Thursday, June 26, 2025

कीका: महाराणा

जब अधिकांश राजपूत राजाओं ने अकबर के दर से मुग़लिया झंडे के नीचे अपना राज्य सौंप दिया..मेवाड़ बस एक अपवाद था..
 
अकबर के लिए ये प्रतिष्ठा का प्रश्न बन चुका था.....उसने बार-बार असफल कूटनीतिक प्रयास किए, अपने घाघ दरबारी जलाल ख़ान खोर्ची, फिर मानसिंह ,और उसके विफलता के बाद मानसिंह के पिता भगवानदास कछवाहा......महाराणा किसी भी तरह से झाँसे मे ना आए.... तो अकबर ने पुनः मुग़लिया सैन्यबल की विशाल शक्ति का प्रयोग कर मेवाड़ को  अपने  शासन मे लाने निर्णय लिया। वह यह भूल गया था कि मेवाड़ केवल भूगोल नहीं था — वह एक विचार था, जो बप्पा रावल, खुमाण, राणा सांगा जैसे महावीरों की परंपरा से संचित था।

 राजपूतो का गौरव मेवाड़ बहूत ही सीमित भूभाग मे शेष रह गया था.....बप्पा रावल का शौर्य , और राणा सांगा के बाहुबल की धार से संचित मेवाड़ अब महाराणा उदयसिंह की दुर्बल रणनीति के कारण संघर्षशील थी...प्रजाजन और सैनिकों मे वैसा उत्साह नही था....मुगलों के डर से हर दिन जिए जा रहे थे...मेवाड़ और राजपूत एक नये नायक की प्रतीक्षा मे थे....९ मई १५४९ राजमाता जैवन्ताबाई  के गर्भ ना केवल  उनके प्रतीक्षा का अंत हुआ...बल्कि संपूर्ण भारत को कई सदियों का एक नायक...सिसोदिया कुलनायक...महानायक...महाराणा मिला....जब जन्म हुआ बालक प्रताप का...जो आज भी हमारे रक्त और हृदय में महाराणा प्रताप के नाम से हैं.....

 हल्दीघाटी का युद्ध.....

अकबर ने अपने सबसे भरोसेमंद राजपूत सेनापति राजा मानसिंह को सेना की अगुवाई दी। मानसिंह की सेना में घुड़सवार, हाथी, तोपखाने, और असंख्य पैदल सैनिकों की भरमार थी। दूसरी ओर, राणा प्रताप के पास सीमित संसाधन, पर असीम शौर्य था।

 किशोरावस्था से ही छोटे छोटे युद्ध का संचालन करते हुए..मेवाड़ के प्रजाजन में आशा जगाते हुए प्रताप बड़े हो रहे थे....ना केवल मेवाड़ प्रजा  में अपितु वनवासी भिलो में भी अपने निश्छल प्रेम और मिलनसार व्यवहार से प्रताप अत्यंत ही लोक प्रिय थे...वनवासी भील प्रेम में उन्हे कीका अर्थात पुत्र  कह के बुलाते थे....कुलीन पट रानीमाँ और लोकप्रियता के कारण भावियुवराज भी थे...

तीरंदाजी,तलवारबाजी मे वैसे तो उनका कोई सानी नही था...पर जब भाला की बात आती थी तो पृथ्वी पर उनके जैसा कोई दूज़ा न था....

 सूर्य अस्ताचल की ओर बढ़ रहा था। हल्दीघाटी की घाटियों में हल्की-सी वीरानी छाई थी। अकबर का सेनापति—कुलघाती मानसिंह—अपने शिविर में बैठा मेवाड़ और महाराणा प्रताप को बंदी बनाने के स्वप्न में लीन था।

 उधर, महाराणा प्रताप अपनी राजपूती सेना के साथ पर्वतीय आड़ों में घात लगाए बैठे थे। जहाँ मानसिंह को अनेक युद्धों का अनुभव था, वहीं प्रताप के पास थी—राजपूती शौर्य, निष्ठा और बलिदान की परंपरा। उसका साहस अनुभव से नहीं, आत्मबल से उपजा था।

 
मुगलिया सेना मैदान की ओर से धीरे-धीरे चढ़ाई कर रही थी, और मेवाड़ी वीर चट्टानों पर ज्यों-के-त्यों स्थिर खड़े थे। राणा का स्पष्ट आदेश था—*“युद्ध हमारी शर्तों पर होगा, हमारे समय पर और हमारे स्थान पर।”*
 

मेवाड़ी सामंत और युवा राजपूत, सामने शत्रु को देख, रक्त में उबाल लिए चुपचाप प्रतीक्षा कर रहे थे। उनका क्रोध दबा हुआ ज्वालामुखी था—जो कभी भी फट सकता था।

 उनके हृदय में आज भी वह दुःस्वप्न जीवित था, जब चित्तौड़ की दुर्ग विजय के पश्चात अकबर ने 30,000 निर्दोष नागरिकों की हत्या का आदेश दिया था। न तो  पकड़े गए थे, न ही राजकोष मिला था, बस शह और मात का वह अमानवीय दाग पीछे छूट गया था।

आज भी वह रक्तरंजित स्मृति मेवाड़ी युवाओं को हर रात बेचैन कर देती थी।

एक युवा राजपूत सामंत, जिसकी आँखों में अपने नगरवासियों की बलिदानी छवि तैर रही थी, का धैर्य टूट गया।

उसने जब सामने मुग़लिया झंडा देखा, तो उसकी आँखों में लपटें भड़क उठीं।

"अब और प्रतीक्षा नहीं!" वह गरजा।

और अपनी टुकड़ी सहित वो शेर की भाँति मैदान की ओर झपटा—जैसे एक गरजता सिंह दल भेड़ियों के झुंड पर धावा बोल दे।

 हल्दीघाटी की घाटियाँ थर्रा उठीं।

घोड़े हिनहिनाए, तलवारें चमकीं, भाले और बाण गगन चीरने लगे।मुग़लिया सेना सहम गई थी।

 उस एक वीर की हुँकार से पूरे युद्ध का रुख बदल गया।एक-एक कर मेवाड़ी टुकड़ियाँ पहाड़ों से उतर आईं।

 घोड़े, पैदल सैनिक, हाथी—सब युद्ध में कूद पड़े।चारों ओर तलवारें चमकने लगीं, भाले चलने लगे, तीरों की वर्षा होने लगी।

मुग़लिया सेना सहम गई थी।

 ग़लती हो चुकी थी,अब युद्ध टालना संभव नहीं - राणा स्वयं पीछे नहीं रह सकते थे।
 

फिर सिंह ने भी सिंहनाद ...

कालों का काल- महाकाल , मेवाड़ का महावीर—महाराणा प्रताप स्वयं हल्दीघाटी की रणभूमि में चेतक पर सवार होकर उतर चुके थे।

 

एकलिंग नाथ की  जय..हर हर महादेव.....का मेवाडी उद्घोष 

अल्लाह हू अकबर का मुग़लिया घोष.....हल्दी घाटी की हवओ में तैर रहा था....

रजपूती तलवारे मुग़लिया सेना की ऐसे काट रही थी जैसे किसान खेतो से पके  धान की बालियां उतार रहा हो..

 इतने युद्ध लड़ने वाला मानसिंह भी हतप्रभ था.... रणभूमि के हर कोने में प्रताप थे....जहाँ नजर जाए वहाँ चेतक और महाराणा

राणा प्रताप की भाला या स्वयं  प्रताप की बिजली सी चमकती तलवार थी.... सीमित संख्या की मेवाडी सेना असीमित मुग़लिया सेना से लोहा ले रही थी...प्रताप के सामने आने वाला हर योद्धा अपना जीवन का अंतिम चेहरा देख सीधे  रणचंडी की यज्ञ मे खुद की आहुति दे रहा था...प्रताप की तलवार और भाले के सम्मुख नरमुंडों का पहाड़ पड़ा हुआ था...
 

मानसिंह इस अभियान के पूर्व जब अकबर का संधिपत्र लाया था ,तब महाराणा ने बस उसे एक सेनापति सा सम्मान दिया पर मुगलों से संबंध रखने के कारण भोज मे सम्मिलित ना  हो तिरिस्कृत किया.....मानसिंह के मन मे तिरस्कार और अपमान की ज्वाला धधक रही थी....

 ..हाथी के हौदे मे छुपे मानसिंह ने महाराणा की और कूच किया... रजपूती प्रेम और मेवाड़ सम्मान की ज्वाला लिए जब महाराणा ने मानसिंह को अपनी ओर आता देखा तोतो मानो वर्षों का धैर्य बिखर गया

 चेतक की रफ़्तार बाज से भी तेज हो गई.....और पल भर मे राणा के चेतक का टाप मानसिंह के हाथी की माथे पर था..

ऐसा साहस, ऐसा घोड़ा, ऐसा योद्धा —ना कभी मुग़लों ने देखा था,ना सुना था।.....

 हौदे मे बैठा मानसिंह हिल गया उपर से नीचे तक...पल भर बाद जब आँखे खुली तो हाथी को रणभूमि से भागता पाया..महावत का रक्त तो प्रताप के भाले ने पी लिया था.....मानसिंह के सुरक्षा दस्ते ने 

राणा के हमले को सम्हाला...चेतक की गति और .राणा का महाकौशल देखते बनता था...राणा की तलवार और भाला शत्रु के लहू से हल्दी घाटी की पीली मिट्टी लाल कर रहे थे....

 राणा मानसिंह का मस्तक से अपनी प्यास बुझाना चाहते थे......चेतक फिर से मानसिंह के हाथी पर हमले को तैयार था....पर इस बार हाथी पर बँधी तलवार से चेतक घायल हुआ..और थोड़ा काम मानसिंह के सुरक्षा दस्ते ने किया.... चेतक की गति कम हुई..

 युद्ध आरंभ हुए पहर बीत चुका था और अब मेवाडी सामंतों को समझ मे आने लगा की क्यूँ महाराणा शत्रुदल से पर्वतीय क्षेत्र मे ही लड़ने का आदेश दिए थे.....

 संख्या शौर्य पर भारी पड़ने लगी.....एक एक रजपूती वीर कई मुग़लिया सैनिक से लड़ रहा था......और वीरगति को प्राप्त हो रहा था....

इसी बीच घायल चेतक और फिर महाराणा भी इसी क्रम मे घायल हो गये..... मेवाडी वीर झाला मान ने जैसे ही ये दृश्य देखा...वह दौड़ पड़ा महाराणा की ओर....और फिर महाराणा का क्षत्र और पताका अपने हाथ ले लिया....घायल महाराणा बस ये देखते रह गये....
        

मेवाडी सुरक्षा दल राणा को सुरक्षित स्थान पर ले जाने लगा....इधर झाला ने ऐसा कौशल दिखलाया की मुगल सेना उन्हे राणा के धोके में उलझ कर रह गई....लड़ते लड़ते झाला वीरगति को प्राप्त हुए...

 उधर राणा सुरक्षित अपने दुर्ग तक पंहुच गये और साथ थे मुगलों की तरफ जा मिले उनके छोटे भाई शक्ति सिंह.. घायल राणा को देख शक्ति सिंह का सिसोदिया रक्त खौल गया..आँखे खुली तो भातृ प्रेम जाग गया.....राणा घायल थे...सैनिकों का मनोबल हतोत्साहित था.... गोगुन्दा के कुछ किले सहित कुछ और इलाके मुगल सेना ने कब्ज़े मे लिए...

 

हल्दीघाटी यूँ तो देखने मे भले ही मुगलिया जीत लगे ..पर ऐसा नही था....

युद्ध एक मकसद से लड़ा जाता है..जो जब तक पूरा ना हो उसे जीत नही माना जाता....राणा का हाथ ना लगने से मेवाड़ के मुगल सलतनत मे  मिलने का  उद्देश्य पूरा ना हो सका था...मानसिंग लौटा तो ना उसका ऐसा स्वागत हुआ जैसा हर बार उसके युद्ध के लौटने पर होता था बल्कि २ साल के लिए राजदरबार मे प्रवेश निषेध का दंड मिला...

 कुछ किले और जो चौकियाँ राणा से छीन गई थी.....राणा और उनकी सेना ने उन पर फिर से कब्जा कर लिया....
 

अकबर ने इतने असफल प्रयासों के बाद फिर अपने अनेक सिपहसालार भेजे शाहबाज ख़ान के नेतृत्व में..अब तक महाराणा निपुण हो चुके थे.....कुछ किले देकर मुगल सेनानायक को जीत अहसास दिलाया जाता और फिर अपने छापामार अभियान से ऐसा खौफनाक अंजाम देते की मुगल सेना की रूहें तक कांप उठती और वो किले - थाने छोड़ उल्टे पैर भाग जाते...
 

बहलोल खान की चौकी दिवेर में थी .. बहलोल खान 7.8 इंच लंबा राक्षस था जो एक भी लड़ाई नहीं हारा था ..शरिस ऐसा की घोड़ा छोटा लगता ..अतिभयानक....पर आमने सामने की लड़ाई मे महाराणा प्रताप ने एक ही तलवार के वार से बहलोल खान को घोड़े सहित काटा डाला...मुगल सेना के मान मे उस चमकती तलवार का खौफ फिर कभी सोना ना सका...

 अकबर ने मेवाड़ की तरफ देखना बंद कर दिया....और धीरे धीरे महाराणा और भी शक्तिशाली होते गये और अपने सारे किलों पर पुनः अधिकार कर मेवाड़ पर शासन किया....
 

" जब याद करूँ थारो महाराणा मान अभिमानी हो जावे है"

1 comment:

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