे कहती -मुझे छोड़ दो!



पर शायद वह नहीं जानती
कि रात के अंधकार में
इन वहशियो के लिए वह
है केवल शिकार, माँस
भूख मिटाने का साधन, एक तन
वह नहीं है किसी की माँ, बेटी, बहन



मासूम से छौनी
निष्प्राण

एक नहीं दो नहीं
हैवान को शर्मिंदा कर
देने वाले ये पाँच
शव को भोगते
खसोटते

सिसकती भूमि
रोता आसमान
लाचार,

पूछते प्रश्न ,



हे कन्हैया

क्यों नहीं आए रक्षा को
मैं द्रोपदी नहीं इसीलिए
पर तुम तो जगत रक्षक हो
फिर क्यों नहीं आए
प्रिय भाई! क्यों नहीं



हे धरती माँ !
सीता को जगह दे दिया,
तो आज फिर क्यों नहीं आज
आप का सीना फटा,
क्या मैं आपकी पुत्री नहीं
माँ! क्या मैं आपकी पुत्री नहीं



हे भोले, हे परम पिता
जानती हूँ आप हो,
पर शायद न देख पाए
मेरे साथ होता दुष्कर्म!
शायद मेरी चीखें ही
न पहुँच पायी होंगी तुम तक
नहीं है आपका मेरे साथ
हुए पाप में कोई दोष
पर एक गलती तो किया तुमने
मुझे भोग्या बनाकर- नारी बनाकर। 

Friday, June 3, 2011

अपने शहर


15 साल हो गये ...घर गये......अपने शहर गये भिलाई के पास 1 छोटा सा शहर वरदा ..
मेरी नज़र मे दुनिया का सबसे खूबसूरत शहर...जॅन्हा जन्मा..जॅन्हा खेल कर बड़ा हुआ...
जिसकी गंध मेरे तन मे बसी हुई है....स्टेशन पर उतरते हुए...करीब 20 साल पीछे चला जाता हूँ....

ना जाने क्यों कुछ अजीब सा लग रहा है...1 खुशी भी है.अपने शहर मे आने की...और दर्द भी..
मैं घर जा रहा हू..ऐसे घर जॅन्हा कोई ना होगा.......वॅन्हा पहुच कर खुश होना है या रोना है...
समझ नही पा रहा

यादो के साथ बहता मैं अपने घर की ओर जाता जा रहा हूँ की टेक्सी वाले की आवाज़ से ...वर्तमान मे आता हूँ
साब किधर जाना है...यान्हा से..ये है एंपी नगर.

मैं उसे रास्ता बताने लगता हू....दिल मे कुछ धुकधुकी सी हो रही...
आखिकार आ ही जाता है......मेरा घर...ताला लगा हुआ घर... कोई नही रहता..

पिछली बार करीब 15 साल पहले जब आया था....तो पापा लेने स्टेशन आए थे..
गाड़ी के घर के  रुकते ही देखा माँ बाहर थी...
और जैसे ही मैं पैर पर झुका...आपने गले से लगा लिया था...

आँखो मे नमी आ जाती है...माँ कॅन्हा हो...वापस आ जाओ ना..देखो मैं लौटा हू...मिलना है..
माँ .....तेरे गले लगना है....

तभी हवा का 1 ठंडा झोंका....आता है...और मेरी रुलाई सी छूट पड़ती है....

ताला खोल के अंदर देखते हुए कैसा लग रहा है शब्दो मे बता पाना मुस्किल है...
बिल्कुल खाली .....जैसे निर्वात....कोई समान नही..बस 1 दरी बिछी है सामने..जान्हा शायद हमारी पुरानी बाई
का बेटा सोता है.....मेरे दिमाग़ मे 15 साल पुराना घर घूमने लगता है...वो पलंग..कॅलंडर..शोकेस..टीवी..
सोफा..सब के सब जैसे वैसे के वैसे है..लगता है जैसे...
अभी ही दीदी आके कहेगी.."ले भाई चाय पी..जब तक नहाने का पानी गरम कर रही हू..."

छुटकी आ के पैर छुएगी और कहेगी...भाई मेरे लिए क्या लाया...और मैं जैसे ही
उसके लिए लाया ---- कुर्ता,जीन्स दूँगा मेरे गले लग जाएगी......

पर नही.....सब आपने-2 घर है...यान्हा तो बस एक ख़ालीपन है........

पल भर को तो ऐसा लगता है...जैसे घर की दीवारे मेरी तरफ बढ़ रही है.....
जैसे मुझे दबा देना चाहती है.
समेट लेना चाहती हो अपने इतिहास मे....मैं डर सा जाता हू.....पर तभी ध्यान आता है...
इस गहर की 1-2 ईएंट...मेरे पापा की मेहनत का पसीना है...उनकी यादे है इसमे..कुछ नही है...
पापा ही बसे है जैसे...

सीडियो चढ़ता छत  पर जाता हू..जान्हा बचपन मे स्केटिंग किया करता था.....
लग रहा था की ज़मीन पर लोट जाउ..सिने लग जाउ अपने घर के...
समा लूँ सब कुछ पुराना अपने रूह मे......
....कैसे भी पुराने दिन आ जाए.....

माँ मुझे खाना खाने को पुकारे..."बेटा नीचे आजा, खाना बन गया है"
और फिर दीदी को बोले "जा पकड़ के ला तेरे भाई को....."   

पर उपर के कमरे की चाभी नही......

नीचे आता हूँ...और नये कमरे(इसका ना हम तीनो भाई बहन ने रखा था जो बाद मे नया बना था)..
जान्हा हम 3नो भाई बहन सोया करते थे......रतजगा करते थे....बदमाशयिओ की प्लानिंग प्लॉटिंग करते थे..
जान्हा छोटे से जोक पर हम इतना हंसा करते थे......की माँ की नींद उचट जाती और हम सब पर चिल्लाति..
सोते हो तुम तीनो की आउँ मैं...ये शब्द कानो मे गूँज रहे हैं.....

हल्का अंधेरा है यान्हा..सीलन की गंध है और....कुछ बॉटले फीकी है...शायद कच्चे शराब की है....
मितलि सी आती है....ऐसा  नही की मैं पीता नही..1-2 बार देसी भी पी है..
ना जाने क्यों फिर भी....इस घर मे ऐसी बोतल आएगी कभी ना सोनचा था.....

पूरा खाली घर...कोई समान नही....कानो मे सन्न्न...कुछ आवाज़ आ रही है......

लंबी दूरी से थकान सी है......सोने को जी कर रहा है.....
नहाने के लिए टॉवेल निकलता हूँ. बाथरूम का फर्श टूटा हुआ है.....
शावर मे जंग लग गया है......पर पानी आ रहा है....नहा के..पूजा कमरे की बदता हू तो कदम
ठिठक से जाए है...माँ-पापा के जाने के बाद...भगवान ने भी अपने कमरा छोड़ दिया है....
पर कुछ निशान है अब भी..दीवार पर सिंदूर लगा है...उसी सिंदूर को भगवान मान के पूजा करता हू....

फिर सामने कमरे की दरी पर चादर बिछाकर....धोती....जो  पापा ने मुझे 15 साल पहले आते हुए दी थी..
ओढ़ कर सो जाता हू.....

करीब शाम के 5 बजे आँख खुली.....ठंड का दिन है..सूरज डूब सा गया है...
इन 15 सालो मे पहली बार सुकून की नींद....सोया तो ऐसा महशुस हो रहा था...
की जैसे माँ की लोरिया कानो मे गूँज रही है....
आख़िर अपना घर अपना ही होता है...

जारी............

Wednesday, May 18, 2011

भय बिन ना होये प्रीत

2 ही रास्ते है हमारे सामने..
1962 सा जीवन
निरलज्ज होकर जीना
जैसे जीते है
नपुंसक कायर
डरपोक....
खोकर मानसरोवर और कई सौ
वर्गमील ज़मीन
देना होगा अरुणाचल कश्मीर
और रोना होगा
दूसरो के सामने
जैसे रोती है
बेशर्म औरते
जीना होगा..
दर्द से जो
दिए है
50 साल राज करने वाली सरकार ने
हमारे सिने पर
आधा कश्मीर खोकर
खिलाना होगा
पालना होगा
अफ़ज़ल और कसाब
जैसे हत्यारों कों

या फिर
हमे उगाने होंगे
पागल नृशंश वीर
और करनी होगी जी तोड़ मेहनत
चिंतनी होगी पुरुषत्व की खाद
हमे बदलनी होंगी कुछ
घटिया आदते
जैसे शांति पाठ
और करने होंगे कुछ पाप

चीखना होगा
दहाड़ना होगा
उठाने होंगे हथियरर्रर
दागने होंगे कई सौ गोले
बॉम्ब गोलियाँ
और करनी होगी
वीभत्स हत्याए

भूलना होगा विश्वाबंधुत्व
नाचना होगा लाशों के इर्दगिर्द
पीकर लहू
पचाना होगा

अगर जीना है शांति से
अहिंसा से
तो लेना ही होगा हिंसा का सहारा
क्योंकि यही धर्म है..
माँ की इज़्ज़त से बढ़कर कुछ नही
और
मातृभूमि माँ स्वर्ग से भी श्रेश्कर है

Friday, April 15, 2011

See you in next birth

I wrote this poem after reading "I too had a love Story"......



सफेद कफ़न से लिपटी
तुम इतनी
खामोश चुप
क्यों
कुछ तो बोलो ना
अपने शोना के लिए
प्लीज़ आँखे खोलो ना

पता है तुम
चुप बिल्कुल अच्छी नही लगती
वो कौन ...हाँ
शशिकला जैसे
हो दिखती
अब तो लडो ना
झगड़ो ना
या रो ही दो
पर प्लीज़ कुछ बोलो ना
ये दो सुंदर आँखे खोलो ना

अच्छा अपनी उस पागल सहेली
का वोही वाला किस्सा
फिर सुना दो
अपने बचपन की
सौ बार सुनाई कहानी
फिर दुहरा दो
मैं ना रोकुंगा
ना कुछ बोलूँगा
बोर भी नही होऊँगा
जानू बोलो ना
ये आँखे फिर से खोलो ना

सगाई हो चुकी है हमारी
उठो 10 दिन बाद शादी है
कितना इंतजार किया था हमने
मैं अकेले कैसे खुशी मनाउँगा
तुम्हारे बिना
कैसे जी पाउँगा
जानू उठ जाओ ना
एक बार फिर से गले लग जाओ ना
देखो तुम्हारी मम्मी पापा
दोनो रो रहे हैं
मुझे ना सही
उन्हे ही चुप करा दो
मैं खुद सम्हल  जाउँगा

उठो ना सोनू
बहुत हुआ
ये आँखे खोलो ना
प्लीज़ प्लीज़ मुझसे
 कुछ तो बोलो ना
माँ इससे बोलो
इस  तरह ना रूठे


शोना ssssssssssss

Tuesday, April 12, 2011

कन्या भ्रूण हत्या

बहुत पहले किसी पेपर में पढ़ी कहानी के उपेर लिखी मेरी पहली पुरस्कृत कविता...
http://kavita.hindyugm.com/2007/09/blog-post_03.html


ठीक कुछ नौ माह की
अकेली  मैं
नव  मैं
इस धरा पर आने को तत्पर
पर है दुर्भाग्य
मेरे रिश्तेदारो
दादा-दादी
खुद पिता को
नापसंद
मेरा तयशुदा अंत.


कुविचार विमर्श और दिल
जल्लाद तैयार क्रूर दिल(डॉक्टर रेडी)
रोती माँ क्षमादान मांगती मेरा
बेबस लाचार
दिन मुक़र्रर
अरथी तैयार
मैं और माँ उस पर

चाकुओंऔजारो का मेला
हमारा कुछ पल का साथ अकेला
आती चिमती पैरो पर मेरे
सहमती जीवनदान मांगती
अकेली  मैं
चीत्कार
इस बार
भीषण दर्द
पैर उस पार
बिलखती  मैं गर्भ-गृह का अंधकार

पुनः जकड़
पकड़-पकड़
अंग-अंग
भंग-भंग
मेरे आँसुओं से भीगता माँ का पेट
खींचता मेरा शरीर
टूटता नाभि का जुड़ाव
माँ और मेरा
अंतिम छुवन
उसकी घुटन

अब अंत एक द्वार
धरा के पार
माँ को प्रणाम
पिता को प्रणाम
जिन्होने छः माह का जीवन दिया
माँ केवल आपकी
प्यारी बिटिया

Monday, February 7, 2011

जाने अब वो कैसी होगी..



काफ़ी अरसा बीत गया...जाने अब वो कैसी होगी....
वक़्त की सारी कड़वी बाते चुप-चुप के वो सहती होगी..

भीगी बारिश मे वो अब भी
बिन छतरी क चलती होगी..
छप छप कर पानी में फिर
बच्चो जैसे चलती होगी
मुझसे बिछड़े अरसा हो गया..
जाने कैसे हँसती होगी....

बागों से वो अब भी
गुलाब चुराया करती होगी..
सखियों को तंग करती होगी
जुराब छुपाया करती होगी
परियो सी वो लगती होगी
जब भी थोड़ा सजती होगी
मुझसे बिछड़े अरसा हो गया..
जाने अब कैसी लगती होगी...

पापा से अब भी वो
बच्चो सी रूठा करती होगी
मम्मी उसे मनाती होंगी
मेरी कसम दिलाती होंगी
बहनो की ठिठोलियों पर
उनसे भीड़ जाया करती होगी.
यूँ ही चिढ़ जाया करती होगी
मुझसे बिछड़े अरसा हो गया..
जाने किससे लड़ती होगी....

संग मेरे जब चलती थी
हाथ थाम मचला करती थी
पल पल रूठा करती थी..
पल पल माना करती थी
गले लग मुझसे फिर
यूँ ही इठलाया करती थी
आँखे नम भी होती होंगी
याद वो जब भी करती होगी
मुझसे बिछड़े अरसा हो गया..
अपने दिल की अब वो सारी बाते
खुद ही खुद से करती होगी..

Thursday, February 3, 2011

This is what called ‘Coincidence’


ये मेरी कहानी का 4th भाग है........
3rd भाग के लिए देखें...

Same day at evening, Abhinav returned from his home, and after listening to the story he became red with anger...He wanted to teach lesson to all...he was just gunda of our college, but I asked him to control himself  coz after all everything had become settled...

For evening snacks we decided to go outside..,. So we went to call our favorite junior Rampal  ...when we were entering in his flat ... I couldn’t believe, what I saw, oh god!!!...she was there...she was standing with her father, just in the neighborhood of my junior’s flat…..

The great day of rainy season started running in my eyes…that was the first n last day when I had seen her…..I don’t know what happened exactly either she left coaching or became ill or what ...but after that I couldn’t seen her…

But today ….The face I couldn’t forget was there…..
She was in a pink pajama and pink top and as usual looking very beautiful....
I was senseless again....was I dreaming? I pinched myself. No it wasn't dream. It's real... can't explain how I was feeling to see my dream girl again with my future’s nightmare(her Father)......
I felt every thing had stopped…my mind was totally blank…. what was this I can't explain....if u can please tell me?

She had a very small and cute mischievous smile on her face.....and her father had a very cruel expression on his face......my father-in-law (would be) was very fare, tall and strong.....he was giving me a very rigid look...I wondered why was it ,so for one moment ….and got the answer self in the very next moment...he was one of the audiences of today’s morning mega show(The Fight).....so he had already got a chance to listen to all the pleasant abuses that I fired from my mouth in the morning drama…and had also seen me  beating others or worst had seen me getting beaten up....oh god what is this......I wanted to forget the famous phrase "first impression is last impression".......but it was the only thing that was coming repeatedly to my mind......

I wanted to stand there for some more time and wanted to capture her beauty in my eyes forever...but as decided we were going for evening snacks...so I had to go......

Tuesday, February 1, 2011

माँ



माँ मै नही चाहता बड़ा होना....
इतना बड़ा की तेरी गोद में ना आ पाउ.
तू मुझे मेरा लाला मेरा सोना...
कहे तो.... हँसे लोग...

अभी भी मै तेरे पीछे तेरा आँचल
पकड़ कर चलना चाहता हूँ...
तेरी लोरिया सुन सोना चाहता हूँ...
चाहता हूँ तेरा इंतजार करना...
जब तू बाजार जाए और मेरे लिए मिठाई लाए.
मै यदि सो जाउ भूखा तो
नींद से उठा मुझे खाना खिलाए....

याद आती तेरे स्पर्श की सोंधी महक..
मेरे तपते शरीर पर प्यार का मलहम..
मेरी चोट पर तेरी घबराहट और
आँखो  मे आँसू..
और मेरी सफलता पर ..गर्वित चेहरा..

नही चाहता देखना तेरी आँखो मे आँसू..
मेरे ज़िद पर भी..
खिलौने ना दे पाने वाली बेबसी..
पैसो की कमी से तेरे
ना पूरे हो सके अरमान,....
अपनी सारी-गहने छोड़..
रिश्तेदारो को दिया समान....


भूला नही..
तेरे नून-तेल रोटी खिलाना..
मीठा माँगने पर..
रोटी मे शक्कर का मिलाना..
मेरे बैट के लिए महीनो की बचत.
पापा के साथ पैसो की झड़प..
तेरी आँखो  की नमी
और मेरा बड़ा होता जाना..

तेरे करमो का ही है यह फल
मै अधम हूँ ..आज सफल..
जीवन मै जो भी पा रहा.
सब तेरे पुन्य-प्रताप है..
इस तन–मन पर तेरा
आधिपत्य है...
यह कथन मेरा..
शिव सा सत्य है...

करता है प्रण ये लाल तेरा.
« की जब तन में लहू बहेगा..
सांसो का ये क्रम चलेगा…
करता तेरा मान रहूँगा..
हरदम मे सम्मान रखूँगा.. »

नखरा

Read Poem as Line by Line Chat.......
Its Not a Poem ...But Lot like poem..:)


He To She

मै तुम्हे पसंद नही
बिल्कुल नही
शादी भी नही करना चाहती हो मुझसे
नहीईइ
फिर
फिर क्या
सच मे बिल्कुल अच्छा नही लगता?
अरे लिख के दूँ क्या
ह्म्म्म
ज़रा भी नही
नही,ज़रा सा भी नही

इत्ता सा तो होऊँगा
नही इत्ता सा भी नही
मेरी बाते
बकवास
ओह्ह्ह्ह कुछ तो अच्छा लगता होगा
क्या अच्छा है आपमे
कुछ भी नही?
नही नही नहीईइ
तो मै जाऊं
जाऊं
सच मे
हाँ सच मे

मै कुछ बोलू
नही
तुम मुझे बहुत अच्छी  लगती हो
तो?
तुम मुझे बहुत ज़्यादा अच्छी लगती हो
तो क्या?
मै तुम्हे बहुत पसंद करता हूँ.
सारे लोग ही मुझे बहुत पसंद करते हैं

She To He

क्या हुआ
कुछ नही
बोलो ना
कुछ नही,यू नेवर मिस्स्स मी ना
ह्म्म थोड़ा सा करती हूँ
कितना थोड़ा,सलमान जितना
पागल हो क्या!! आइ लव हिम मोर देन एनिबडी  (स्पेशली यू)
और मुझे
आईना देखा है?
समझा गया
क्या
यही की यू डोंट
तुम बहुत बुद्धू हो
तो फिर हान बोलो
बक
बोलो ना
बक











Friday, January 7, 2011

The Fight


ये मेरी कहानी का तीसरा भाग है........
दूसरे भाग के लिए देखें...


Once all of us went to our respective native place for Diwali vacation …it was a long vacation...
Karan was the first among us to return from home…he called us and gave a bad news about order to vacant the flat immediately by Amit ….exactly I don’t know what the matter was, Karan was saying   its due to delay in rent…..but I couldn’t believe that this was the reason for which Amit would have asked us vacant the flat….somehow my hear felt that the reason was Nisha…had Karan caught? Anyone from our neighbor told any thing about us? but I was not sure ,these were just  guesses….but the truth was we had to leave the flat….the 99k…where we enjoyed the best moment of 3rd and 4th semester…..

Karan  said that  he was searching flat in same locality…trying to find a good flat in same area….he was taking help of our juniors....For  especially students ,its very difficult to find a good flat in a good locality in Indore...but it was our good luck again and he found a flat  in same row where our juniors were living.......Karan shifted there with all bags and baggage....I reached there in morning of 14 nov.....Karan was there to welcome me...After seeing the flat I was quite disappointed...there were not a single facility like 99K....
We have to pull water form an underground tank like well...the room were small  even the toilet was also not good.....so I can say it was a very average flat as compared to the 99K....

One of our junior Rampal was sleeping on bed....he was in 1st year....from Satna...son of a farmer...In MP it is popular a saying “3 akshar ka Satna, sonch samjh kar fasna     "

Hearing Noise of Auto, he opened his eyes and to saw me...wished me good-morning and slept again....I took bath and then put water on gas to make tea...and turn on the radio....93.4 FM radio mirchi(which is hot as they said ---Radio Mirchi 93.4 FM….its hot)…that day its proved.......one of the chartbuster of that time  started  playing in full volume in hot radio mirchi...... While enjoying the song I came out to call Karan to brought  breakfast.......suddenly a guy from neighboring flat, came inside our flat , without  asking  any permission he turned off the radio... and then gave me an angry look...... Karan asked me why I turned off the radio.....I pointed to him that it was this unknown...He asked what happened...I said, "I think it’s a noise problem"....I didn't know what happened to that person, after listening to  my words.....he started shouting n abusing....
I was aghast...didn't know what to do.....within 5 minutes there where approximate 20-30 people of my poll ,all of them  were screaming and shouting......due to all this chaos poor Rampal woke up...

One of the guys abused and pushed me; seeing this Rampal landed a punch on that guy’s face.....his face was full of blood..... On seeing their guy beaten by a student, the mob attacked us all      .....we were 7 guys--me and Karan with 5 juniors, they had come to our rescue after hearing noise.....and 25-30 people were on the opposite side.... the air was polluted with abuses of mother-sister and other slangs......each of us was taking on 2-4 guys from opposition .....our flat became a mini-krukshetra and either we were beating someone from the other gang or getting beaten by someone from them......


Because we were students so were not too worried of any police complaint. We were too young and charged up to think about all that…. but the opposition were grown-ups from well settled families with a reputation to protect, but obviously we also didn't want to get into any police case.....So soon the fight stopped....As I told I was little bit mature than other guys. So I took the first step...and said sorry to all and promised for no louder music in near future which is what they wanted to listen...and after a big drama they returned to their home....

Tuesday, January 4, 2011

न मै दीवाना कहती हूँ

किसी अनजान होनहार और कुमार विश्वास जी के अद्भुत प्रश्नशक के द्वारा रची हुई
सुंदर कृति .......


न मै दीवाना कहती हूँ न तो पागल समझती हूँ
तेरी यादो को इन पैरों की अब पायल समझती हूँ
हमारे दिल की दूरी घट नहीं सकती कभी क्यूंकि
न तुम मुझको समझते हो न मै तुमको समझती हूँ

मोहब्बत एक धोका है मोहब्बत एक फ़साना है
मोहब्बत सिर्फ ज़ज्बातों का झूठा कारखाना है
बहुत रोई हैं ये आँखें मोहब्बत की कहानी पर
तभी तो जानती हैं कौन अपना और बेगाना है

समय की मार ने आँखों के सब मंजर बदल डाले
ग़म-ऐ-जज़्बात ने यादो के सारे घर बदल डाले
मै अपने सात जन्मो में अभी तक ये नहीं समझी
न जाने क्यूँ भला तुमने भी अपने स्वर बदल डाले

ये सच है की मेरी उल्फत जुदाई सह नहीं पायी
मगर महफ़िल में सबके सामने कुछ कह नहीं पाई
मेरी आँखों के साहिल में समुन्दर इस कदर डूबा
बहुत ऊंची उठीं लहरें पर बाहर बह नहीं पाई

एक ऐसी पीर है दिल में जो जाहिर कर नहीं सकती
कोई बूटी मेरे दिल के जखम अब भर नहीं सकती
मेरी हालत तो उस माँ की प्रसव-पीड़ा से बदतर है
जो पीड़ा से तो व्याकुल है मगर कुछ कर नहीं सकती

बहोत अरमान आँखों में कभी हमने सजाये थे
तेरी यादो के बन्दनवार इस दर पर लगाये थे
तुम्हारा नाम ले लेकर वो अब भी हम पे हस्ते है
तुम्हारे वास्ते जो गीत हमने गुनगुनाये थे !!

तुम्हारे साथ हूँ फिर भी अकेली हूँ ये लगता है
मै अब वीरान रातों की सहेली हूँ ये लगता है
न जाने मेरे जज्बातों की पीड़ा कौन समझेगा
मैं जग में एक अनसुलझी पहेली हूँ ये लगता है

इस दीवानेपन में हमने धरती अम्बर छोड़ दिया
उनकी पग रज की चाहत में घर आँगन छोड़ दिया
कुछ कुछ जैसे मीरा ने त्यागा अपना धन वैभव
कान्हा की खातिर ज्यूँ राधा ने वृन्दावन छोड़ दिया

ये दिल रोया पर आंसू आँख से बहार नहीं निकले
हमारे दिल से तेरी याद के नश्तर नहीं निकले
तुम्हारी चाहतो ने इस कदर बदनाम कर डाला
किसी के हो सके हम इतने खुशकिस्मत नहीं निकले